20 जुलाई 2018

संसद मजाक करने वाला स्थान नहीं


अविश्वास प्रस्ताव पर लम्बी बहस और नतीजा चिर-परिचित. 325 के मुकाबले मात्र 126 मत. परिणाम तो पूर्व निर्धारित था मगर चर्चा के दौरान जिस तरह से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपरिपक्वता का उदाहरण दिया वह क्षोभ पैदा करता है. मोदी को लेकर, भाजपा को लेकर उनकी क्या राय है ये सबको पता है मगर जिस तरह से राफेल विमान सौदे को लेकर उन्होंने बयान दिया वह खेदजनक है. राहुल गाँधी मोदी सरकार और उसके मंत्रियों को घेरने के चक्कर में, उन पर आरोप लगाने की जल्दबाजी में भूल गए कि वे किसी प्रेस कांफ्रेंस में नहीं हैं, वे किसी चुनावी सभा को संबोधित नहीं कर रहे हैं वरन वे लोकसभा में बैठे हैं. देश के संविधान में सर्वोच्च स्थान प्राप्त सदन में बयान दे रहे हैं. अपने भीतर का आक्रोश या कहें खीझ निकालने के चक्कर में वे यह भी भुला बैठे कि वे जिस बिंदु से सम्बंधित, जिस सौदे से सम्बंधित बयान देने जा रहे हैं वह देश या राज्य के किन्हीं दो व्यापारियों के बीच का सौदा नहीं है वरन दो देशों के बीच का सौदा है. वे शायद यह भी भुला बैठे कि यह सौदा दो देशों में, दो सरकारों में हो रहा है न कि मोदी और फ़्रांस के राष्ट्रपति में. आज मोदी हैं, आज भाजपा केंद्र में है कल को संभवतः कांग्रेस ही हो या कोई और दल हो मगर इस सौदे का अस्तित्व तब भी रहेगा, इसके दस्तावेज़ तब भी अपनी कहानी खुद कहेंगे. मोदी सरकार को बदनाम करने, उनके मंत्री को भ्रष्ट बताये जाने की जल्दबाजी में राहुल गाँधी बचकाना हरकत कर बैठे.


उनके बयान देने के तुरंत बाद फ़्रांस की तरफ से भी बयान जारी किया गया. इसमें सरकार पर फ्रांस के साथ किए गए राफेल डील पर गंभीर आरोपों को फ्रांस ने सिरे से खारिज कर दिया है. राहुल गाँधी ने डील में घपला होने और विमानों की कीमत ज्यादा करने का आरोप लगाया था. यह भी आरोप लगाया गया था कि रक्षामंत्री निर्णला सीतारमण ने राफेल डील को लेकर देश से झूठ बोला है. फ्रांस सरकार ने तुरंत ही त्वरित कार्यवाही करते हुए राहुल गाँधी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि दोनों देशों में सूचना गोपनीय रखने का करार है और इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है. उसने अपने बयान में कहा कि 2008 के सिक्यॉरिटी अग्रीमेंट के तहत दोनों देश गुप्त सूचना को सार्वजनिक नहीं कर सकते हैं. हम कानूनी तौर पर इससे बंधे हुए हैं. डील की जानकारी सार्वजनिक करने से सुरक्षा और ऑपरेशनल क्षमता पर असर पड़ सकता है. ऐसे में यह प्रावधान 2016 में किए गए 36 राफेल लड़ाकू विमानों पर भी लागू होता है. यहाँ बताते चलें कि राहुल गांधी ने सदन में आरोप लगाते हुए कहा था कि राफेल डील में उनकी सरकार ने 520 करोड़ रुपये प्रति प्लेन में डील की थी, पता नहीं क्या हुआ, किससे बात हुई और पी०एम० फ्रांस गए और जादू से हवाई जहाज की कीमत 1600 करोड़ प्रति प्लेन हो गई.


कितनी हास्यास्पद स्थिति है. एक तरफ कांग्रेस और राहुल गाँधी अपने को लगातार प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट कर रहे हैं. अब वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, ऐसे में सदन में इस तरह के बचकाने बयान के साथ-साथ अपने भाषण की समाप्ति पश्चात् की गई हरकतें भी शालीन, शोभनीय नहीं कही जा सकती हैं. सदन में प्रधानमन्त्री को गले लगाया सही है या गलत, इसकी चर्चा नहीं मगर जिस तरह से राहुल गाँधी ने उनके पास पहुँचने तक हाथों की गतिविधियों से उन्हें उठने का इशारा बराबर किया. गले लग कर या कहें कि गले पड़ कर वापस आने के बाद की उनकी आँखों की गतिविधि किसी भी रूप में न तो परिहास कही जा सकती है और न ही परिपक्व. प्रधानमंत्री को गले लगाने के लिए या उनके गले लगने के लिए उन्हें खड़े होने का इशारा करना अमर्यादित भी है, अशोभनीय भी. बहरहाल, सुख-सुविधाओं के साए में पले-बढ़े राहुल गाँधी अभी भी देश की सत्ता का सञ्चालन अपने परिवार के भीतर से होता हुआ ही समझ रहे है. देश के प्रधानमंत्री को वे अभी भी अपने आवास से संचालित होना समझ रहे हैं. यहाँ उन्हें समझना होगा कि वे महज एक सांसद ही नहीं, एक बड़े दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. प्रधानमंत्री पद के स्व-घोषित उम्मीदवार हैं. ऐसे में उनकी बचकानी हरकतें उन्हें प्रसिद्धि दिलाएं या न दिलाएं मगर आगामी चुनावों में नुकसान अवश्य कराएंगी.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें