30 जून 2017

सैंपल सर्वे के जनक पीसी महालनोबिस

प्रतिवर्ष 29 जून को सांख्यिकी दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन देश के प्रसिद्द वैज्ञानिक और सांख्यिकीविद प्रशांत चंद्र महालनोबिस का जन्म 1893 को कोलकाता में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा उनके दादा गुरु चरन महालनोबिस द्वारा स्थापित ब्रह्मो ब्वायज स्कूल में हुई. प्रेसीडेंसी कालेज से भौतिकी में आनर्स करने के बाद वे उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए लंदन चले गए. वहां उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से भौतिकी और गणित विषयों से डिग्री प्राप्त की. ये एकमात्र छात्र थे जिनको भौतिकी में पहला स्थान प्राप्त हुआ था. उन्होंने अपने शिक्षक के कहने पर बायोमेट्रिका नामक किताब पढ़ी. इसे पढ़ने के बाद उनका रुझान सांख्यिकी की ओर हुआ. उन्होंने इस दिशा में सबसे पहला काम कालेज के परीक्षा परिणामों का साख्यिकीय माध्यम से विश्लेषण करने का किया. इसमें उन्हें सफलता भी मिली. इसके बाद महालनोबिस ने जुलोजिकल एंड एंथ्रोपोलोजिकल सर्वे आफ इंडिया के निदेशक नेल्सन अन्नाडेल के कहने पर कोलकाता के ऐंग्लो इंडियंस के बारे में एकत्र किए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया. इस विश्लेषण का जो परिणाम आया वह भारत में सांख्यिकी का पहला शोध-पत्र कहा जाता है.


प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस का सबसे बड़ा योगदान उनके द्वारा शुरु किया गया सैंपल सर्वे है. जिसके आधार पर आज बड़ी-बड़ी नीतियां और योजनाएं बनाई जा रही हैं. उनके द्वारा सुझाई गयी एक सांख्यिकीय माप को महालनोबिस दूरी के नाम से जाना जाता है. वे चाहते थे कि सांख्यिकी का उपयोग देशहित में हो. इसी कारण से उन्होंने पंचवर्षीय योजनाओं के निर्माण में अहम भूमिका निभाई. 17 दिसंबर 1931 को उनका सपना साकार हुआ जबकि कोलकाता में भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना की गई. आज कोलकाता के अलावा इस संस्थान की शाखाएं दिल्ली, बैंगलोर, हैदराबाद, पुणे, कोयंबटूर, चेन्नई, गिरिडीह सहित देश के दस स्थानों में हैं. सन 1959 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया. प्रोफेसर महालनोबिस को 1957 में अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान का सम्मानित अध्यक्ष बनाया गया. भारत सरकार ने 1959 में प्रोफेसर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस को पद्म विभूषण से सम्मानित किया. उन्हें ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा 1944 में वेलडन मेडल पुरस्कार दिया गया था तथा 1945 में रॉयल सोसायटी ने उन्हें अपना फेलो नियुक्त किया गया था.


प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस एक दूरद्रष्टा भी थे. उन्हें विज्ञान में ब्यूरोक्रेसी पसंद नहीं थी. उन्हें अपने संस्थान से काफ़ी लगाव था और वे इसे एक स्वतंत्र संस्था के रूप में देखना चाहते थे. जब 1971 में इस संस्थान से जुड़े अधिकांश लोगों ने सरकार के साथ जाने का फैसला किया तो उन्हें आंतरिक कष्ट हुआ. वे इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके और 28 जून, 1972 को उनका देहांत हो गया. आर्थिक योजना और सांख्‍यि‍की विकास के क्षेत्र में प्रशांत चन्‍द्र महालनोबिस के उल्‍लेखनीय योगदान के सम्‍मान में भारत सरकार उनके जन्‍मदिन 29 जून को प्रतिवर्ष सांख्यिकी दिवस के रूप में मनाती है. इसका उद्देश्‍य सामाजिक-आर्थिक नियोजन और नीति निर्धारण में प्रो. महालनोबिस की भूमिका के बारे में जनता में, विशेषकर युवा पीढ़ी में जागरूकता लाना तथा उन्‍हें प्रेरित करना है.

