18 April 2018

पहले साहित्य का मर्म तो समझो


पिछले दिनों एक महाशय सोशल मीडिया पर कुछ तना-तनी करते दिखे, एक टिप्पणी को लेकर। सवाल साहित्यकार को लेकर उठा जो एक विवाद के रूप में सामने आया। किसी ने उसे अपने स्वाभिमान पर लिया तो किसी ने साहित्यकार शब्द पर ही संशय कर डाला। चूँकि हम हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और एक सवाल हमेशा हर उस व्यक्ति से पूछते हैं जो अपने को साहित्य से जुड़ा बताता है कि साहित्य किसे कहेंगे?इस सवाल ने हमेशा हमें परेशान किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, ग़ज़ल, लघुकथा, नाटक आदि विधायें ही साहित्य हैं? साहित्य में संस्मरण, आलेखों को भी स्थान दिया जाता है, बस यहीं पर आकर सवाल फँसा देता है कि किस प्रकार के आलेखों को साहित्य में शामिल करेंगे?


आलेखों में किसी साहित्यकार के ऊपर लिखना, साहित्य की किसी भी विधा के बारे में बताना, किसी साहित्यिक विषय की आलोचना आदि करना आता है। यह सब किसी न किसी रूप में साहित्य का अंग स्वीकारे गये हैं। इसी के साथ निबंध को भी साहित्य का अंग माना जाता है और निबंध के ही एक रूप ललित निबंधको भी साहित्य में शामिल माना जाता है। अब फिर वही सवाल कि यदि निबंध भी साहित्य का हिस्सा है तो किस प्रकार के निबंध? क्या राजनैतिक पृष्ठभूमि को समेटे लिखे गये निबंधों को साहित्य में शामिल करेंगे? निबंध के द्वारा यदि भारत की विदेश नीति की चर्चा की जा रही हो, भारत के अपने पड़ोसी देशों की चर्चा की जा रही हो, देश-प्रदेश के भौगोलिक वातावरण की बात की जा रही हो, सामाजिक विसंगतियों की चर्चा की जा रही हो, जाति-धर्म-क्षेत्र की बात की जा रही हो तो क्या इस प्रकार के निबंधों को साहित्य में शामिल करेंगे? (यह सवाल जो भी सही ढंग से हमें समझा सके उसका बहुत आभार, क्योंकि यही हमें सबसे अधिक परेशान करता है)

साहित्य के अंग के इसी क्रम में एक जरा सी बात और। उपन्यास भी साहित्य की लोकप्रिय विधा है पर किस प्रकार के उपन्यास साहित्य में आते हैं और किस प्रकार के उपन्यासों को साहित्य में शामिल नहीं माना जाता है? यदि सभी प्रकार के उपन्यास साहित्य का हिस्सा हैं तो उन सस्ते से उपन्यासों को क्यों हेय दृष्टि से देखा जाता है जो सस्ते कागज पर, कम मूल्य पर होने के बाद भी सबसे अधिक बिकते हैं? नाम बताने की आवश्यकता नहीं, जासूसी उपन्यासों के (पाठक, शर्मा, आनन्द जैसे नामों वाले लेखकों के लोकप्रिय उपन्यास) पाठक तथाकथित साहित्यकारों से अधिक बिक्री करते हैं और आम पाठकों में अधिक लोकप्रिय हैं। क्या इन्हें साहित्य में शामिल किया जायेगा?

