23 सितंबर 2012

'हलकट जवानी' का अर्थ क्या समझाया जाए...


            देश में घोटालों, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, मंहगाई आदि के बीच सांस्कृतिक प्रदूषण की बात करना बेमानी सा लगने लगा है? यह ऐसा सवाल है जो कई दिन से मन-मष्तिष्क को मथ रहा है किन्तु स्वयं ही इसका जवाब प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। विगत दिनों अपने एक परिचित से मिलने पर उनकी छोटी बेटी ने एक सवाल हमारी तरफ उछाल मारा। हम सवाल सुनकर एकदम अकबका गये, समझ ही नहीं आया कि इस सवाल का क्या जवाब दें? उसके इस सवाल ‘‘अंकल, ये हलकट जवानी किसे कहते हैं?’’ पर हमने उसके समक्ष टालने वाली मुद्रा बनाई तो उसने कहा कि इसका जवाब पापा-मम्मी भी नहीं दे सके थे, सोचा आप हिन्दी पढ़ाते हैं तो आपको जरूर पता होगा। अब चौंकने की बारी थी, हिन्दी के नाम पर हलकट जवानी का क्या अर्थ बताया जाये

            बच्चों की उत्सुकता, जिज्ञासा को शान्त करने को लेकर हमेशा से हमारा नजरिया अलग सा रहा है। हमारा मानना है कि यदि बच्चों द्वारा कभी इस तरह के सवाल पूछे जायें जिनका उत्तर देना आसान न हो, व्यावहारिक अथवा सहज न हो तो उसमें टालमटोल करने के स्थान पर शंका का समाधान सरल से शब्दों में कर दिया जाये। विकास की अवस्था में आते-आते बच्चों को स्वयं उनका जवाब ज्ञात हो जाता है। कुछ ऐसा ही सोचकर उस बच्ची से कहा कि जो स्वभाव से तेज-तर्रार होता है और जवान होता है उसे हलकट जवानी कहते हैं। उसे कुछ इधर-उधर के उदाहरण देकर एक प्रकार से समझाने का प्रयास किया। ऐसा भी लगा कि वह हमारी बात को मात्र इस कारण से स्वीकार कर रही है कि हम हिन्दी पढ़ाते हैं और लिखते भी हैं।

            उस बच्ची के यह सवाल करने से पहले भी हमारे मन में कई बार यह विचार आया था कि इस तरह की शब्दावली कितनी आसानी से हमारे घरों में प्रविष्ट होती जा रही है। कितनी सहजता से गालियाँ हमारे साहित्य का, हमारी फिल्मों का, हमारे धारावाहिकों का प्रमुख भाग होती जा रही हैं और हम उसे पूर्ण स्वीकार्यता भी प्रदान कर रहे हैं। जिस तरह से नग्नता को समाज का भाग बताकर, दर्शकों की माँग बताकर हमारे घरों में जबरन घुसाया गया ठीक उसी तरह से गालियों को भी हमारे घरों में पहुँचाने का कुचक्र रचा जा रहा है। यह एक प्रकार का सांस्कृतिक आतंकवाद है, सांस्कृतिक प्रदूषण है जिसे हम रोकने का लेशमात्र भी प्रयास नहीं कर रहे हैं।

            हमें प्रत्येक कार्य के लिए सरकारों का मुँह ताकने की प्रवृत्ति को छोड़ना होगा। हमें अपने परिवार में अपने बच्चों को संस्कृति, सभ्यता के बारे में समझाना होगा। उन्हें बताना होगा अपने देश के महापुरुषों के बारे में, देश के आदर्श व्यक्तित्व के बारे में, नैतिक शिक्षा के बारे में। यदि हम ऐसा करने में असफल रहते हैं तो आने वाले दिनों में हमारे बच्चे हलकट जवानी से भी नीचे उतर कर पूछताछ करेंगे, तब हमारे लिए बगलें झाँकने के सिवाय और कोई रास्ता भी नहीं होगा।

11 सितंबर 2012

राष्ट्रद्रोह न सही पर ये कृत्य क्षम्य भी नहीं है

एक कार्टून का सामने आना और उसके बाद से एक अनाम से कार्टूनिस्ट को देशव्यापी पहचान मिलना सिर्फ और सिर्फ एक जल्दबाजी भरे कदम के कारण हुआ। असीम की गिरफ्तारी के बाद से देश में उतना हंगामा नहीं हुआ जितना कि सोशल मीडिया ने दिखा दिया। तमाम सारे ऐसे लोग भी असीम के समर्थन में, सरकार के समर्थन में; असीम के विरोध में, सरकार के विरोध में दिखे जिन्होंने अपने इस समर्थन/विरोध करने तक की समयावधि में असीम के बनाये उस कार्टून को देखा तक नहीं था।