11 जून 2017

हताश विपक्ष की कुंठित प्रतिक्रिया

शून्य को भरने के लिए समाज में सलाह दी जाती है सकारात्मक सोच की, सार्थक कार्य करने की. इसके उलट राजनीति में शून्य को भरने के लिए विशुद्ध राजनैतिक हथकंडे अपनाये जाते हैं. इन हथकंडों को अपनाने में खून भी बहाना पड़े, आग भी लगानी पड़े, झूठ का सहारा लेना पड़े तो भी कम है. वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में केंद्र से विपक्ष लगभग शून्य की स्थिति में है. वर्तमान लोकसभा में गिने-चुने दलों को अवसर मिल पाया कि उनके प्रतिनिधि सदन में बैठ सकें. केन्द्रीय सत्ता के कार्यों और उसके प्रतिनिधियों के चाल-चलन में खोट न निकाल पाने के कारण, विगत तीन वर्षों में किसी भी तरह के घोटाले न निकाल पाने के कारण, केन्द्रीय नेतृत्व के कार्यों से जनता को असंतुष्ट न देख पाने के कारण विपक्षी दलों में हताशा का माहौल है. इसको महज ऐसे समझा जा सकता है कि देश भर में जबरदस्त विरोधी रहे विपक्षी दल भी आपस में गलबहियाँ करते दिख रहे हैं. ये गलबहियाँ समाजहित में नहीं हैं, देश की भलाई के लिए नहीं हैं, राजनैतिक सुधार के लिए नहीं हैं वरन केंद्र की सरकार को हटाने के लिए हैं. इन लोगों को खुद से एक सवाल करना चाहिए कि आखिर केंद्र की सरकार ने ऐसे कौन से काम किये हैं जो जिसको लेकर उसे हटाने की बात की जाये? देखा जाये तो विपक्षियों के पास वर्तमान में कोई मुद्दा नहीं है इसलिए उनके द्वारा ऐसे कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है जिसके चलते देश में, समाज में तनाव का माहौल बने और लोगों में केंद्र के प्रति भाजपा के प्रति नफरत पैदा हो. विपक्षियों की इस सोच के पीछे का मूल कारण दो वर्षों में संपन्न होने वाले लोकसभा चुनाव हैं. उनकी सोच है कि समाज में इस तरह के तनाव पैदा करने से केंद्र के प्रति, भाजपा के प्रति नाराजगी पैदा होगी जो विपक्षियों के लिए लाभदायक रहेगी.

विपक्षियों की इसी नकारात्मक सोच का परिणाम है कि केरल में कांग्रेसियों द्वारा खुलेआम एक गाय को काट डाला गया, उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में चलाया गया. इसी तरह खबर आई है कि विधायकों ने अपनी बैठक के पहले बीफ खाकर केंद्र सरकार के पशुवध सम्बन्धी नियम का विरोध जताया है. बिना सम्पूर्ण नियमावली को देखे-पढ़े सिर्फ विरोध करने के नाम पर विरोध की राजनीति ने ऐसे कृत्यों को अंजाम दिया. कुछ इसी तरह का कार्य आजकल मध्य प्रदेश में देखने को मिल रहा है. जहाँ किसानों के आन्दोलन के नाम पर हताश-निराश विपक्ष अपने कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर है. किसानों की कर्जमाफी के नामपर जिस तरह का उपद्रव पिछले कुछ दिनों से प्रदेश की सड़कों पर दिख रहा है वह किसी भी रूप में किसानों का आन्दोलन नहीं लग रहा है. कारों, बसों को जला देना, यात्रियों से भरी बस में तोड़फोड़ करना आदि लक्षण नहीं हैं किसी भी किसान आन्दोलन के. इसका प्रमाण भी वो वीडियो दे रहा है जिसमें एक विधायक को थाने में आग लगा देने की बात कही जा रही है. असल में देश भर में जहाँ-जहाँ विपक्षी कमजोर हैं अथवा भाजपा तेजी से उठ रही है वहाँ-वहाँ विपक्षियों की एक सोची-समझी साजिश के द्वारा ऐसे कार्य किये जा रहे हैं.

