28 September 2016

पाकिस्तान पर कूटनीतिक सफलता

पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के हमले के बाद देशभर में पाकिस्तान से युद्ध करके समाधान निकालने की आवाज़ उठने लगी है. यहाँ मूल रूप से जो प्रतिध्वनि हो रही है वो पाकिस्तान विरोध की है. इस प्रतिध्वनि में कुछ ध्वनियाँ ऐसी भी सुनाई दे रही हैं जो इस विषम परिस्थिति में भी पाकिस्तान-प्रेम का राग आलाप रही हैं. हालाँकि पाकिस्तान को युद्ध के द्वारा सबक सिखाने के शोर के बीच हाल-फ़िलहाल ऐसी आवाजें बहुत खुलकर सुनाई नहीं दे रही हैं किन्तु कहीं न कहीं इन आवाजों के पीछे का मकसद युद्ध रोकना नहीं, युद्ध न होने देना नहीं है वरन पाकिस्तान के प्रति, इस्लामिक ताकतों के प्रति अपना प्रेम ज़ाहिर करना ही है. ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान से युद्ध किये जाने की आवाजें इसी सरकार में उठी हैं, इससे पहले भी ऐसा होता रहा है. पूर्व की सरकार के समय भी आतंकी हमला होने की दशा में युद्ध ही एकमात्र विकल्प के नारे लगते रहे हैं. वर्तमान में केंद्र में सत्तासीन भाजपा के विभिन्न नेताओं और सहयोगी दलों के नेताओं की तरफ से भी तत्कालीन विपक्षी दल के रूप में पाकिस्तान को युद्ध के द्वारा सबक सिखाये जाने की माँग उठती रही थी. युद्ध किसी समस्या का अंतिम समाधान नहीं हो सकता है, ये बात सभी को स्पष्ट रूप से ज्ञात है किन्तु जब समस्या अनावश्यक रूप से कष्टकारी हो जाये तो फिर कठोर कदम उठाये जाने की जरूरत महसूस होती है.


वर्तमान में जबकि केंद्र में भाजपा सरकार है जो विगत वर्षों में खुलकर पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की खुलकर खिलाफत करती रही है, उससे देश के नागरिकों को या कहें कि पाकिस्तान-विरोधियों को आशा बंधी थी कि किसी भी आतंकी घटना पर पाकिस्तान को युद्ध के द्वारा सबक सिखा दिया जायेगा. उड़ी की आतंकी घटना के इतने दिन बाद भी पाकिस्तान से युद्ध न छेड़े जाने के कारण ये समर्थक निराश से लग रहे हैं. दो वर्ष पूर्व जो लोग नरेन्द्र मोदी के गुणगान करते नहीं थकते थे उनमें से बहुतेरे लोग उनको भला-बुरा कहने लगे हैं. ऐसे बिन्दु पर आकर कुछ बातों को समझने की आवश्यकता होती है. विगत एक दशक की देश की राजनीतिक स्थिति पर विचार किया जाये तो साफ़-साफ़ समझ आता है कि पिछले दो वर्षों में ही भारत की हनक को वैश्विक रूप में पुनः महसूस किया गया है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लगातार वैदेशिक यात्राओं के द्वारा ही अनेक देशों से देश के संबंधों, रिश्तों का नवीनीकरण सा हुआ है. देश की बढ़ती साख के साथ-साथ पड़ोसी देशों से बनते मधुर संबंधों को चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान हजम नहीं कर पा रहा है. उसके लिए न स्वीकारने योग्य स्थिति के बीच नरेन्द्र मोदी द्वारा लालकिले से बलूचिस्तान का मामला उठाया जाना भी फाँस बन गया है. पाकिस्तान जहाँ एक तरफ कश्मीर में अपनी हरकतों से उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित किये हुए था, बलूचिस्तान का मुद्दा उठते ही वैसी ही हड्डी उसके गले में अटक गई है. इसके अतिरिक्त विदेशों से लगातार भारत को मिलता समर्थन, निवेश, मेक इन इंडिया की सफलता आदि ने भी पाकिस्तान को बेचैन किया है. इसी बैचेनी को दूर करने के लिए उसकी तरफ से ऐसे कदम लगातार उठाये जा रहे हैं कि देश बौखलाकर उस पर हमला कर दे.