सोशल मीडिया में और इंडिया अगेंस्ट करप्शन के लोगों द्वारा समूची घटना को और कार्टूनिस्ट असीम को इस तरह से प्रचारित किया गया जैसे कि उस कलाकार ने बहुत महान कार्य किया हो और महाराष्ट्र पुलिस ने घनघोर अपराध कर दिया हो। एक पल को इस बात को स्वीकारा भी जाये कि महाराष्ट्र पुलिस ने उस व्यक्ति पर राष्ट्रद्रोह जैसा केस बनाने की अतिवादिता की तो भी इस बात से इंकार नहीं किया जाना चाहिए कि असीम के द्वारा राष्ट्रीय चिन्ह से खिलवाड़ किया गया है। असीम के समर्थन में खड़े उन तमाम लोगों की समझ पर तरस आना चाहिए जो उसके बनाये कार्टून को व्यवस्था के विरोध में एक आम आदमी की हताशा, उसका आक्रोश बता रहे हैं। आखिर अपना विरोध प्रकट करने के लिए क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को विकृत कर देना सही ठहराया जाना चाहिए?

इस तरह के सवाल पर बहुत से सोशल मीडिया पहरुआ और मीडिया के सामने अपना चेहरा दर्शाकर दो-चार बाइट्स देने वाले असीम के विरोध में आये लोगों को समझा रहे हैं कि उस कार्टून के पीछे की मानसिकता को देखा जाना चाहिए। चलिए, एक पल को इस बात पर सकारात्मक रूप से विचार भी कर लिया जाये कि कार्टून के पीछे की मानसिकता सरकार की अव्यवस्था के प्रति विद्रोह है, तमाम सारे राजनैतिज्ञों के घोटालों से उपजी हताशा है तो क्या ऐसी किसी अन्य सकारात्मक मानसिकता के लिए देश के किसी अन्य राष्ट्रीय प्रतीक से खिलवाड़ को सहज स्वीकार किया जाना चाहिए? यदि इसका जवाब भी हां है तो हमें अपने राष्ट्रगान को भी जैज, पॉप आदि धुनों में ढालकर उसे संगीत के क्षेत्र में दिये जाने वाले विश्वस्तरीय ग्रेमी एवार्ड के लिए भेजना चाहिए। शादी, डिस्कोथिक में, पब आदि में उसे बजवाकर युवाओं को थिरकने का मौका देना चाहिए। लोगों में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए हमारे राष्ट्रीय ध्वज को वस्त्रों के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए।

जिस तरह से और जिस केस में असीम की गिरफ्तारी हुई है उसका विरोध होना चाहिए किन्तु असीम का भी विरोध इस बात के लिए होना चाहिए कि उसने कहीं न कहीं हमारी, इस देश की भावना को ठेस पहुंचाई है। सम्भव है कि व्यापक जनविरोध के चलते महाराष्ट्र सरकार असीम को रिहा कर दे किन्तु उसका यह कहना कि वह बार-बार ऐसा करता रहेगा, कहीं न कहीं उस अतिवादिता को दर्शा रहा है जो उसके पूर्ववर्ती अपनी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर दर्शा चुके हैं। यदि असीम को उसके इस अक्षम्य कृत्य के लिए क्षमा कर दिया जाता है तो हम आने वाले दिनों में भारतमाता के, हिन्दू देवियों के नग्न चित्रों को उसकी कलम से बना हुआ देखेंगे; उसके द्वारा तिरंगे का अपमान होता हुआ भी देखेंगे; राष्ट्रगान को डिस्कोथिक, पब में बजता हुआ देखेंगे।

