01 January 2018

तुम्हारी खुशियों के लिए वे आपस में मौत बाँट रहे हैं

नमस्कार,
ये इस वर्ष 2018 की पहली पोस्ट है. आप सभी को शायद यही अनुमान होगा कि इस पोस्ट में नए साल की शुभकामनायें होंगी. होनी भी चलिए थीं क्योंकि इस देश में ही नहीं, समूचे विश्व में आज सभी एक-दूसरे को नए साल की बधाइयाँ-शुभकामनायें देने में लगे हैं. लगना भी चाहिए, इस काम में आखिर इसी कैलेण्डर के सहारे हम सभी साल भर के कार्यक्रम निर्धारित करते हैं. इस देश के लोग दिखाने को भले हीभारतीय कैलेण्डर के अनुसार अपने शुभ कार्यों को करने का समय निर्धारित करवा लेते हों मगर उसके बाद उसकी याद वे इसी अंग्रेजी तिथि के अनुसार ही करते हैं.


चलिए, हम भी आपके साथ इस नए साल के जश्न में शामिल हो जाते हैं पर बताएँगे कि क्यों? आपने क्या विशेष किया बीते साल में? समाज के लिए क्या किया आपने इस बीते साल में? असल में हम सभी का संसार खुद हम तक ही सिमटा हुआ है. हमारा परिवार, हमारे बच्चे, हमारे लोग बस इसके अलावा समाज कोई नहीं. नया साल आते ही हम सभी अवकाश के नाम पर अपने-अपने चार-छह लोगों के परिवार के साथ कहीं मौज-मस्ती करने निकल पड़ते हैं. शायद जाना भी चाहिए क्योंकि सालभर हम इन्हीं के लिए ही तो काम करते हैं. पूरे साल गधे की तरह जुट कर इन्हीं के लिए ही तो धन कमाते हैं. अब ऐसे में यदि इनकी ख़ुशी के लिए नया साल नहीं मनाएंगे तो किसके लिए मनाएंगे.

कुछ लोग हैं जो आज के दिन कुछ सैनिकों के शहीद होने का मातम मनाने को कह रहे हैं. समझ नहीं आता है कि किसी सैनिक के मरने पर मातम क्यों मनाया जाये? उसने अपनी नौकरी की और हमने अपनी. उसकी नौकरी में बन्दूक की गोली थी और हमारी नौकरी में बोनस. आखिर सबको अपने किये का मिलता है. वो देश के लिए काम कर रहे थे, हम अपने मालिक के लिए. दोनों को अपनी-अपनी सेवा का फल मिला. इसको हमारे बच्चों की खुशियों से न मिलाया जाये. उनके बच्चों-परिवार की किस्मत में आज लिखा था रोना, सो रो रहे हैं; हमारे बच्चों-परिवार की किस्मत में आज था खुश रहना, महंगे होटल में खाना-पीना सो कर रहे हैं. ये बेकार के अलफ़ाज़, फालतू के ज़ज्बात आज के दिन हम पर हावी न करो.


ये विचार बहुतों को कष्टकारी समझ आते हों मगर आज की सत्यता यही है. हम में से कितने हैं जो आज अपने बच्चों को फ़ौज में जाने को प्रेरित करते हैं? कितने लोग हैं जो अपने बच्चों को सैनिकों की वीरगाथा पढ़ाने-सुनाते हैं? कितने लोग हैं जो आज सैनिकों के शहीद होने को अपने परिवार की क्षति मान रहे हैं? सच ये है कि हम लोग बस अपने-अपने घरौदों में सिमट गए हैं. कोई सैनिक अब हमारे परिवार का हिस्सा नहीं. कोई सैनिक अब हमसे जुड़ा नहीं है. अब वे दिन नहीं दिखाई देते हैं जबकि किसी शहर की सडकों से सैनिकों की गाड़ियाँ निकलने पर लोग, बच्चे-बड़े उनका हाथ हिलाकर अभिवादन किया करते थे. अब सैनिकों की गाड़ियाँ बिना अभिवादन, बिना जयकारे के आराम से शहर से गुजर जाती हैं. ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि हमारे परिवार से कोई सैनिक नहीं. हमारे परिवार से कोई सेना का हिस्सा नहीं. सैनिक हमारे परिवार से नहीं, सेना हमारे परिवार का अंग नहीं.


चलिए, ऐसी शब्दावली से आपका कोई लेना-देना नहीं. आप सब नए साल के जश्न में मगन रहिये. आप पटाखे फोड़कर मौज मनाईये, वे अपने सीने में गोलियाँ खाकर आपको आज़ादी दिलाये हैं. आप अपने परिवार के साथ जश्न मनाइए क्योंकि वे अपने परिवार से दूर आपके परिवार की सुरक्षा के लिए गोलियाँ खा रहे हैं. आप आपस में नए साल की शुभकामनायें बाँटिये, वे आपसे में एक-दूसरे की मौत बांटने में लगे हैं. आप खुश रहिये, वे तो मौत को गले लगाकर खुश हैं ही. 

1 comment:

Kavita Rawat said...

क्या कहें! ....आदत जो लग गयी है
कहीं ख़ुशी कहीं गम
सबका अपना-अपना भाग्य