27 June 2018

महबूबा मौत और जिन्दगी का सच


लोगों से मिलने-मिलाने के क्रम में, जानकारियों, सूचनाओं का आदान-प्रदान करने के दौरान, पढ़ने-लिखने के शौक में अक्सर देखने में आता है कि लोगों को जीवन के बारे में दार्शनिक रूप में अपनी राय रखने में बड़ा ही आनंद आता है. ऐसे लोगों का अपनी जीवन-शैली को लेकर, अपने जीवन-निर्वहन को लेकर, अपने सुखों, अपने दुखों, अपने रिश्तों, अपने संबंधों, अपने रोजगार, अपनी आजीविका आदि को लेकर उसका शायराना, दार्शनिक, सूफियाना अंदाज दिखाई देता है. क्षणभंगुर जीवन की स्वीकार्यता महज उनकी बातों में दिखाई देती है. ऐसा लगता है जैसे वे जीवन के प्रतिक्षण सिर्फ और सिर्फ मौत को गले लगाने को बैठे हैं. ऐसे लोगों की बातों में एक फ़िल्मी गीत ज़िन्दगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी जैसा ज़िन्दगी और मौत का जबरदस्त दर्शन दिखाई देता है. इन लोगों को अपने साथ चलती ज़िन्दगी की कद्र नहीं होती है, जिन्दगी को जिन्दगी बनाने वालों की चिंता नहीं होती, जिन्दगी के वर्तमान का आनंद लेने की फुर्सत नहीं होती है. इसके उलट अपने शब्दों के, बातों के बताशे फोड़ते हुए ये लोग मृत्यु नामक महबूबा के लिए परेशान रहते हैं. उसके साथ जाने की आतुरता है. ये और बात है कि इस दर्शन को मानने वालों में से किसी ने भी अपने आप आगे कदम बढ़ाकर अपनी महबूबा का हाथ नहीं थामा है.


यहाँ आकर ज़िन्दगी और मौत की हमारी अपनी ही एक अलग थ्योरी है. आखिर मौत को किसलिए, किस कारण महबूबा माना जाता है? क्या ऐसा मानने वाले अपनी जिन्दगी के ऊब चुके होते हैं? क्या उन्हें अपनी जिन्दगी से किसी तरह का आनंद नहीं मिल रहा होता है? असल में ज़िन्दगी एक जीवनसाथी के समान है, एक मित्र के समान है जो आपके साथ है, आपके कदम से कदम मिलाकर साथ चल रही है और शायद इसीलिए ऐसे लोगों को जिन्दगी की कद्र नहीं है. जिन्दगी वही है जो आपके साथ है, अच्छे में, बुरे में, आपके साथ लड़ती-झगड़ती भी है. आपसे प्यार-दुलार भी करती है. कहने का आशय कि आपको अच्छे दिन भी दिखाती है, आपको बुरे दिन भी दिखाती है.

अब जैसे कहा जाता है न कि दूसरे की थाली का भात बहुत पसंद आता है, ठीक इसी तरह अपने साथ रहती ज़िन्दगी पसंद नहीं आती. सो एक अदद मौतरुपी महबूबा खोज लाये, ज़िन्दगी में थ्रिल के लिए. खुद को ये समझाने के लिए कि ज़िन्दगी रुपी जीवनसाथी के अलावा भी हमारे पास एक महबूबा है. खुद को मौज-मस्ती के चरम तक ले जाने के लिए कि हमारे पास भी महबूबा है. आराम से सपनों में चैटिंग करके, नींद में व्हाट्सएप्प करके, अचेतन में मोबाइल घुमाकर अपनी महबूबा की तस्वीर बनाकर मौज-मस्ती कर लिया करते हैं. कुछ अपनी महबूबा को सड़कों पर खोजते फिरते हैं. कुछ तेज रफ़्तार बाइक के द्वारा, कुछ बाइक के स्टंट के द्वारा, कुछ हैरतअंगेज करतबों के द्वारा आये दिन महबूबा को बुलाते रहते हैं. इसके बाद भी इनमें से किसी ने चाहकर भी अपनी महबूबा का आलिंगन नहीं किया और न ही करना चाहा. हाँ, लोगों के सामने अपनी महबूबा की तारीफ के लिए, खुद को बहुत रोमांटिक दिखाने के लिए वे बात-बात में मौत को चैलेंज करते रहते हैं. कल मरते हों तो आज मर जाएँ, मौत हमारे लिए बाँए हाथ का खेल है, ज़िन्दगी से ऊब गए, अब मौत की नींद सोना है आदि-आदि जैसे कथनों से सिर्फ बातों के बताशे ही फोड़े जाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि मौतरुपी महबूबा से खेलने में और उसके साथ हँसते-हँसते चल देने में बहुत बड़ा अंतर है. बहुतों को देखा है जबकि इस महबूबा के आने की आहट हुई तो सकपका गए. जो भी सामने मिला उसी के हाथ-पैर जोड़कर मौतरुपी महबूबा से मुक्ति पाने की कामना करने लगे. उस समय उनको मौत महबूबा नहीं वरन किसी चुड़ैल जैसी लगने लगी. ज़िन्दगी तब बेवफ़ा नहीं वरन जीवनसाथी सी लगने लगी. एक झटके में सारी दार्शनिकता, सारा शायराना अंदाज हवा हो जाता है. सामाजिक दायित्व, कर्तव्य, परिवार, माता-पिता, भाई-बहिन, जीवनसाथी, बच्चे, दोस्त, रिश्तेदार दिखाई देने लगते हैं. महबूबा के साथ चलने में असमर्थता दिखने लगती है. बड़े से बड़े चिकित्सालय के साथ-साथ गली-कूचे का तांत्रिक असरकारी नजर आने लगता है.

ऐसे ही विषम मोड़ पर ज़िन्दगी का मोल समझ में आता है. ऐसे ही संकट के समय महबूबा के साथ आलिंगनबद्ध होने की असल परीक्षा होती है. संकट का एक पल सामने आता है  तो मौत जैसी महबूबा से अधिक अहमियत ज़िन्दगी सरीखे जीवनसाथी  की समझ आती है. समझ आता है कि ज़िन्दगी बेवफा नहीं वरन वही है जो साथ चल रही है. मौतरुपी महबूबा तो सिर्फ परिवार बिगाड़ने आई है. अपनों से अपने को दूर करने आई है. अपनों  की आँखों में आंसू देने आई है. उनके घरों में झाँक कर देखो जहाँ किसी नौजवान की मृत्यु हुई है, उन परिवारों से पूछो जिन्होंने अपने घर का आधार-स्तम्भ खोया है, उन लोगों से पूछो जिन्होंने अपने सिर से आशीर्वाद का साया खोया है तब पता चलता है कि महबूबा कौन है मौत या जिन्दगी. दर्शन बहुत अलग चीज है, इसके सहारे जीवन नहीं चला करते. सच तो ये है कि ज़िन्दगी ही अंतिम सत्य है, यदि वही बेवफ़ा है तो वही महबूबा भी है. बस एक बार महबूबा की तरह उससे रोमांस करके तो देखो, मौतरुपी महबूबा को भूलकर ज़िन्दगीरुपी महबूबा के आलिंगन में बंधे रहोगे. उसी के प्रेम में निमग्न रहोगे.

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