अब थोड़ी सी बात करें साहित्यकार की। आप साहित्यकार किसे मानते हैं? जो कुछ भी लिखना जानता हो वह साहित्यकार हो गया? अब लेखन चाहे प्रिंट का हो, इलेक्ट्रानिक का हो या आजकल भूत बन कर सभी को अपनी गिरफ्त में लेता सोशल मीडिया पर लेखन हो, क्या इन सभी में कुछ भी लिख देना, छपवा लेना ही साहित्य और साहित्यकार की श्रेणी में आता है? जिसे देखो वही इधर-उधर का जोड़-घटाना करके कुछ न कुछ छपवा कर चेंपने में लगा है। आज समस्या यही है कि सभी साहित्यकार है (लेखक कोई नहीं है) पाठक कोई भी नहीं। जिससे पूछो वही कुछ न कुछ लिख रहा है पर कुछ भी पढ़ नहीं रहा है। क्या साहित्यकार इतना छोटा और सस्ता शब्द हो गया है कि जो देखो वही साहित्यकार हो गया है? याद कीजिए उन साहित्यकारों को जिनको साहित्यकार कहते में हमें भी गर्व होता है। उनका लिखा गया साहित्य देखिए तब ज्ञात होगा कि आज जो लिखा जा रहा है क्या उसे साहित्य कहा जा सकता है, उसके लिखने वाले को साहित्यकार कहा जा सकता है? एक शब्द पकड़ लिया और बन बैठे अपनी मर्जी के मालिक। अब जिसे देखो उसे बना दें साहित्यकार और जिसे देखो उसे थमा दें कोई भी पुरस्कार।

यह सत्य हो सकता है कि सोशल मीडिया पर लिखने वाला व्यक्ति अच्छा लेखक हो, उसके भाव सौन्दर्य की प्रस्तुति करते हों, उनके लेखन से किसी प्रकार से सरोकरों की स्थापना होती हो, किसी न किसी प्रकार के मूल्यों को संरक्षण प्राप्त होता हो। इसके बाद भी इस सब का तात्पर्य कदापि यह नहीं कि वह साहित्यकार हो गया। साहित्यकार बनने के लिए कोई एक दो किताबों का छपवा लेना, कई कविताओं को प्रकाशित करना लेना, कई सारे ग्रुप से जुड़ जाना ही काफी नहीं। साहित्य का मर्म जो भी जानता होगा वो अपने कुछ भी लिख लेने पर अपने को साहित्यकार कहलवाना पसंद नहीं करेगा। 

पहले साहित्य का मर्म समझो, साहित्यकार की साधना समझो फिर अपने को साहित्यकार कहलवाने का दम पैदा करो। अपनी दैनिक चर्या को लिख देना, कुछ इधर-उधर की बकवास को चाशनी लगाकर लिख देना, सुंदरता, विमर्श की चर्चा कर देना, समाचारों को आधार बनाकर उसे लेखन का रंग देना, तमाम सारी टिप्पणियों को इस हाथ दे, उस हाथ ले के सिद्धांत से पा लेना ही साहित्य की तथा साहित्यकार की पहचान नहीं। जरा साहित्य पर दया करिए, हिन्दी साहित्य पर दया करिए साहित्यकारों का सम्मान कीजिए। यदि इतना कर सके तो ठीक अन्यथा साहित्य एवं साहित्यकार की लुटिया न डुबोइये।

5 comments:

Ravindra Singh Yadav said...

नमस्ते,
आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
गुरूवार 19 अप्रैल 2018 को प्रकाशनार्थ 1007 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
सधन्यवाद।

sweta sinha said...

वाह्ह्ह...जोरदार लेख...बेहद सारगर्भित एवं विचारणीय।👌👌👌

संजय भास्‍कर said...

साहित्यकार की साधना समझो बहुत सही कहा सर आपने जोरदार लेख

Meena Sharma said...

सही एवं सटीक । इस आलेख को पढ़कर एक बात याद आ गई। एक बार एक बच्चे ने मुझसे सवाल किया था - मैम, कविवर्य रामधारी सिंह दिनकर क्यों ? कवि रामधारीसिंह दिनकर क्यों नहीं ?कवि और कविवर्य में क्या फर्क है?
मेरे जवाब का अंदाजा तो आप लगा सकते हैं। साहित्यकार और लेखक में भी यही मूलभूत फर्क है।

Deepalee Thakur said...

सारगर्भित, विचारणीय लेख