21 January 2011

यादों में खुश रहता दिल एक चित्र देख हो गया दुखी




कहते हैं कि ‘बन्द मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की’ इसको कई बार असल में लागू होते देखा किन्तु इसको असरकारी होते नहीं देखा था। इधर पिछले दिनों नेट पर कुछ खोजबीन करने के दौरान साइंस कॉलेज, ग्वालियर को सर्च करना शुरू किया। इस नाम से तुरन्त ही कॉलेज की साइट खुल गई। अच्छा लगा बहुत सी जानकारी को देखकर।

साइंस कॉलेज, हॉस्टल का चित्र:
गोले में उस कमरे (कमरा नं0 11) की खिड़कियाँ जिस कमरे में हमने तीन वर्ष गुजारे

इस अच्छे लगने के पीछे एक प्रमुख कारण यह रहा कि हमने 90 से 93 तक का समय ग्वालियर के साइंस कॉलेज में ही बिताया है। रहने के लिए हॉस्टल था ही। साइंस कॉलेज की साइट के माध्यम से पुनः कॉलेज में प्रवेश किया। इसी के साथ और भी कुछ सहायक साइट पर भी जाना हुआ।

इसी आवागमन में एक समाचार पर निगाह गई तो एक बारगी मन को बहुत बुरा लगा। समाचार साइंस कॉलेज के हॉस्टल से सम्बन्धित था। उस हॉस्टल का जहां अपनी लम्बी-चौड़ी मित्र मंडली के साथ तीन वर्ष गुजारे थे। समाचार तो जैसा था ही उसके साथ लगे चित्र ने तो वाकई बहुत ही दुखी किया।

समाचार से ज्ञात हुआ कि हॉस्टल पिछले कई वर्षों से बन्द है। उसका चित्र देखकर ही लगा कि बहुत लम्बे अर्से से हॉस्टल की देखभाल नहीं हो रही है।

अब पता नहीं यह सभी के साथ होता है या सिर्फ हमारे साथ ही होता है कि हॉस्टल को छोड़े आज लगभग 17 वर्ष होने को आ गये हैं किन्तु आज भी दिल के किसी कोने में ऐसा एहसास होता है मानो कल ही हॉस्टल से, साइंस कॉलेज से आना हुआ हो। पता नहीं क्यों आज भी बहुत ही लगाव सा दिखता है, इस कारण से उस चित्र को और उसमें दिख रही दुर्दशा से दिल को कष्ट हुआ, बुरा भी बहुत लगा। यही बुरा लगना सिद्ध करता है "बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो ख़ाक की" और इसने इस बार बहुत दुखी किया।

हॉस्टल की, कॉलेज की इतनी कहानियां हैं कि कहना शुरू करें, लिखना शुरू करें तो पता नहीं कितनी बड़ी किताब लिख जाये। इस पर बाद में फिर कभी किन्तु.......अभी तो हमको बहुत बुरा लग रहा है पता नहीं बाकी मित्रों को लगेगा अथवा नहीं?

हां, एक बात और जाननी थी कि आज भी इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी लगभग हर माह किसी न किसी रूप मे सपनों में हॉस्टल से, वहां साथ रहे मित्रों से मुलाकत हो जाती है। यह हमारा दिल से जुड़ाव का संकेत है अथवा कुछ और पता नहीं, जो समझा सकें जरूर समझायें।

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