यहाँ आकर केंद्र सरकार की कूटनीति को समझने और उसकी तारीफ करने की आवश्यकता है. भारत सरकार ने, सेना ने धैर्य न खोते हुए गंभीरता से काम लिया. संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के लगाये गए आरोपों का खुलकर जवाब देना अपने आपमें भले ही सफलता न समझा जाये किन्तु जिस तरह से विगत दो-तीन दिनों में ही पाकिस्तान और चीन के सुर बदले हैं वे सफलता का द्योतक अवश्य कहे जा सकते हैं. भारत द्वारा कठोर कार्यवाही किये जाने सम्बन्धी बयान देने और सिन्धु जल संधि पर पुनर्विचार किये जाने के बाद से ही पाकिस्तान की तरफ से कश्मीरियों के पक्ष में बयान जारी किया गया. चीन ने भी ऐसे किसी बयान से इंकार किया जो युद्ध की दशा में पाकिस्तान का समर्थन करता हो. स्पष्ट है कि युद्ध का विकल्प न आज सही है और न ही पिछली सरकार में उचित था. ये बात समूचे विश्व को पता है कि पाकिस्तान भी परमाणु हथियार संपन्न देश है और किसी भी असामान्य स्थिति में यदि उसके द्वारा इसका उपयोग कर लिया गया तो समूचे देश के लिए ही नहीं वरन दक्षिण एशिया के लिए खतरा पैदा हो जायेगा. इसके अलावा युद्ध की स्थिति में आज गृहयुद्ध जैसी स्थिति भले न बने किन्तु देश के अन्दर उथल-पुथल अवश्य मच जाएगी. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि कंधार विमान अपहरण मामले में जिस आतंकी को छोड़ने के लिए सभी दलों की सहमति थी, उसके लिए सिर्फ भाजपा को ही दोषी बताया जाता है. गैर-भाजपाई नेता द्वारा पाकिस्तान चैनल पर बैठकर देश के प्रधानमंत्री को हटाये जाने की बात की जाती है. देश के भीतर धर्मनिरपेक्षता-साम्प्रदायिकता के नाम पर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की जाती हैं. ऐसे में संभव है कि देश की सेना युद्ध के समय अन्दर-बाहर युद्ध लड़ना पड़े.


केंद्र सरकार, कूटनीतिज्ञ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, सेना के उच्च पदाधिकारी ऐसी विषम स्थिति को भली भांति समझ रहे हैं, हम सबसे बेहतर समझते होंगे. ऐसे में जहाँ संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान को सभी देशों द्वारा नकार सा दिया गया है. जल समझौते पर पुनर्विचार किया जाने लगा है. पाकिस्तान को देश की तरफ से मिले ‘मोस्ट फेवरिट नेशन’ का दर्ज़ा छीने जाने पर विचार किया जा रहा है. बलूचिस्तान के साथ-साथ सिंध प्रान्त की माँग भी उभर आई है. वहाँ पाकिस्तानी सरकार द्वारा किये जा रहे जबरिया प्रयासों की बात भी सामने आ गई है. ये हालात युद्ध नहीं तो युद्ध जैसे ही हैं. इनके बीच राफेल विमानों का सौदा हो जाना भी बहुत बड़ी सफलता है. ज़ाहिर सी बात है कि पाकिस्तान बिना युद्ध छिड़े बचाव की मुद्रा में है. यदि ऐसा नहीं होता तो उसके राजदूत द्वारा ऐसा बयान कतई नहीं आता कि ‘जंग किसी मामले का हल नहीं. जम्मू-कश्मीर के लोगों को अपने भविष्य का फैसला करने के लिए बेहतर मौका मिलना चाहिए. अगर उन्हें लगता है कि वे भारत के साथ ज्यादा खुश हैं तो वे वहीं रहें, पाकिस्तान को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है.’ ये कहीं न कहीं भारत की कूटनीति की जीत है और आज इसी तरह के युद्ध की आवश्यकता है. युद्ध के उन्मादियों को समझना होगा कि पिछली सरकार द्वारा पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर ऐसे कठोर कदम भी नहीं उठाये गए थे. अब जबकि बिना युद्ध किये पाकिस्तान एक कदम पीछे है तो कोशिश यही होनी चाहिए कि वो कदम आगे न बढ़े. युद्ध पाकिस्तान का नाश तो करेगा ही, भारत को भी नुकसान पहुँचायेगा. 

2 comments:

yashoda Agrawal said...

कुछ लोग कहते हैं
क्या कर लोगे तुम लोग
हम तो करते जा रहे हैं
और करते रहेंगे
हमले पर हमले
हत्या पर हत्या
और तुम लोग
मीटिंग के अलावा
भर्स्तना ही तो करोगे
बस बहुत हो गई लिखा-पढ़ी
सहनशीलता और शालीनता
के दिन आ गए हैं
रख दिया जाए ताक में
टांग कर इन दोनो
बहनों को....
जागो भारत जागो
सादर

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "पाकिस्तान पर कूटनीतिक और सामरिक सफलता “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !