23 November 2020

नजरिया बदलने से आएगा साम्प्रदायिक सद्भाव

राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भाव प्रतिष्ठान द्वारा 19-25 नवम्बर 2020 तक सांप्रदायिक सद्भाव सप्ताह का आयोजन कर रहा है. इसके लिए उसके द्वारा देश भर में विभिन्न आयोजन उसके द्वारा करवाए जा रहे हैं. इसकी स्थापना 19 फरवरी 1992 को की गई थी. इसका उद्देश्य देशभर में सांप्रदायिक सद्भावना की स्थापना करना है. सवाल उठता है कि सांप्रदायिक सद्भाव है क्या? आखिर देश में आये दिन साम्प्रदायिकता, सांप्रदायिक सद्भाव की बात उठती क्यों है? यहाँ समझना होगा कि सांप्रदायिक सद्भाव का तात्पर्य किसी भी स्थान पर विभिन्न धर्मों के लोगों का एकसाथ, मिलजुल कर, अच्छी भावना के साथ रहने से लगाया जाता है. देखा जाये तो यह सांप्रदायिक सद्भाव की विस्तृत दृष्टि है मगर देश में जब भी सांप्रदायिक सद्भाव की चर्चा की जाती है तो सिर्फ हिन्दू और मुसलमान से संदर्भित करके देखा जाने लगता है. जैसे ही साम्प्रदायिकता की बात होती है तो उसे बिना किसी जाँच-पड़ताल के हिन्दू, मुसलमान से जोड़ दिया जाता है. जैसे ही साम्प्रदायिकता की चर्चा होती है वैसे ही देश भर में सबकी दृष्टि में गुजरात उभर आता है, गोधरा-काण्ड के बाद के दंगे उभर आते हैं. ये सोच या दृष्टि सांप्रदायिक सद्भाव की विस्तृत सोच के ठीक उलट है.




कोरोना के इस माहौल के बीच सभी अपनी-अपनी तरह से आयोजन को मनाने में लगे हैं मगर यहाँ भी अनेक सवाल फिर उठते हैं कि आखिर देश में सांप्रदायिक सद्भाव की आवश्यकता पड़ती क्यों है? क्यों सरकारों को ऐसे आयोजन करवाने पड़ते हैं? क्यों देशवासियों को सांप्रदायिक सद्भाव बनाये रखने सम्बन्धी शपथ दिलवाई जाती है? क्यों इन सब प्रयासों के बाद भी सांप्रदायिक सद्भाव की स्थापना नहीं हो पा रही है? क्यों साम्प्रदायिकता के नाम पर आये दिन खून-खराबा होता रहता है? क्यों साम्प्रदायिकता का तात्पर्य सिर्फ हिन्दुओं, मुसलमानों से लगाया जाता है? इन सवालों का जवाब सरकारों के पास तो कतई नहीं है. इनके जवाब खोजने के लिए हम नागरिकों को अपने आपसे बात करनी होगी. खुद के व्यवहार को, सोच को, मानसिकता को समझना होगा. ये समझने वाली बात ही है जहाँ क्षेत्र, धर्म, जाति के आधार पर सभी नागरिक बंटे हुए हों वहाँ सांप्रदायिक सद्भाव के लिए ऐसे आयोजनों का कोई महत्त्व नहीं.


एक-एक व्यक्ति को खुद में बदलाव लाना होगा. सैद्धांतिक रूप से यह बात बहुत सुन्दर लगती है मगर व्यावहारिक रूप में इस पर अमल कर पाना सहज नहीं होता. जब तक व्यक्ति के अन्दर से खुद को क्षेत्र, धर्म, जाति अथवा किसी अन्य कारण से श्रेष्ठ समझने की प्रवृत्ति समाप्त नहीं होती तब तक सांप्रदायिक सद्भाव जैसी स्थिति व्यवहार में बनती समझ नहीं आती. पूरे देश में इक्का-दुक्का जो भी मामले सांप्रदायिक सद्भाव के सामने आते हैं, वे ऐसे ही व्यक्तियों के कारण संभव हैं जिन्होंने अपनी सोच को, अपनी मानसिकता को समझ लिया है, बदल लिया है. यह सबसे प्रमुख है कि जब तक इन्सान स्वयं को बदलने का भाव नहीं रखता किसी सरकार के, किसी प्रतिष्ठान के वश में नहीं कि वह सांप्रदायिक सद्भाव की स्थापना कर दे.


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