06 सितंबर 2012

बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी की पहली ई-बुक का विमोचन


दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई के शिक्षाशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो0 सत् चित् आनन्द द्वारा लिखित ई-बुक का विमोचन आज 6 सितम्बर 2012 को बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी के कुलपति प्रो0 एस0वी0एस0 राणा के करकमलों से हुआ। यह बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी की पहली ई-बुक है। प्रिसिंपल ऑफ एजूकेशननामक इस ई-बुक में प्रो0 सत् चित् आनन्द द्वारा बी00 प्रथम वर्ष के प्रथम प्रश्नपत्र के पाठ्यक्रम को समाहित किया गया है। विश्वविद्यालय कैम्पस में एक सादा समारोह में विमोचन करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने प्रो0 आनन्द के इस प्रयास की सराहना की और कहा कि आज के तकनीकी भरे दौर में इस तरह के कदमों की आवश्यकता है। इससे न केवल विद्यार्थियों को लाभ होगा वरन् विश्वविद्यालय तथा सम्बन्धित महाविद्यालय की गरिमा भी बढ़ती है। बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से सम्बन्धित इस पहली ई-बुक के आने से विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट का पुस्तकालय भी समृद्ध होगा। आने वाले दिनों में यदि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापक अपने-अपने विषय से सम्बन्धित पाठ्यक्रम के आधार पर ई-बुक का निर्माण करें तो इससे विद्यार्थियों के समक्ष पाठ्यक्रम से सम्बन्धित अध्ययन सामग्री का अभाव नहीं रह जायेगा।


बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी की पहली ई-बुक के लेखक प्रो0 सत् सित् आनन्द ने बी00 प्रथम वर्ष के प्रथम प्रश्नपत्र पर आधारित अपनी इस पुस्तक के बारे में विस्तार से कुलपति और सभाकक्ष में उपस्थित समस्त लोगों को समझाया। प्रो0 आनन्द ने कुलपति महोदय को इस जानकारी से भी अवगत करवाया कि बी00 प्रथम, द्वितीय, तृतीय वर्ष के समस्त प्रश्नपत्रों के पाठ्यक्रम को ई-बुक के रूप में लाने का कार्य चल रहा है और शीघ्र ही ये समस्त ई-बुक विद्यार्थियों के अध्ययन हेतु उपलब्ध होंगी।




बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ0 अरुण कुमार श्रीवास्तव ने प्रो0 आनन्द की जागरूकता की प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने हमेशा छात्रहित के कार्य किये हैं और इस ई-बुक के निर्माण से भी छात्रों को लाभ पहुंचेगा। इसी के साथ डॉ0 श्रीवास्तव ने कुलपति महोदय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके द्वारा विश्वविद्यालय की पहली ई-बुक का विमोचन किये जाने से अन्य जागरूक और सक्रिय प्राध्यापकों में भी उत्साह का संचार होगा और इसका लाभ समृद्ध पुस्तकालय के रूप में हमारे सामने आयेगा।

0प्र0 राजनीतिविज्ञान परिषद् के प्रदेश अध्यक्ष डॉ0 आदित्य कुमार ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे तकनीकी भरे कार्य सदैव से प्रो0 आनन्द के करकमलों से होते रहे हैं। आज इस ई-बुक के रूप में बुन्देलखण्ड के शैक्षिक वातावरण के लिए एक मील का पत्थर रखा गया है। आने वाले दिनों में प्रो0 आनन्द के इस कार्य से प्रोत्साहन लेकर अन्य प्राध्यापक भी बुन्देलखण्ड के शैक्षिक वातावरण को उन्नत करने में अपना योगदान देंगे।

गांधी महाविद्यालय, उरई के शिक्षाशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ00 पी0 शर्मा ने कहा कि आज का दिन समूचे बुन्देलखण्ड के लिए गौरव का दिन है और व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए इसलिए भी गौरव और प्रसन्नता का विषय है कि विश्वविद्यालय की पहली ई-बुक उनके अपने विषय में आई है। कुलपति जी के सकारात्मक रवैये से आने वाले दिनों में अन्य विषयों में भी ई-बुक की रचना की जायेगी।

ई-बुक के विमोचन समारोह में उक्त लोगों के अतिरिक्त प्रो0 सत् चित् आनन्द की धर्मपत्नी श्रीमती सुमन आनन्द, डी0वी0 कॉलेज, उरई की संगीत विभागाध्यक्ष डॉ0 वीणा श्रीवास्तव, बूटा महामंत्री डॉ0 टी0 के0 शर्मा, विश्वविद्यालय कैम्पस, समाज अध्ययन विभागाध्यक्ष डॉ0 नईम बॉबी, स्ववित्तपोषित महाविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ0 राजीव कुमार, पी-एच0डी0 होल्डर्स एसोसिएशन के संयोजक डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर सहित कई अन्य प्राध्यापक तथा विश्वविद्यालय कर्मचारीगण भी उपस्थित रहे।