04 January 2017

हथियारों के सहारे शांति

वर्तमान कालखंड की कितनी बड़ी विसंगति ये है कि एक तरफ सकल विश्व शांति की बात करता है दूसरी तरफ इसी वैश्विक सभ्यता के देश खुद को हथियारों से संपन्न किये जा रहे हैं. शांति, अहिंसा की बात करने वाले देश भी हथियारों को बनाने, खरीदने, जमा करने की अंधी दौड़ में शामिल हैं. ये देश जितने गर्व से अपने देशों में अमन-चैन बढ़ाने वाले कार्यों की पैरवी करते हैं उसी अहंकार से अपने हथियारों की मारक क्षमता का प्रदर्शन भी करते हैं. समझ से परे है आज का दौर कि आखिर सभी देश चाहते क्या हैं? सभी देशों को भली-भांति ज्ञात है कि हथियारों की इस दौड़ से समूचा विश्व अंततः विनाश की ओर ही जा रहा है, इसके बाद भी हथियारों के प्रति मोह कम नहीं हो रहा है. हथियारों का संग्रह करते इन देशों को ये भी मालूम है कि वर्तमान दौर में कोई भी देश युद्ध जैसी स्थिति को नहीं चाहता है. इस सोच का सबसे बड़ा उदाहरण भारत-पाकिस्तान के संबंधों से ही दिखाई देता है. पाकिस्तान के जन्म से ही दोनों देशों के मध्य विवादों की स्थिति बनी रही है. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष युद्धों से भी देश जूझता रहा है, सीमा-पार आतंकवाद से भी देश लगातार जूझ रहा है किन्तु इसके बाद भी भारत की केन्द्रीय सत्ता कभी युद्ध जैसी स्थिति नहीं चाहती है. पाकिस्तान से लगातार होते आ रहे विवादों, आतंकी हमलों के बाद भी भारत का प्रयास यही रहता है कि विवादों का अंत युद्ध के बजाय शांति से ही हो. इसके बाद भी भारत की तरफ से अत्याधुनिक हथियारों का बनाया जाना लगातार ज़ारी है.


देश की तरफ से अभी पृथ्वी का सफल परीक्षण किया गया. इसकी मारक क्षमता के बारे में कहा जा रहा है कि आधी दुनिया इसकी जद में आ गई है. पृथ्वी की मारक क्षमता के साथ-साथ इसकी गति, इसकी भारक्षमता के बारे में भी देश ने गर्व से बताया. समूची दुनिया को आभास कराया गया कि हथियारों की शक्ति के मामले में देश अन्य विकसित देशों के समकक्ष हो गया है. भारत देश सदा से ही शांति, अहिंसा की बात करता रहा है, समूची दुनिया में अमन-चैन के संदेशों का प्रसारण करता रहा है ऐसे में उसके द्वारा हथियारों का संग्रह आश्चर्य से कम नहीं है. यहाँ वैश्विक सन्दर्भ में एक तथ्य को ध्यान रखना भी अपेक्षित है कि एक तरफ जहाँ विश्व समुदाय की महाशक्ति कहे जाने वाले देशों ने हथियारों का निर्माण, संग्रह खुद को सशक्त बनाने, अन्य देशों पर अपना प्रभुत्व ज़माने के लिए किया वहीं भारत की तरफ से हथियारों का निर्माण, संग्रहण एक तरह की मजबूरी रही है. एक तरफ हमारा देश जहाँ पड़ोसी देशों के विश्वासघातों से दो-चार होता रहा है वहीं दूसरी तरफ अनेक पश्चिमी देशों द्वारा किसी न किसी रूप में भारतीय उपमहाद्वीप में अपना कब्ज़ा ज़माने के अवसरों को जवाब देता रहा है. छोटे-बड़े किसी भी हमले के जवाब के लिए, हमलों को रोकने के लिए देश का शक्ति-संपन्न होना अत्यावश्यक है. इसी कारण से भारत ने समय-समय पर अपनी तकनीक को उन्नत किया, अपने हथियारों के संग्रह को उन्नत किया, हथियारों की मारक क्षमता को बढ़ाया है. परमाणु हथियारों की सम्पन्नता, प्रक्षेपास्त्रों का निर्माण, मिसाइलों का संग्रह आदि के द्वारा भारत खुद को लगातार शक्तिशाली बनाता रहा है.
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आज भले ही देश के लिए ये गर्व की बात हो कि वह शक्तिसंपन्न देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है, लगातार शक्ति सम्पन्न होता जा रहा है किन्तु ऐसे हथियारों का उपयोग शायद ही कभी किया जाये. महाशक्ति माने जाने वाले देश भी शायद ही इनका उपयोग कभी करना चाहें. फिर सवाल उठता है जब हथियारों का उपयोग किया ही नहीं जाना है तब आखिर इनका निर्माण किसलिए? क्या इन्हीं हथियारों ने आतंकी संगठनों को जन्म तो नहीं दिया है? क्या शक्तिसंपन्न देशों ने हथियारों का बाजार बनाकर समूचे विश्व को संकट के मुहाने पर खड़ा नहीं कर दिया है? तीसरे विश्व के नाम से जाने वाले देशों में हथियारों की होड़ पैदा कर देना इन्हीं महाशक्तियों की साजिश तो नहीं? आखिर जिन देशों में अनेकानेक समस्याएँ आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई हैं वहाँ हथियारों के प्रति मोह किसलिए? खुद हमारा देश भी आजतक बेरोजगारी, गरीबी, बीमारियों आदि से पार नहीं पा सका है किन्तु सीमा-पार से उत्पन्न होते संकट के चलते हथियारों का जखीरा लगाने को मजबूर है. विज्ञान, तकनीक का उपयोग इंसानी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होने के साथ-साथ विध्वंस के लिए भी किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. इक्कीसवीं सदी का डेढ़ दशक गुजर जाने के बाद भी बहुत सारे सवाल आज भी निरुत्तर हैं. शांति, अमन, चैन तलाशते विश्व का हथियारों के प्रति मोह आज भी बरक़रार है. याद रखना होगा कि शांति, अमन, चैन का माहौल इन्हीं के सहारे बन सकता है न कि हथियारों के सहारे. ध्यान रखना होगा कि हथियारों का जमावड़ा देश की शक्ति-सम्पन्नता तो बढ़ता है साथ ही उसके अन्दर निर्भयता की जगह भय ही बढ़ाता है. हथियारों के बल पर शांति इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा झूठ है. 

3 comments:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्मदिवस ~ कवि गोपालदास 'नीरज' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर आँकलन।

HindIndia said...

बहुत ही बढ़िया article लिखा है आपने। ... Thanks for sharing this!! :) :)