19 मार्च 2018

बड़े संभलकर गुजरे... (इतने बरस यूँ ही नहीं गुजरे)

कागजातों में भी हो गए आज चवालीस के. जी हाँ, चवालीस साल के असल में तो कुछ माह पहले हो गए थे मगर यहाँ बहुत से लोगों को कागजात ही सही समझ आते हैं, तो लो यहाँ भी चवालीस पूरे. इतने बरस ऐसे ही गुजर गए और ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो. पलट कर न भी देखें, बस अपने हाथों को ही देख लें तो एक हाथ खाली है, एक हाथ भरा है. बहुत कुछ हाथ आया है, बहुत कुछ इन हाथों ने गँवाया है.


बहरहाल, आज के दिन कोई फिलोसोफी नहीं. स्व-रचित एक कविता आपके लिए...


ख्वाब में मिलते हुए भी,
बड़े संभलकर गुजरे
रुकते-रुकते हुए भी,
बड़े संभलकर गुजरे।

बरसों बाद आज,
वो करीब से गुज़रे,
न संभलते हुए भी,
बड़े संभलकर गुजरे।

चाहत गुजरने की,
तेरी रहगुजर से,
कभी गुजरते हुए भी
बड़े संभलकर गुजरे।

उस एक लम्हे के बाद,
न जाने कितने पल,
उसे देखते हुए भी
बड़े संभलकर गुजरे।

अदा से बहती हवा,
लगता है मानो वो,
न चाहते हुए भी,
बड़े संभलकर गुजरे।

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