22 March 2018

सोशल मीडिया पर डाटा चोरों को हम ही तो प्रेरित करते हैं


विगत कुछ समय से फेसबुक पर डाटा चोरी करने के आरोप लगाये जा रहे थे. आज, २२ मार्च को लगभग सभी मुख्य समाचार पत्रों ने इसे प्रमुखता से छापा है. जुकरबर्ग को नोटिस देने तक की बात मंत्री जी ने कही है. समझ नहीं आता कि कोई चोरी करने वाला बिना हमारी लापरवाही के चोरी कैसे कर सकता है. यह केवल फेसबुक के सन्दर्भ में ही नहीं वरन हमारे घरों के सन्दर्भ में भी लागू होता है. आखिर हम ही लापरवाह बनते हैं और फिर चोरों के लिए वे स्थितियाँ उत्प्रेरक का कार्य करती हैं. कुछ इसी तरह की उत्प्रेरण स्थितियाँ हम सब फेसबुक पर या कहें कि सोशल मीडिया पर डाटा-चोरों के लिए बराबर बना रहे हैं. हम ही हैं जो लगातार अपने बारे में, अपनी अंतरंगता के बारे में, अपने समाज के बारे में, अपनी जाति, अपने धर्म, अपने लोगों के बारे में जानकारियाँ, सूचनाएं अतिशय जल्दबाजी के चलते सोशल मीडिया पर साझा करते रहते हैं. हम सब मुफ्त के मिले मंच का दुरुपयोग करने में माहिर हैं और बिना ये जाने कि हमारे द्वारा लगाई जा रही सूचना का, जानकारी का दूसरा व्यक्ति क्या उपयोग-दुरुपयोग कर सकता है.

आज ऐसा इसलिए नहीं लिख रहे कि आज ऐसा कुछ समाचार-पत्रों ने प्रकाशित किया है. आज ऐसा फिर इसलिए भी लिख रहे हैं क्योंकि इससे पहले भी दो बार अपने ही ब्लॉग के माध्यम से यही लिख चुके हैं. दोनों पोस्ट को नीचे दी गई लिंक के माध्यम से पढ़ा जा सकता है.

25 मई 2015 को लगाई गई पोस्ट.

05 जनवरी 2018 को लगाई गई पोस्ट

असल में हम सभी लोगों के अपने-अपने वैचारिक खाँचे हैं और हम चाहते हैं कि सभी उसी के अनुसार चलें. यदि ऐसा नहीं होता है तो हम उसके खिलाफ हो जाते हैं. ये वैचारिक खाँचे कहीं जाति-आधारित हैं, कहीं धर्म-आधारित, कहीं राजनीति-आधारित, कहीं क्षेत्र-आधारित. ऐसे में जैसे ही हम किसी के खिलाफ हुए या कोई हमारे खिलाफ हुआ, बस उसके खिलाफ हर तरह का जहर उगलना शुरू हो जाता है. आँकड़ों की तोड़-फोड़, चित्रों का फोटोशॉप किया जाना, मनगड़ंत सूचनाओं का प्रसार किया जाना आम बात हो जाती है. हम एक बहुत छोटी सी ईकाई होने के बाद भी लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं तब सोचने वाली बात है कि कोई एक बड़ी एजेंसी कितनी आसानी से हमारी ही दो गई जानकारियों से कैसे हम सबको प्रभावित कर सकती है. यह प्रभाव कभी सकारात्मक भी हो सकता है, कभी नकारात्मक भी.

बहरहाल, सबकी स्वतंत्रता सबकी अपनी ही है मगर इतना ध्यान रखा जाये कि उससे किसी तरह की हानि न होने पाए. हानि व्यक्तिगत हो या फिर सामूहिक, हानि तो हानि है, चोरी तो चोरी है, नुकसान तो नुकसान है. व्यक्तिगत नुकसान की तो किसी न किसी रूप से भरपाई की जा सकती है किन्तु सामूहिक नुकसान की, समाज के नुकसान की, राष्ट्र के नुकसान की भरपाई करना संभव नहीं है. काश! कि इस मुफ्त में मिलती आज़ादी का हम सदुपयोग करते हुए लाभ-हानि को समझ सकें, अच्छे-बुरे का आकलन कर सकें. 

कुछ प्रमुख समाचार-पत्रों की कतरनें... 22-03-2018 









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