31 March 2014

मरते किसान और बेसुध सरकार




देश एक तरफ आर्थिक सशक्तिकरण की बात करता है, सामरिक ताकत में संपन्न होने का दावा करता है, अंतरिक्ष को मुठ्ठी में कैद करने का दम भरता है, वैश्विक महाशक्तियों के समतुल्य होने का अभिमान दिखाता है किन्तु वही देश अपने अन्नदाताओं के बारे में कोई ठोस नीति का निर्धारण नहीं कर पाता है. देश की बहुसंख्यक आबादी कृषि पर निर्भर है और इसी से अपनी आजीविका चलाती है, साथ ही साथ देश को घरेलू तथा अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कृषि साख भी दिलाती है. इसके बाद भी देश की जनता के लिए अन्न उपजाने वाला किसान आज इस हालत में है कि जीवन-संघर्ष से हारकर उसे मौत को गले लगाना पड़ रहा है. देश में लघु एवं सीमान्त किसानों की संख्या बड़े काश्तकारों से अधिक है और इनके पास उसी अनुपात में समस्याएं भी अधिक हैं. जोतों का छोटा होना, कृषि वित्त का अभाव, उन्नत कृषि आदानों की अनुपलब्धता, ग्रामीण साख की कमी, विपणन सम्बन्धी सुविधाओं का न मिल पाना, फसल विक्रय हेतु बाज़ार का संकट ऐसे मुद्दे हैं जिनके चलते लघु एवं सीमान्त किसान कृषि कार्य को बोझ समझने लगे हैं.
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किसानों के अलावा कृषि कार्य में कृषि श्रमिक भी संलग्न होते हैं, जिनकी तरफ सरकारी स्तर से, प्रशासन के स्तर से ध्यान नहीं दिया जा रहा है. मजदूरी की कम दरें, काम के अत्यधिक घंटे, कार्य करने की स्थितियों का अनुकूल न होना, आवास-भोजन की समस्या आदि ने कृषकों के साथ-साथ कृषि श्रमिकों को भी निराश कर रखा है. ऐसी नकारात्मक स्थितियों के चलते भारतीय किसान, कृषि श्रमिक आत्महत्या जैसा जघन्य कार्य कर बैठते हैं. सरकार की तरफ से, प्रशासन की तरफ से, स्वयंसेवी संगठनों की तरफ से ऐसी घटनाओं पर आश्वासन भरे बोल मिल जाते हैं, उसके बाद सब ज्यों का त्यों, पूर्ववत चलने लगता है. सब अपने-अपने काम में लग जाते हैं, किसान फिर अपने आपसे, अपनी समस्याओं से जूझने लगता है.
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सरकार को कृषक वर्ग के लिए, विशेष रूप से लघु एवं सीमान्त किसानों तथा कृषि श्रमिकों के लिए, प्रोत्साहित करने वाली योजनाओं को शुरू करना होगा. ऐसा नहीं है कि अभी तक सरकारी स्तर पर कोई योजना संचालित नहीं है किन्तु अधिसंख्यक योजनाओं पर बड़े काश्तकारों का कब्ज़ा बना हुआ है. बैंक, सहकारी समितियों, मंडियों, विपणन केन्द्रों आदि की सुविधाओं का लाभ लघु एवं सीमान्त किसान नहीं उठा पा रहे हैं. ऐसे में सरकार को चाहिए कि इनके लिए अलग से योजनाओं को शुरू किया जाये. कृषि आगतों की खरीद के लिए, उर्वरकों, खादों, बीजों के लिए ऐसे कृषकों के लिए कोटा निर्धारित किया जाना चाहिए. सरकार द्वारा ऐसे किसानों की फसलों के भण्डारण और विपणन सम्बन्धी व्यवस्था की जानी चाहिए. बैंकों, सहकारी समितियों, अन्य व्यापारिक संस्थाओं से ऐसे किसानों हेतु सस्ते दरों के ब्याज वाले ऋणों की सुविधाएँ उपलब्ध करवाई जानी चाहिए जिससे किसानों को कृषि सम्बन्धी सहायक सामग्री खरीदने में वित्त की समस्या न आने पाए. यदि सरकार की ओर से कृषि सम्बन्धी सहायता लघु एवं सीमान्त किसानों को सहजता से उपलब्ध करवाई जाने लगे तो असमय मौत को गले लगाते किसानों को बचाया जा सकता है, कृषि विकास को भी बढ़ाया जा सकता है.

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