11 मई 2020

लेखन में एक अधूरापन अभी भी है

लॉकडाउन ने अतीत में विचरण करने के लिए समय ही समय दे दिया है. यह भी एक तरह की टाइम मशीन है. इसके सहारे आज आसानी से अतीत में जाकर वर्तमान में आ जाते हैं. न किसी काम का प्रतिबन्ध, न किसी के टोके जाने की आशंका, न किसी कार्यक्रम को पूरा करने की बाध्यता. इसी टाइम मशीन के द्वारा विचरण करते-करते आज पहुँच गए अपने ही ब्लॉग में. टहलते-टहलते अपनी पाँच सौवीं पोस्ट पर जाना हुआ. 2010 की उस पोस्ट को पढ़कर लगा नहीं कि दस साल बाद आज स्थिति कुछ सुधरी है. संभव है कि आप लोगों को ऐसा कुछ महसूस न हो मगर हमें तो ऐसा ही लगा.


उस पोस्ट में भी कोशिश थी सबकुछ सही करने की, इसमें भी उसी बात का दोहराव ही है. एक कोशिश फिर से, सबकुछ सही करने की. उस 500वीं पोस्ट के मुकाबले ये 1758वीं पोस्ट है. फ़िलहाल तो आप लोग उस पोस्ट को भी पढ़िएगा.


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यह हमारी पांच सौवीं पोस्ट है। पिछले ढाई वर्ष के ब्लॉग सफर में कुछ खट्टे और कुछ मीठे पल सामने आये। कुछ ने परेशान किया और कुछ ने हैरान किया, हां सहयोग करने वाले स्वर भी दिखाई दिये। कहा जाये तो पिछले ढाई वर्षों का सफर मजेदार रहा, बहुत कुछ सीखने को मिला।

पांच सौ पोस्ट लिखने के बाद भी एक अधूरापन सा है। अभी भी लगता है कि जो लिखने अथवा जो करने की चाह में ब्लॉग संसार में आये थे वह पूरा नहीं हो सका है। अपने इस लेखन के दौरान कई बार लगा कि अब ब्लॉग लेखन को बन्द कर दिया जाये। ऐसा क्यों लगा इसके पीछे कई कारण रहे। समाज का ढांचा यहां भी अपनी पूर्ण उपस्थिति देता दिखा। समाज की कलुषित चालबाजियां, बयानबाजियां, भेदभाव, दोषारोपण आदि-आदि सब कुछ यहां भी दिखाई दिया।

इनके साथ-साथ गाली-गलौज वाली स्थितियां भी दिखाई दीं, पोस्ट चोरी करने की स्थिति भी दिखी। लोगों का आपसी तनाव इस हद तक दिखा कि यदि कम्प्यूटर के बाहर मिलना सम्भव हो पाता तो शायद मारपीट की नौबत आ जाती, या फिर इससे भी आगे जाकर जो स्थिति बन सकती थी वो बनती। इन सब घटनाओं और हालातों ने मन को उचाट कर दिया।

कुछ दिनों ब्लॉग लेखन बन्द कर दिया पर फिर हिन्दी भाषा के लिए, साहित्य के लिए कुछ करने की सोच कर वापसी भी की किन्तु हम इस तरफ भी कुछ नहीं कर पाये। आज आंकड़े के रूप में संख्याबल को 500 पर पहुंचा दिया किन्तु अभी बहुत कुछ करना बाकी है। प्रयास तो आगे यही रहेगा कि कुछ सार्थक किया जाये। रोजमर्रा के हालात तो ऐसे हैं कि इन पर कितना भी लिखो किन्तु लोगों के कान में जूं रेंगने से रही। अपने को क्यों परेशान किया जाये, बस वही लिखा जाये जो सार्थक हो और समाजोपयोगी हो।

आगे प्रयास तो यही रहेगा, बाकी तो आगे तय होगा।


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

2 टिप्‍पणियां:

  1. गुण दोष सब जगह होते हैं। अच्छा तो यही है कि हम गुण ही देखें और दोष (सुधार योग्य हैं) तो सुधार करें अन्यथा छोड़ दें और आगे बढ़ें।

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  2. यह सही है कई बार लगता है कि इतना लिखा पर बहुत कुछ लिख़ ना पाए. ब्लॉगिंग में इतना बड़ा आँकड़ा पार करने के लिए बधाई.

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