14 मार्च 2013

बिल कहीं ज़ज्बाती बनकर न रह जाये



दिल्ली के गैंग रेप केस के बाद पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कड़े से कड़ा कानून बनाये जाने के स्वर मुखरता से उठे. सभी ने एकमत से सरकार से सकारात्मक कानून बनाने की मांग की. इधर सरकार इस केस में बुरी तरह से फंसती दिख रही थी क्योंकि केस दिल्ली का था और ऊपर से समस्या यह थी कि इस घटना के बाद से दिल्ली में कई और घटनाएँ गैंग रेप की हुईं. इसी के साथ पूरे देश में जैसे बलात्कार सम्बन्धी घटनाओं की बाढ़ सी आ गई थी (अभी भी आई हुई है) दिल्ली केस के आरोपियों को फांसी देने की मांग के साथ बलात्कारियों को फांसी अथवा अंग-भंग जैसी कठोर, अमानवीय सजा की मांग भी पुरजोर ढंग से उठाई गई. महिला-छेड़छाड़ की, महिला-हिंसा की घटनाएँ सरकार के गले की हड्डी बन चुकी हैं और सरकार अपनी तमाम फजीहतों के बीच कोई कड़ा कदम उठाकर देश को दिखाना चाहती थी कि वो महिलाओं की सुरक्षा के लिए दत्तचित्त है. 
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सरकार ने अपने दायित्वबोध को दर्शाते हुए (मंशा इसके पीछे क्या हो, ये बाद की बात है) एक बिल सदन में प्रस्तुत किया. इस बिल में तमाम सारे प्रावधानों पर सांसदों में मतभेद भी दिखे किन्तु फिर जैसा कि खबरों के माध्यम से सामने आया, उससे पता चला कि लड़कियों को देखने, छूने, छिपकर देखने, पीछा करने को भी गैर जमानती धाराओं के अंतर्गत अपराध माना है. महिलाओं के साथ इस तरह की हरकतों को बलात्कार की श्रेणी में शामिल माना गया है. संभव है कि सरकार की मंशा वाकई कुछ सकारात्मक करने की हो और वो वाकई इस बिल के माध्यम से महिलाओं की सुरक्षा करना चाहती हो, अपराधियों में, दुराचारियों में डर पैदा करना चाह रही हो किन्तु जिस तरह से हालातों को बिल के प्रावधानों द्वारा गैर जमानती अपराध बनाया जा रहा है वो चिंतित करता है, डराता भी है. 
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ये बात किसी से भी छिपी नहीं है कि इस बिल से पहले भी और कई कठोर कानून, कई कठोर कानूनी धाराएँ हमारे आसपास हैं. खुद महिलाओं की सुरक्षा से सम्बंधित दहेज़ विरोधी कानून अभी भी अपनी पूरी क्षमता के साथ हमारे समाज में काम करता दिखता है. इस सत्य के साथ एक सत्य ये भी है कि दहेज़ विरोधी कानून का दुरुपयोग जिस तरह से हुआ है उतना दुरुपयोग (एस०सी०/एस०टी० एक्ट को छोड़ दिया जाये) किसी दूसरे कानून का नहीं हुआ है. किस तरह से लड़के वालों को अनावश्यक रूप से फंसाया गया है ये किसी से छिपा नहीं है. इसी तरह से महिला हिंसा को लेकर, छेड़छाड़, बलात्कार आदि को लेकर बने कानूनों का भी यही हाल दिखता है. इन कानूनों के लगातार बुरी तरह से होते दुरुपयोग ने ही संभवतः लोगों में इसके डर को समाप्त कर दिया है. 
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अब जिस बिल को, जिन-जिन कानूनी प्रावधानों के साथ सरकार लागू करने का विचार बना रही है वो एकबारगी भले ही दुराचारियों में, अपराधियों में डर का भाव पैदा कर दे किन्तु उससे ज्यादा खाकी वर्दी को निरंकुश बना रही है. इस कानून का लाभ उस स्थिति में मिलना तय है जबकि हमारा समाज, हमारे परिवार लड़कियों की शिकायतों पर गंभीरता से ध्यान देना शुरू करें. अभी भी लड़कियों को संयम से, शांति से रहने की सलाह दी जाती है, कॉलेज, बाजार, ऑफिस आदि आने-जाने में उनको ही नियंत्रण में रहने का मशविरा दिया जाता है. ऐसे में कैसे कोई लड़की या उसका परिवार किसी अपराधी के खिलाफ, दुराचारी के विरुद्ध शिकायत करने का साहस जुटा सकेगा? 
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परिवार के, समाज के इस विभेदपूर्ण व्यवहार, इस विभेदपूर्ण सोच से तो एकबारगी कोई निपट भी ले किन्तु शिकायत दर्ज करने को बैठे खाकी वर्दी वाले महानुभावों से कोई कैसे निपटेगा? खाकी वर्दी का हाल क्या है ये किसी से छिपा नहीं है. इन लोगों को कोई न कोई बहाना चाहिए अपनी जेब गरम करने का, इसके लिए किसी निर्दोष को, किसी मासूम तक को पकड़ के अन्दर करना पड़े तो भी कोई समस्या नहीं. ऐसे विषम हालातों में सरकार को समझना चाहिए कि कहीं वो इस बिल के रूप में खाकी वर्दी के नख-दन्त को और नुकीला-विषैला तो नहीं कर रही? कहीं ऐसा न हो कि आने वाले दिनों में महिलाओं की असुरक्षा ज्यों की त्यों बनी रहे, एक असुरक्षा का मुद्दा और खड़ा हो जाये? इस बिल को और बेहतर बनाकर महिलाओं के पक्ष में लाये जाने की आवश्यकता है न कि ज़ज्बात में आकर सिर्फ नाखून, दांत दिखाने.
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