04 April 2012

परिवर्तन तो हुआ है किन्तु सकारात्मक नहीं


21वीं सदी को परिवर्तनकारी रूप में स्वीकार किया गया और ऐसा विचार किया जाने लगा कि समाज के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन होना अवश्यंभावी है। इस सोच का प्रभाव साहित्य के क्षेत्र में भी देखने को मिला। किसी समय में साहित्य को सामाजिक परिवर्तनों के लिए, सामाजिक बुराइयों को दूर करने की प्रेरणा के रूप में, मानव समुदाय को विचारात्मकता प्रदान करने के लिए जाना जाता था। परि


युगानुक्रम में देखें तो साहित्य ने स्वाधीनता आन्दोलन के अनुसार स्वयं को समाज के सामने रखा तो वहीं आजादी के बाद उसने सामाजिक परिवर्तनों को, सामाजिकता को प्रमुखता दी। साहित्यकारों ने परिस्थितियों के अनुसार साहित्य को सामने रखकर उसके मूल्य को स्थापित किया। इस मूल्य स्थापना के पीछे-पीछे दबे पाँव परिवर्तन की बयार समाज में भी आ रही थी। संस्कृति, संस्कार, जीवन-मूल्यों, सामाजिक-सरोकारों के क्षेत्र में भी आधुनिकता का, भूमण्डलीकरण का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिला। साहित्यिक क्षेत्र में प्रभावी भूमिका निभा रही स्थापित रचनाकारों की पीढ़ी से इतर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म लिया जिसने साहित्य को अलग प्रकार की नई दिशा प्रदान की।स्थितियों
, कालखण्ड के अनुसार साहित्य में अनेक प्रकार के परिवर्तन देखने को मिले।

साहित्यकारों की नई पीढ़ी साहित्य में वास्तविकता का समावेश कर रही थी। उसके लिए साहित्य लेखन सिर्फ और सिर्फ लेखन तक ही सीमित नहीं रह गया था। साहित्य की पृष्ठभूमि में अब वह खुलेपन का चित्रण करने में भी मशगूल था। सामाजिक परिवर्तन की बयार के चलते सामाजिकता का बदलाव साहित्य में भी दिखाई दे रहा था। इक्कीसवीं सदी में साहित्यकारों की विषयवस्तु में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में खुलापन, शारीरिक सम्बन्धों का प्रदर्शन, उच्छृंखल जीवनशैली का चित्रण, मानव की आपाधापी भरी जिन्दगी का वर्णन आदि-आदि देखने को मिल रहा था। इस दौर के साहित्य में मनुष्य की अंतरगंता भी पाठकों को उत्तेजित करती जाती थी और कहीं कहीं तो इसका अत्यधिक खुलापन साहित्य को अश्लीलता के निकट तक ले जाता था।

नये-नये लेखकों का उभरना साहित्य को सशक्तता तो प्रदान कर ही रहा है साथ ही स्थापित वरिष्ठ लेखकों को भी बँधी-बँधाई लीक से हटकर सोचने को, लिखने को विवश कर रहा है। यह और बात है कि इस अत्याधुनिक लेखन ने, 21वीं सदी के चमकदार मुलम्मे में लिपटे साहित्य में सामाजिक-सरोकारों का, जीवन-मूल्यों का, मानव-मूल्यों का, संस्कारों का, पारिवारिकता का, सामाजिकता का विघटन देखने को मिला है। 21वीं सदी में साहित्यकारों की संख्या में वृद्धि हुई है, साहित्यिक रचनाओं में वृद्धि हुई है पर उसमें से कथा का, पृष्ठभूमि का, भावबोध का, संवेदना का, काव्यत्व का, मधुरता आदि का लोप ही हुआ है। अब साहित्य उस अश्लीलता को, अंतरंगता को, नग्नता को, अनैतिकता को, अशालीनता को प्रदर्शित करने में, चित्रित करने में लगा हुआ है जिसको मानव समाज अब तक गोपन बनाकर पर्दे के पीछे रखे हुए था।


चित्र गूगल छवियों से साभार