16 July 2018

नकारात्मकता को त्याग कर ही होगा विकास


गणितीय नियमों के अनुसार दो ऋण मिलकर भले ही धन बना देते हों मगर जीवन में एक भी ऋण परेशानी पैदा कर देता है। यहाँ ऋण का तात्पर्य किसी तरह के आर्थिक क़र्ज़ लेने से नहीं वरन सोच में, कार्य में, रहन-सहन में, बातचीत में आती जा रही नकारात्मकता से है। वर्तमान में समाज में बहुतायत में नकारात्मकता देखने को मिल रही है। परिवार के स्तर से लेकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नकारात्मकता विभिन्न चरणों में, विभिन्न स्तरों में देखने को मिल रही है। काम करने का ढंग, जीवन-शैली, सोचना-समझना, तर्क-वितर्क, सामाजिक सरोकार आदि-आदि में नकारात्मकता परिलक्षित हो रही है। लगातार विकासोन्मुख होता इन्सान उसी के सापेक्ष नकारात्मक होता जा रहा है। ऐसा लगने लगा है जैसे इन्सान नकारात्मकता में ही अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। इस नकारात्मक सोच के पीछे खुद इन्सान की ही बहुत बड़ी भूमिका है। किसी भी तरह की जरा सी परेशानी को, छोटे से कष्ट को, किसी छोटी सी घटना को वह अपने दिल-दिमाग में इस कदर बैठा लेता है कि उसके सापेक्ष सम्पूर्ण जीवन का निर्धारण करने लगता है, उन्हीं घटनाओं के सन्दर्भ में आने वाले समय की सफलताओं-असफलताओं को निर्धारित करने लगता है। अतीत की समस्याओं, परेशानियों, कष्टों को वर्तमान अथवा भविष्य के साथ जोड़कर कार्य करने से जहाँ एक तरफ कार्य-क्षमता प्रभावित होती है वहीं दूसरी तरफ अन्य विकासात्मक कार्यों में भी व्यवधान पड़ता है।


असल में किसी भी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, नकारात्मकता उसकी सोच पर निर्भर करती है। यह भी सच है कि परिस्थितियाँ भी किसी न किसी रूप में मनुष्य के सोचने-समझने को प्रभावित करती हैं किन्तु इसके बाद भी उससे बड़ा सच यह है कि यदि मनुष्य अपने आपको स्थिर रखे, संयमित रखे, नियंत्रित रखे तो निसंदेह वह अपनी सोच को भी नियंत्रित कर सकता है। इसी सोच के द्वारा वह अपने आपको परिस्थितियों से बाहर निकाल पाने में सक्षम होता है। देखा जाये तो किसी के भी जीवन में सकारात्मकता हो या फिर नकारात्मकता, वह कहीं बाहर से नहीं आती है। ये उसकी सोच और उसके बाद के क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। ऐसा इसलिए क्योंकि नकारात्मकता आने पर या फिर लगातार बढ़ते जाने पर व्यक्ति के स्वभाव-व्यवहार में निराशा, हताशा, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, उदासी, तनाव आदि साफ़-साफ़ परिलक्षित होने लगते हैं। इसके चलते उसका व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है। यदि उसके द्वारा बहुत जल्दी अपने इस स्वभाव पर, अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं किया जाता है, अपनी नकारात्मकता पर अंकुश नहीं लगाया जाता है तो उसके स्वभाव में दिखने वाले नकारात्मक लक्षणों की तीव्रता बढ़ती जाती है। इसके चलते वह अपने परिजनों, सहयोगियों, सामाजिक क्रियाकलापों में तन्हाई का, अकेलेपन का अनुभव करने लगता है। इसके साथ-साथ ऐसे व्यक्तियों में प्रत्येक कामों में, प्रत्येक गतिविधियों में नकारात्मकता ही नजर आने लगती है। उसकी आँखों के सामने से गुजरने वाली किसी भी गतिविधि में दोष ही नजर आने लगता है। उसके सामने वाले सफल व्यक्ति के व्यक्तित्व में भी खोट नजर आने लगती है।

ऐसा नहीं है कि किसी व्यक्ति के जीवन में आई नकारात्मकता को दूर नहीं किया जा सकता है। चूँकि यह स्थिति विशुद्ध सोच पर, मानसिकता पर आधारित है, इस कारण इससे छुटकारा भी पाया जा सकता है। नकारात्मकता को सकारात्मकता में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले तो किसी भी व्यक्ति को अपने विश्वास को, अपनी सोच को कमजोर नहीं मानना चाहिए। आत्मविश्वास को सर्वोच्च स्तर तक बनाये रखने वाले व्यक्ति किसी भी तरह की नकारात्मकता को अपने आसपास फटकने भी नहीं देते। ऐसे व्यक्ति जिनको छोटी-छोटी समस्याओं, परेशानियों के चलते नकारात्मक विचार आने शुरू हो जाते हैं उन्हें सदैव ऐसे लोगों से मिलने से बचना चाहिए जो सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक बातों को प्रश्रय देते हैं, उन्हें बढ़ावा देते हैं। व्यक्ति को किसी भी स्थिति में अपना नियंत्रण न खोते हुए इस पर अमल करना चाहिए कि मैं ऐसा कर सकता हूँ। अक्सर देखने में आता है कि व्यक्ति आपसी वार्तालाप में नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करता है, अपने साथ होने वाले कष्ट को, दुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करता है, उसे ऐसा करने से बचना चाहिए। सकारात्मक शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए। इसके साथ-साथ जीवन को निरुद्देश्य समझकर गुजारने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अपना महत्त्व है और वह उसी के अनुसार इस समाज में अपना योगदान दे रहा होता है। समाज में अपना योगदान से रहे ऐसे लोगों को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए साथ ही अपने किसी शौक को भी स्थापित करने की आवश्यकता है। बहुधा देखने में आता है कि व्यक्ति लगातार कार्य करने के बाद भी समाज में, परिवार में उस प्रस्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता है जिसका हक़दार वह खुद को समझता है। इसके चलते भी उसमें नकारात्मक सोच का जन्म होने लगता है। ऐसे व्यक्तियों को अपने किसी न किसी शौक के द्वारा अपने व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास करना चाहिए।

गणितीय नियमों की तरह सामाजिक जीवन में भी नकारात्मक को सकारात्मक में बदला जा सकता है। इसके लिए मनुष्य को अपने कार्य से संतुष्टि, अपनी सोच में विश्वास, अपने रहन-सहन में नियंत्रण, अपने जीवन को उद्देश्यपरक बनाये रखना चाहिए। याद रखना होगा कि मनुष्य की सकारात्मकता ही मनुष्य को सफलता प्रदान करवाती है, उसे मंजिल तक ले जाती है, समाज को दिशा प्रदान करती है।


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