03 October 2013

'राईट टू रिजेक्ट' की पूर्व-पीठिका है 'इनमें से कोई नहीं' का विकल्प




माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले के द्वारा चुनावों में ईवीएम में अब ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प देने का आदेश दिया है. ये विकल्प मतदाताओं को किसी भी उम्मीदवार को न चुनने की आज़ादी देगा. देखा जाये तो अभी भी मतदाताओं के समक्ष उम्मीदवारों को नकारने सम्बन्धी व्यवस्था ‘४९-ओ’ के रूप में मौजूद थी किन्तु इस व्यवस्था से मतदाता अनभिज्ञ तो थे ही साथ ही इसकी जटिलता के कारण भी इसके प्रति जागरूक नहीं थे. इस फैसले के बाद से आम जनता में व्यापक प्रसन्नता है किन्तु जो लोग इस विकल्प को ‘राईट टू रिजेक्ट’ समझ रहे हैं उनको निराशा हो सकती है. दरअसल वर्तमान फैसले से जो विकल्प ईवीएम में आएगा वो केवल उम्मीदवारों को नकारने सम्बन्धी कार्य करेगा. इस फैसले से चुनाव पर, उम्मीदवारों पर किसी तरह का प्रभाव नहीं पड़ने वाला है, न ही उम्मीदवार की उम्मीदवारी रद्द होगी और न ही चुनाव. ऐसे में उन तमाम मतदाताओं में इस विकल्प को लेकर कोई उत्साह नहीं पैदा होगा जो मतदान को नकारात्मक अंदाज में लेकर मतदान से दूर रहते हैं.
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भारतीय सन्दर्भ में मतदान की, निर्वाचन की जो स्थिति है उसमें जाति, धर्म, क्षेत्र की भूमिका भी जबरदस्त रहती है. इसके अलावा मतदाताओं में भी एक प्रकार की सुसुप्तावस्था मतदान के प्रति देखने को मिलती है. इन सबके चलते मतदान का प्रतिशत बमुश्किल ६० के आंकड़े को पार कर पाता है. कम प्रतिशत में होते निर्वाचन से बाहुबली, जातिगत राजनीतिज्ञ अपने वोट-बैंक के कारण विजयी होकर सदन में पहुँच जाते हैं. ऐसे लोग बजाय जनहित के स्वार्थलिप्सा में लग जाते हैं और आम मतदाता खुद को ठगा हुआ सा महसूस करती है. यदि इस सन्दर्भ में उच्चतम न्यायालय के फैसले को देखा जाये तो यदि उम्मीदवारों को नकारने सम्बन्धी मतों की संख्या सर्वाधिक भी रहती है तब भी समस्त उम्मीदवारों में से सर्वाधिक मत प्राप्त उम्मीदवार ही विजयी घोषित किया जायेगा. ऐसे में इस विकल्प से सिर्फ मतदाताओं की गोपनीयता को सुरक्षित रखा जा सकेगा जो नियम ४९-ओ का प्रयोग करने के कारण से भंग हो जाती थी. 
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‘राईट टू रिजेक्ट’ में अभी भले समय लगे किन्तु इस कदम से राजनीति में सुधार की सम्भावना दिख रही है. राजनैतिक दलों में आज नहीं तो कल स्वच्छ छवि के लोगों को उम्मीदवार बनाये जाने का दबाव बढ़ेगा. लगातार चलती मुहिम के कारण २००१ के बाद अब जाकर उम्मीदवारों को नकारने सम्बन्धी अधिकार मतदाताओं के हाथ में आया है. इस विकल्प के प्रति मतदाताओं में यदि लगातार जागरूकता बनी रही, दिखती रही तो वह दिन भी दूर नहीं होगा जबकि भारतीय मतदाताओं को ‘राईट टू रिजेक्ट’ का अधिकार भी मिल जाये. तब तक कम से कम दागी, दोषी, अपराधी उम्मीदवारों को अधिक से अधिक संख्या में नकारकर मतदाता अपनी शक्ति का परिचय तो दे ही सकते हैं.

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