11 April 2014

बदलती राजनैतिक दिशा भविष्य के लिए दुश्वारियाँ




राजनीति किसी भी देश की व्यवस्था सञ्चालन के लिए अनिवार्य है, बिना इसके एक पल भी राष्ट्र-राज्य की व्यवस्था का खड़े रह पाना संभव नहीं है. इस तथ्य को वे सभी भली-भांति जानते-समझते हैं, जो राजनीति करने की मंशा से राजनैतिक क्षेत्र में उतरे हैं और वे भी इसे समझते हैं जो स्वार्थपरक राजनीति करने की लालसा लेकर यहाँ आये हैं. स्पष्ट है जहाँ राजनीति करने का उद्देश्य देशहित, समाजहित, जनहित हो वहाँ सोच व्यापक होती है और जब राजनीति में स्वार्थ जुड़ जाए, लिप्सा जुड़ जाए तो वहाँ सोच सीमित ही हो जाती है. इधर राजनैतिक चरित्रों में लगातार गिरावट आती दिख रही है और ऐसा लगने लगा है जैसे सभी का एकमात्र उद्देश्य स्वार्थपरक राजनीति करना रह गया हो. आज भले ही किसी भी व्यक्ति में अपने नेतृत्व द्वारा दिए गए किसी बयान से; उसके द्वारा उठाये गए किसी कदम से उत्साह जग जाता हो किन्तु भविष्य की दृष्टि से परिणामों की गंभीरता पर विचार नहीं किया जा रहा है.
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आज़ादी के छह दशक से ज्यादा की समयावधि के बाद भी देश का मतदाता कुछ स्वप्नों के आधार पर अपने मत का निर्धारण करता है; आज भी चंद मुफ्त मिलने वाली सुविधाओं के बदले में सरकारें बनवा दी जाती हैं; आज भी बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, रोटी, कपड़ा जैसे मूलभूत आवश्यकताओं के लिए व्यक्ति जूझ रहा है. ये विडंबना नहीं तो और क्या है कि एक तरफ राजनीति में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों की संपत्ति में लगातार उछाल आता रहता है और वहीं दूसरी ओर एक सामान्य नागरिक अभी भी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भटक रहा है. हम मंगल पर अभियान चलाने के लिए यान भेज सकते हैं किन्तु यहाँ सड़क पर सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था नहीं कर पा रहे; लाखों टन अनाज खुले में सड़ता रहता है किन्तु हम किसी गरीब की भूख को शांत नहीं करवा पाते; तकनीक को हम हर हाथ में उतार देने का दम भरते हैं किन्तु किसी महिला को सुरक्षित उसके घर तक पहुँचाने का दावा नहीं कर पाते; उन्नत शिक्षा के लिए हम अपनी पीठ खुद ठोंक लेते हैं किन्तु सड़क पर कूड़ा बीनते, कहीं ढाबों पर काम करते बच्चों को स्कूल भेजने की जहमत नहीं उठा पाते. इन सबके बाद भी हम राजनीति करना चाहते हैं, खुद को राजनेता कहलवाना चाहते हैं किन्तु राजनीति के मूल से कहीं दूर खड़े नजर आते हैं.
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राजनीति सिर्फ सफ़ेद कुरता-पजामा पहन लेना नहीं है, राजनीति सिर्फ मंच पर चिल्ला-चिल्ला कर भाषण दे देना नहीं है, राजनीति सिर्फ विपक्षियों को गाली दे देना भर नहीं है, राजनीति सिर्फ मंहगी-मंहगी गाड़ियों में घूम लेना भर नहीं है, राजनीति सिर्फ चुनाव लड़ लेना भर नहीं है, राजनीति सिर्फ जनप्रतिनिधि बन जाना भर नहीं है, इसके लिए समाजसेवा का, राष्ट्रहित का ज़ज्बा चाहिए होता है. वर्तमान में जिस तरह से सिर्फ सत्ता के लिए लगभग अंधे से होकर हमारे राजनेता काम कर रहे हैं वो दुखद है और उन्हीं का अनुसरण करते हुए जिस तरह से युवा वर्ग राजनीति को प्रेरित हो रहा है वो चिन्तनीय है. भड़काऊ भाषण देकर, नफरत की आग लगा कर, धर्म-जाति के नाम पर लोगों की भावनाओं को भड़का कर, तुष्टिकरण की नीति अपना कर राजनीति नहीं की जा सकती है.

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