कार्यों में नकारात्मकता खोजने में विफल विपक्ष, घोटाले-विहीन सरकार की लोकप्रियता में वृद्धि देख कर घबराता विपक्ष, सरकार के राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कार्यों में सफलता देखकर हताश होते विपक्ष के पास कोई मुद्दा शेष भी नहीं है जिसके आधार पर वे जनता के बीच जा सकें. इसके चलते वे सिवाय नफरत, गुंडागर्दी फ़ैलाने के कुछ और नहीं कर पा रहे हैं, न कुछ और सोच पा रहे हैं. विपक्ष का ये रवैया किसी भी रूप में न तो भाजपा के लिए घातक है और न ही केन्द्रीय सत्ता के लिए. यदि ये रवैया घातक है तो सिर्फ समाज के लिए. इस तरह के कृत्य से समाज में वैमनष्यता बढ़ने का खतरा रहता है आपसी तालमेल समाप्त होने की शंका उभरती है. विपक्षियों को आपस में गलबहियाँ करते समय विचार करना होगा कि उनका गठबंधन काहे के लिए हो रहा है? क्या वाकई वे समाज के लिए एक होना चाहते हैं? क्या उनके एक होने का मकसद सिर्फ सत्ता पाना है? क्या समाज को वाकई केन्द्रीय नेतृत्व से लाभ नहीं मिल रहा है? बहरहाल वर्तमान स्थिति में केन्द्रीय सत्ता को तथा भाजपानीत प्रादेशिक सरकारों को सजग रहने की आवश्यकता है क्योंकि विपक्षी हताशा-निराशा में माहौल बिगाड़ने के अलावा कोई और काम करेंगे नहीं. उनकी गिरती स्थिति का सूचक सिर्फ इतना है कि विपक्षी अब सरकार के कार्यों की बजाय उसके बयानों में कमियाँ खोजने का काम करने लगे हैं. जब देश का, प्रदेश का विपक्ष इतना कमजोर हो जाये कि वो कार्यों के बजाय शब्दों पर राजनीति करने लगे, किसी और के नाम पर अपने कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारने लगे, समाजहित की जगह पर समाज में विध्वंस फ़ैलाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि वातावरण विषाक्त होने वाला है. 

05 जून 2017

पॉलीथीन का नकार, पर्यावरण का बचाव

वर्तमान विकास के दौर में समाज पर्यावरण संकट के दौर से भी गुजर रहा है. वास्तविकता यह है कि इस संकट को खुद मनुष्य ने उत्पन्न किया है. इसके लिए किसी शक्ति को, किसी परमात्मा को, किसी प्राकृतिक आपदा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. मनुष्यों के द्वारा उत्पन्न किया गया पर्यावरण संकट आज मानव समाज के सामने एक चुनौती के रूप में आया है. विकास की अंधी दौड़ में इन्सान ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों को विस्मृत कर दिया है. मानव ने आदिमानव से महामानव बनने के क्रम में प्रकृति को इस बात की परवाह किये बिना क्षतिग्रस्त किया है कि उसकी संतति प्रकृति से क्या पाएगी. स्व-विकास में लिप्त, स्वार्थ में लिप्त इंसान के लिए सोचने का भी समय नहीं कि जिस पर्यावरण में वह साँस ले रहा है, जिस प्राकृतिक वातावरण में वह जीवनयापन कर रहा है उसको नष्ट कर देने से सर्वाधिक नुकसान वह स्वयं का ही कर रहा है. दुष्परिणामस्वरूप पर्यावरण संकट सामने आया है.


सामान्य रूप से पर्यावरण का पारिभाषिक सन्दर्भ संस्कृत के परि उपसर्ग में आवरण शब्द को सम्बद्ध करने से लगाया जाता है अर्थात ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति, जीवधारी, वनस्पति आदि को चारों तरफ से आवृत्त किये हो. पर्यावरण के सामान्य अर्थ से इतर यदि इसका सन्दर्भ निकालने का प्रयास किया जाये तो ज्ञात होता है वर्तमान में जो कुछ भी ज्ञात-अज्ञात हम अपने आसपास देख-महसूस कर रहे हैं, वो सभी पर्यावरण है. हमारे आसपास, हमारे लिए जीवन की एक सम्पूर्ण व्यवस्था का निर्माण करता है, उसे हम पर्यावरण कहते हैं. इसमें सजीव-निर्जीव वस्तुएँ, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, हवा, पानी, मिट्टी, वनस्पति, सूर्य, चंद्रमा, तारे, धरती, आकाश आदि सभी समाहित किये जाते हैं. जल, धरती, आकाश, वायु आदि सभी के साथ वर्तमान में उसका व्यवहार दोस्ताना नहीं रह गया है वरन इनका अधिक से अधिक उपभोग करने की मानसिकता के साथ मनुष्य काम कर रहा है.

