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26 May 2012

लोकतंत्र में लोकतान्त्रिक शक्तिविहीन जनता



हम विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के निवासी हैं, यह बात हम सभी को गौरवान्वित करती है, अब कितना करती है और किस तरह से करती है, यह और बात है। बड़ी-बड़ी किताबों में, बड़े-बड़े नेताओं के भाषणों में, बड़े-बड़े आन्दोलनों में हमें हमेशा इस बात को सुना-सुनाकर गौरवान्वित होने को विवश किया जाता रहा कि हम विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के निवासी हैं। हमें यह भी समझाया जाता रहा है कि हम जनता की ताकत के आगे किसी की भी ताकत काम नहीं करती है। हमें बताया जाता रहता है कि हम चाहें तो बड़े-बड़े तानाशाहों का तख्तापलट कर दें। हमें इस बात का भी गुमान करवाया जाता है कि जनता इस देश की संसद से भी बड़ी है; जनता देश को चलाने वाले जनप्रतिनिधियों से भी बड़ी है।

इस तरह की तमाम सारी धारणाओं और अवधारणाओं के मध्य आम जनता अपने अस्तित्व को महाविशाल रूप में महसूस करने लगती है। वह स्वयं को सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा की तरह ही सकल विश्व (संसद-विधानमंडल, सांसद-विधायक, मंत्री आदि) का निर्माता समझने लगती है। जनता जर्नादन के नाम से सुशोभित होने वाली जनता की ये नासमझी भरी नींद उस समय टूटती है जब उसके सिर पर एकाएक उसके द्वारा काल्पनिक रूप से रचित संसारवासियों द्वारा करारी चोट की जाती है। जब राजनीति में भ्रष्टाचार दिखाई पड़ता है तो जनता को भरमाया जाता है कि वह अपनी ताकत से चुनावों में सबक सिखा देगी। चुनावों में जो कुछ भी हो वह अलग बात है पर एक बार जनप्रतिनिधि के चुने जाने के बाद जनता की कोई बिसात नहीं कि फिर वह भ्रष्ट नेता को सबक सिखाते हुए वापस बुला ले। इसके लिए उसे फिर चुनावों तक का इंतजार करना पड़ता है।

लोकातन्त्रिक सशक्तता के कुछ उदाहरण अभी हाल ही में देखने को मिले जिनसे आभास हो गया कि वाकई जनता के पास असीम लोकतान्त्रिक शक्ति है जो कुछ भी करवा सकती है। उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव के अध्यक्ष, महापौर पदों के आरक्षण हेतु नया परिसीमन किया गया जो किसी भी दृष्टि से संवैधानिक और तार्किक प्रतीत नहीं होता है। उस पर 2000 से अधिक आपत्तियों के बाद भी किसी भी पद के आरक्षण को संशोधित नहीं किया गया है। पेट्रोल की कीमत में अप्रत्याशित रूप से की गई वृद्धि ने जनता की लोकतान्त्रिक शक्ति का दम निकाल कर रख दिया है। लोकतन्त्र के पैरोकार क्या बताने की कृपा करेंगे कि इन दो उदाहरणों में जनता की लोकतान्त्रिक शक्ति कहां और कैसे काम कर रही है?

इसके अलावा और भी बहुत से उदाहरण हैं जो दर्शाते हैं कि हमारा लोकतन्त्र कैसे हमारे हितों की रक्षा कर रहा है। आये दिन सामने आते भ्रष्टाचार के किस्से, आये दिन महिलाओं के साथ होती हिंसा, अजन्मी बच्चियों को मारने की घटनायें, आम आदमी का शासन-प्रशासन द्वारा परेशान किया जाना, सत्ता-शक्ति से विपन्न व्यक्तियों का निरीह बने रहकर जीवनयापन करना क्या हमारे सशक्त लोकतन्त्र की पहचान है या फिर हमारी लोकतान्त्रिक ताकत का परिचायक है?

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चित्र गूगल छवियों से साभार