13 January 2014

राजनैतिक विसंगति के और बढ़ने का खतरा




राजनैतिक दलों की अथाह सम्पदा को समेटे भारत देश की झोली में एक और राजनैतिक दल शामिल हो गया. ईमानदारी के चोले में लिपटकर पैदा हुए इस दल ने भ्रष्टाचार मुक्त समाज लाने का वादा उस मंच से किया जिसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ जनलोकपाल बोल को पारित करवाना था. आन्दोलन चलता रहा, अनशन होते रहे और अंततः जैसी कि आशंका व्यक्त की जा रही थी, संवेदनहीन केन्द्रीय नेतृत्व और निर्मोही राजनेताओं के बारम्बार उकसाने को अपना हथियार बनाकर एक और राजनैतिक दल भारतीय राजनीति में प्रविष्ट कर गया. आन्दोलन दो-फाड़ हुआ, आन्दोलन से जुड़े लोग दो-फाड़ हुए और दो-फाड़ हो गईं बहुत से संवेदनशील लोगों की भावनाएँ; दो-फाड़ हो गए तमाम सच्चे आन्दोलनकारियों के सपने. इसके बाद भी सपनों को गूंथने का काम किया गया, अपनों को जोड़ने का काम किया गया और जिन्हें जुटना था वे फिरसे इस राजनैतिक आन्दोलन का हिस्सा बने.
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चुनाव की रणभेरी बजने के बाद की स्थिति में दिल्ली का नक्शा बदला, सियासी रंगत बदली, ईमानदारी की-शुचिता की नई बयार आती दिखी लेकिन ये क्या..!!! व्यवस्था परिवर्तन की पुरजोर अपील करने वाले सत्ता परिवर्तन को लालायित दिखे; जिनके पीछे लट्ठ लिए घूमते रहे उन्हीं के साथ गलबहियाँ करने को आतुर दिखे; खुद के दामन पर दाग न लगें सो जनमत की ढाल बराबर साथ लिए चलते दिखे. बहरहाल व्यवस्था परिवर्तन के स्थान पर सत्ता परिवर्तन ही हुआ, जनता पर बोझ न पड़े इसका ख्याल रखते हुए सत्ता का परिवर्तन हुआ, जो वादे किये हैं उनको अमल में लाया जा सके इसके लिए सत्ता का परिवर्तन हुआ. समर्थकों ने ख़ुशी जाहिर की, विपक्षियों ने नई बोतल में पुरानी शराब को भरने का ढोंग बताया. ईमानदार, भ्रष्टाचार-मुक्त, रिश्वत-मुक्त व्यवस्था देने के वायदे के पहले ही वही घुट्टी दिल्ली की जनता को पिलाई गई, जिस घुट्टी का उपयोग दशकों से इस देश के विभिन्न राजनैतिक दल करते चले आ रहे हैं. मुफ्त का माल देने, सब्सिडी का बोझ लादने का कृत्य ठीक उसी तरह से किया गया जैसे कि बाकी सत्ताधारियों ने समय-समय पर अपने मतदाताओं को खुश रखने के लिए किया है; अपने वोट-बैंक को दुरुस्त रखने के लिए किया है. फिर कहाँ हुआ व्यवस्था में परिवर्तन, कहाँ हुआ भ्रष्टाचार-मुक्त समाज की नींव स्थापित करने का सपना पूरा.
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राजनीति में उतरना, कुछ सीटों को जीतकर किसी अन्य दल की सहायता से सरकार बना लेना एक बात है किन्तु समाज में व्याप्त अव्यवस्थाओं को दूर करने के स्थान पर उन्हीं अव्यवस्थाओं को नया मुलम्मा चढ़ाकर पेश कर देना कोई हल नहीं है. बिलों का आधा या फिर माफ़ कर देना समस्या का समाधान नहीं है; बढती कीमतों को कम करने के, नियंत्रित करने के स्थान पर सब्सिडी को जारी रखना कोई स्थायी हल नहीं है. ये भी एक प्रकार की बाजीगरी है जो समर्थक दल के सहयोग से और मीडिया की अंध-भक्ति के द्वारा पूरी की जा रही है. हालाँकि अभी चंद दिनों के क्रियाकलापों के द्वारा अंतिम निर्णय देना भी न्यायसंगत नहीं होगा किन्तु जिस तरह से पूर्व-निर्मित राजनैतिक सहायता सम्बन्धी राह पर इन नए स्व-घोषित ईमानदार पार्टी द्वारा आगे बढ़ा जा रहा है; जिस तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी, सीमा सुरक्षा सम्बन्धी, सैन्य मामलों सम्बन्धी मुद्दों पर इस नई-नवेली, अति-उत्साही पार्टी द्वारा, इनके पदाधिकारियों द्वारा बयानबाज़ी की जा रही है वह निश्चित ही इनके भविष्य की रूपरेखा को स्पष्ट करती है.
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राजनीति के शोध-चिंतकों को, मीडिया के अनावश्यक उत्साही पत्रकारों को, नवोन्मेषी पार्टी के फर्श से अर्श पर पहुँचे समर्थकों को समझना-जानना चाहिए कि जयप्रकाश नारायण जी के आन्दोलन का प्रभाव समूचे भारतवर्ष पर था, सम्पूर्ण देश में सत्ता के साथ-साथ केंद्र की सत्ता को हिलाकर रख दिया था, देश के अनेक राजनैतिक दलों को एकसूत्र में बांधकर केंद्र की तानाशाही के विरुद्ध बिगुल फूंका था, स्वयं को किसी पद के बंधन से मुक्त करके अपने स्वरूप को और विराट कर लिया था....इसके बाद भी उसका अंतिम परिणाम सुखद नहीं रहा. समझना होगा कि कहीं महज सत्ता परिवर्तन के लिए, महज किसी दल विशेष को रोकने के लिए, अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए ही ये कवायद की जा रही है तो आने वाले दिनों में फिर राजनैतिक निरंकुशता को, राजनैतिक विसंगतियों को, समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त कर पाना या फिर रोक पाना लगभग असंभव ही हो जायेगा.
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