विकास के नाम पर शनैः-शनैः प्रकृति को क्षतिग्रस्त करके पर्यावरण में असंतुलन पैदा किया जा रहा है. सुख-समृद्धि के लिए उठाये जा रहे अदूरदर्शी क़दमों के कारण प्रकृति में जबरदस्त असंतुलन देखने को मिल रहा है. ओजोन परत में छेद होना, ग्लेशियरों का पिघलना, अम्लीय वर्षा का होना, बेमौसम की बरसात का होना, बर्फ़बारी की घटनाएँ आदि इस असंतुलन का दुष्परिणाम हैं. जल, वायु, ध्वनि, मृदा आदि प्रदूषण से उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन मानव जीवन के साथ-साथ वन्य प्राणियों के, वनस्पतियों को खतरा पैदा कर रहा है. कल-कारखानों से निकलने वाला धुआँ, वाहनों से निकलती कार्बन मोनो आक्साइड तथा अन्य जहरीली गैसें, बिजली ताप घर से निकलती सल्फर डाई आक्साइड, धूम्रपान से निकलता विषैला धुआँ, तथा अन्य रूप में वातावरण में मिलती निकोटिन, टार अमोनिया, बेंजापाईरिन, आर्सेनिक, फीनोल मार्श आदि जहरीली गैसें व्यक्तियों, जंतुओं, वनस्पतियों आदि को व्यापक रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं. ऐसे में इनसे बचाव के तरीके, इनकी रोकथाम के प्रयासों, प्रदूषण को कम करने पर विचार, पर्यावरण संतुलन बनाये जाने सम्बन्धी प्रयासों, प्रदूषण दूर करने-कम करने संबंधी क़दमों आदि की चर्चा अत्यावश्यक तो है ही, उनको अमल में लाया जाना उससे भी ज्यादा आवश्यक है.


इसमें भी हम देखते हैं कि सर्वाधिक नुकसान पॉलीथीन से होता समझ आ रहा है, दिख भी रहा है. जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें पाली एथीलीन होती है जो एथिलीन गैस बनाती है. इसमें पालीयूरोथेन नामक रसायन के अतिरिक्त पालीविनायल क्लोराइड (पीवीसी) भी पाया जाता है. पॉलीथीन हो या कोई भी प्लास्टिक, उसमें पाये जाने वाले इन रसायनों को नष्ट करना लगभग असंभव ही होता है क्योंकि प्लास्टिक या पॉलीथीन को जमीन में गाड़ने, जलाने, पानी में बहाने अथवा किसी अन्य तरीके से नष्ट करने से भी इसको न तो समाप्त किया जा सकता है और न ही इसमें शामिल रसायन के दुष्प्रभाव को मिटाया जा सकता है. यदि इसे जलाया जाये तो इसमें शामिल रसायन के तत्व वायुमंडल में धुंए के रूप में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं. यदि इसको जमीन में दबा दिया जाये तो भीतर की गर्मी, मृदा-तत्त्वों से संक्रिया करके ये रसायन जहरीली गैस पैदा करते हैं, इससे भूमि के अन्दर विस्फोट की आशंका पैदा हो जाती है. पॉलीथीन को जलाने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस धुंए के रूप में वायुमंडल से मिलकर ओजोन परत को नष्ट करती है. इसके साथ-साथ पॉलीथीन को जमीन में गाड़ देना भी कारगर अथवा उचित उपाय नहीं है क्योंकि यह प्राकृतिक ढंग से अपघटित नहीं होता है इससे मृदा तो प्रदूषित होती ही है साथ ही ये भूमिगत जल को भी प्रदूषित करती है. इसके साथ-साथ जानवरों द्वारा पॉलीथीन को खा लेने के कारण ये उनकी मृत्यु का कारक बनती है.

