06 October 2009

कंक्रीट के जंगल में कुछ सुखद क्षण

पिछले कई दिन व्यस्तता भरे निकले। पहले हमारे मित्र डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव द्वारा आयोजित किये गये राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में व्यस्त रहे उसके बाद अपने पारिवारिक कार्यक्रम में। परिवार में कोई विशेष समारोह आदि नहीं था बस हमारी छोटी बहिन और बहनोई मुम्बई में रह रहे हैं। विगत तीन वर्षों से उनका हमको मुम्बई बुलाने का काम होता रहा और हम यहाँ अपने आप में ‘बिजी विदाउट वर्क’ के फंदे में फंसे रहे।


(मेरीन ड्राइव की सैर, पत्नी और बिटिया के संग)

इस बार मौका लगाया और परिवार सहित अपने मित्र सुभाष के साथ मुम्बई यात्रा पर निकल पड़े। यात्रा बड़े ही आराम से हुई। छुट्टियाँ कम होने के कारण मुम्बई का दो-तीन दिनों का कार्यक्रम था। यह भी विचार करना था कि मोहित (हमारे बहनोई) को भी अपने काम से ज्यादा छुट्टियाँ न लेनी पड़ें।

(मित्र सुभाष, सफ़ेद शर्ट में; बहनोई मोहित, बहिन पूजा, पत्नी बच्ची को लिए गेट वे ऑफ़ इंडिया पर)


दो-चार जगह घूमे फिरे, मंदिर भी गये, समुद्र भी देखा। गेटवे आफ इंडिया को खड़ा पाया तो ताज होटल के घाव भी देखे। इसके अलावा माल संस्कृति का भी नजारा लिया। देश का सबसे बड़ा माल कहलाने वाले आरबिट में भी घूमा फिरी की। मुम्बई में भ्रमण के समय इमारतों का जंगल देखने को मिला। पुरानी भव्य इमारतें तो नई अत्याधुनिक तकनीक को दर्शातीं इमारतें। पत्थरों का कलात्मक प्रदर्शन तो काँच की सुंदर जगमगाहट।

(प्रसिद्द मॉल ऑर्बिट इसे देश का सबसे बड़ा मॉल कहते हैं)

समुद्र को बाँधते पुल, सड़कों का बोझ ढोते ओवर ब्रिज, घरों की नई परिभाषा रचतीं मल्टी स्टोरी बिल्डिंग्स, औद्योगीकरण, वैश्वीकरण का प्रदर्शन करते जगमगाते माल, दुकानें, भीड़ को अपने में समातीं लोकल ट्रेन और बसें, दौड़ते-भागते लोग, मशीनी जीवन आदि-आदि सभी कुछ यहाँ देखने को मिला। इस चकाचैंध के बीच असल जिंदगी भी दिखाई दी। झुग्गी-झोपड़ी में जीवन तलाशते लोग। भेलपूरी, पावभाजी, बड़ापाव आदि बेच कर अपना गुजारा करते लोग। लगा कि मुम्बई कंक्रीट का एक भव्य जंगल है जहाँ हर कोई अपने जीवन को गुजर-बसर के लिए ही जिये जा रहा है।

हाँ, ऐसे लोग भी हैं जो जीवन को जिन्दगी की तरह से जीते दिखे। अभावों से दूर, धन की, शानो-शौकत की जिन्दगी जीते लोग।

मुम्बई घूमना कम और अपने परिवार के एक अंग से मिलना ज्यादा था। नवी मुम्बई में बने उस निवास से भी प्रकृति का नजारा मन को बराबर लुभाता रहा। हरे-भरे पहाड़, छोटे-छोटे झरने, आसपास तैरते काले-काले बादलों ने एक पल को तो यह भी भुला दिया कि ये मुम्बई है।

(नवी मुंबई में घर के पास का प्राकृतिक दृश्य)

इसी तरह मुम्बई-पुणे एक्सप्रेस वे ने भी प्रकृति को बहुत ही पास से देखने का मौका दिया। खंडाला, लोनावला के आसपास स्थित हरे-भरे पहाड़, हाथ की पहुँच में तैरते बादल इस बात का आभास ही नहीं होने दे रहे थे कि हम मुम्बई में हैं।

(मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे पर प्रकृति का विहंगम दृश्य, बहिन, पत्नी और बिटिया के साथ)
बहरहाल कंक्रीट के जंगल में इस तरह की हरियाली ने मन को सुकून भी पहुँचाया।

3 comments:

Udan Tashtari said...

ये बढ़िया रहा. बम्बई भी घूम लिए फोटूओं में और आपके परिवार से भी मिल लिए.

नवीन त्यागी said...

bahut achchha sansmaran raha.

सुशीला पुरी said...

pic. khubsurat hain ..........pryog bhi ...