ये जानते-समझते हुए भी बहुतायत में पॉलीथीन का उपयोग हो रहा है. यद्यपि केन्द्रीय सरकार ने रिसाइक्लड, प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एण्ड यूसेज रूल्स के अन्तर्गत 1999 में 20 माइक्रोन से कम मोटाई के रंगयुक्त प्लास्टिक बैग के प्रयोग तथा उनके विनिर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था किन्तु ऐसे प्रतिबन्ध वर्तमान में सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं. इसका मूल कारण पॉलीथीन बैग की मोटाई की जांच करने की तकनीक की अपर्याप्तता है. ऐसे में पॉलीथीन के दुष्प्रभाव को रोकने का सर्वाधिक सुगम उपाय उसके पूर्ण प्रतिबन्ध का ही बचता है. पॉलीथीन के द्वारा उत्पन्न वर्तमान समस्या और भावी संकट को देखते हुए नागरिकों को स्वयं में जागरूक होना पड़ेगा. कोई भी सरकार नियम बना सकती है, अभियान का सञ्चालन कर सकती है किन्तु उसे सफलता के द्वार तक ले जाने का काम आम नागरिक का ही होता है. इसके लिए उनके द्वारा दैनिक उपयोग में प्रयोग के लिए कागज, कपड़े और जूट के थैलों का उपयोग किया जाना चाहिए. नागरिकों को स्वयं भी जागरूक होकर दूसरों को भी पॉलीथीन के उपयोग करने से रोकना होगा. हालाँकि अभी भी कुछ सामानों, दूध की थैली, पैकिंग वाले सामानों आदि के लिए सरकार ने पॉलीथीन के प्रयोग की छूट दे रखी है, इसके लिए नागरिकों को सजग रहने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे उत्पादों के उपयोग के बाद पॉलीथीन को अन्यत्र, खुला फेंकने के स्थान पर किसी रिसाइकिल स्टोर पर अथवा निश्चित स्थान पर जमा करवाना चाहिए. ये बात हम सबको स्मरण रखनी होगी कि सरकारी स्तर पर पॉलीथीन पर लगाया गया प्रतिबन्ध कोई राजनैतिक कदम नहीं वरन हम नागरिकों के, हमारी भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए उठाया गया कदम है. इसको कारगर उसी स्थिति में किया जा सकेगा, जबकि हम खुद जागरूक, सजग, सकारात्मक रूप से इस पहल में अपने प्रयासों को जोड़ देंगे.


वर्तमान जीवनशैली को, व्यापारिक-वाणिज्यिक स्थिति को, कल-कारखानों-उद्योगों पर मानवीय उपलब्धता, मानवीय रहन-सहन के तौर-तरीकों आदि के चलते ये कल्पना ही लगता है कि सभी लोग पूर्णरूप से पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं किन्तु ये कदापि असंभव नहीं कि एक-एक व्यक्ति खुद को सुधारने का काम कर ले तो पर्यावरण संकट को दूर न किया जा सके. पर्यावरण संकट से निपटने में सबसे बड़ी बाधा व्यक्ति का स्वयं के प्रति ईमानदार न होना ही है और जब तक इन्सान अपने प्रति ईमानदारी से कार्य नहीं करेगा, तब तक इस तरह के अत्यावश्यक कार्यों में समस्या उत्पन्न होती ही रहेगी. इस सम्बन्ध में मनुष्य को ही समाधानात्मक कदम उठाने होंगे. इससे भले ही समस्या पूर्ण रूप से समाप्त न हो पर बहुत हद तक इससे निपटने में सहायता मिल जाएगी.  

04 जून 2017

तोहफे में जीत न दे आना उनको

पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने की कवायद तबसे चलनी शुरू हो गई थी, जबसे उसका जन्म हुआ था. आये दिन किसी न किसी कदम के द्वारा ऐसा होता दिखता है. सम्बन्ध सुधार के दौर में पाकिस्तान की तरफ से बारम्बार इसको बाधित करने का उपक्रम भी चलाया जाता रहा है. एक तरह शांति-वार्ताएं चलती हैं तो दूसरी तरफ अशांति की हरकतें की जाने लगती हैं. पाकिस्तान का अपना इतिहास रहा है नित्य ही भारत के लिए समस्याएँ पैदा करने का. कभी युद्ध के द्वारा, कभी घुसपैठ के द्वारा, कभी आतंकी हमलों के द्वारा, कभी संयुक्त राष्ट्र में बेवजह कश्मीर के मुद्दे को उठाने के द्वारा.


पाकिस्तान की बात ही क्या की जाये, यदि अपने देश के इन नेताओं की, जिम्मेवार लोगों की ही बात की जाये तो ताजा घटनाक्रम में ही भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच को ही लिया जा सकता है. दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध सहज हों, मधुर हों इसको स्वीकार करने वाले पर्याप्त संख्या में हमारे देश में मौजूद हैं. इसके साथ ही ऐसे लोग भी बहुत हैं जो खेलों के द्वारा, सांस्कृतिक वातावरण के द्वारा, साहित्य-कला के द्वारा दोनों देशों के संबंधों-रिश्तों को सुधारने की वकालत करते हैं. हालाँकि समस्त देशवासी ऐसा शत-प्रतिशत रूप से नहीं स्वीकारते हैं. बहुत से नागरिकों ने दोनों देशों के बीच क्रिकेट मैच का एकसुर से विरोध किया है. सोचने की बात है कि एक तरफ देश में सैनिकों के साथ-साथ अनेक मासूम, निर्दोष नागरिकों को पाकिस्तानी आतंक के चलते अपनी जान गँवानी पड़ रही है वहीं दूसरी तरफ सम्बन्ध सुधारने की कवायद में मगन रहने वाले मैच खेलने में लगे हुए हैं. ये अत्यंत शर्मनाक स्थिति तो है ही साथ ही अत्यंत अपमानजनक भी है. ये अपमान उन तमाम शहीदों का है जो आतंकी हमले का शिकार हुए; ये अपमान उन सैनिकों का है जो आये दिन सीमा पर पाकिस्तानी आतंकियों का, पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ का सामना करते हैं.

आज सम्पूर्ण विश्व इस बात को स्वीकारने लगा है कि भारत देश में आतंकी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ है और इससे भी कोई इंकार नहीं करता है कि भारतीय सेना महज इस कारण खामोश रही है कि हमारे देश की सरकारों ने सदैव शांति-वार्ताओं के द्वारा हल निकालना चाहा है. सेना की ख़ामोशी को कमजोरी समझने की भूल न तो पाकिस्तान को करनी चाहिए और न ही भारत में बैठे पाकिस्तान-प्रेमियों को ऐसा करने की छूट है. क्रिकेट हो या फिर कोई और मसला सभी में देश की अखंडता का, देश की सेना के मनोबल का, देशवासियों की भावनाओं का सम्मान किया जाना अनिवार्य होना चाहिए.


अंत में अपनी बात क्योंकि मैच तो रद्द होने से रहा. क्रिकेट का स्व-घोषित महामुकाबला होने वाला है. बहरहाल मैच का परिणाम कुछ भी हो, हमें एक बात का विशेष ध्यान रखना है कि जीतने अथवा हारने वाला देश नहीं होगा बल्कि किसी देश की क्रिकेट टीम जीतेगी और किसी देश की टीम मैच हारेगी. यह सुनना स्वयं में कितना खराब लगता है कि भारत हारा. हालांकि इस तरह की गलती स्वयं हमसे भी हो जाती है पर हमें ही इस बात का ध्यान रखना है कि गलती बार-बार न हो. आप स्वयं देखिये कई बार हमारी टीम बहुत बुरी तरह से हारी है तो मीडिया ने लिख दिया कि फलां देश ने भारत को बुरी तरह से रौंदा. हमारी क्रिकेट टीम हार सकती है, जीत भी सकती है पर हमारा देश भारत कभी नहीं हार सकता, उसे तो बस जीतना है और जीतना ही है.


एक अन्तिम बात कि हमें तो डर लग रहा है कि कहीं पाकिस्तान से दोस्ती दिखाने के चक्कर में हमारी टीम उनको जीत का तोहफा न दे डाले. दोनों देशों के इतने बड़े-बड़े हुक्मरान बैठे होंगे और हमारे देश में वैसे भी पाकिस्तान के सम्बन्ध में बहुत ही कोमल दिल रहता है. कहीं इसी कोमलता के, सहिष्णुता के दर्शन मैच में न हो जायें?