26 February 2013

उफ़...!!! पारिवारिकता का इतना विकृत विखंडन



          सामाजिकता का ताना-बाना वर्तमान में किस कदर उलझ गया है, इस बात की कल्पना कर पाना भी कई बार सम्भव सा नहीं लगता है। जीवन की आपाधापी में, मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की जद्दोजहद में इंसान रिश्तों की कदर करना भूलता सा जा रहा है। रिश्तों का आपसी साहचर्य भी उसके लिए विमर्श का, विवाद का, द्वंद्व का विषय बनता जा रहा है। आये दिन कहीं न कहीं ऐसी घटनायें सामने आती हैं जो इस पूरे सामाजिक ढांचे पर विचार करने को विवश करती हैं। हमारी सामाजिक अवधारणा रिश्तों की जिस गरिमामयी डोर से पूरी सशक्तता के साथ कभी बंधी दिखाई देती थी, आज वही अवधारणा टूट-टूट कर बिखरती दिख रही है। अधिसंख्यक रूप में सम्बन्धों में मधुरता का अभाव, रिश्तों में कड़वाहट, आपसी गरमाहट में कमी देखने को मिलती है। इस तरह की स्थितियां जहां एक ओर बेचैन करती हैं वहीं दूसरी ओर सामाजिक शोधपरक अध्ययन को भी प्रेरित करती हैं। 
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          अभी कुछ दिनों पूर्व एक परिवार का उदाहरण सामने आया जिसने सामाजिक विसंगति को लेकर एक और अध्याय सामने ला दिया। एक मां अपने उन दो बच्चों से विद्वेष की भावना रखती है जिनको उसने स्वयं पैदा किया है। विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है कि वह अपने सगे दोनों बच्चों से इस कारण ऐसी भावना रखती है क्योंकि वह उन दोनों बच्चों के पिता, अपने पति से नफरत करती है। दोनों बच्चों को बुरी तरह से मारना-पीटना, भूखे रखना, अंधेरे कमरे में बन्द कर देना, छोटी-छोटी बात पर चिल्लाना आदि उस महिला के द्वारा रोज ही होता है। आश्चर्य की बात यह है कि बच्चों की उम्र क्रमशः 8 वर्ष तथा 5 वर्ष है। वह महिला अपने पति और उन दोनों बच्चों के साथ ही एक मकान में रहती है; उन दोनों पति-पत्नी के बीच आपस में किसी भी तरह का रिश्ता नहीं है। ऐसा भी नहीं कि वह महिला मानसिक रूप से विक्षिप्त हो, वह शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ है। किसी के भी पारिवारिक मामलों में बेवजह हस्तक्षेप न करने की आदत और उस परिवार से अपरिचित होने से बच्चों के प्रति, पति के प्रति उस महिला की नफरत के कारणों को चाह कर भी जान नहीं सके। 
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          इससे पूर्व भी पारिवारिक विखण्डन की, पारिवारिक मर्यादाओं का विध्वंस करने वाली घटनाओं से हम सभी का वास्ता पड़ता रहा है। कभी पिता-पुत्र के बीच अनबन की, कभी भाई-भाई की रंजिश की, कभी अपनी ही बहिन-बेटी से कुकृत्य की, कभी अपनी ही गर्भस्थ-नवजात बेटियों को मौत देने की, कभी दहेज की खातिर बहुओं की मार डालने की, कभी जायदाद के लालच में हत्याओं के होने की, कभी प्रेम-विवाह के कारण वीभत्स कांड करने की दुर्दान्त पारिवारिक घटनाओं के साथ-साथ और भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष घटनायें हमारे समाज के विभिन्न परिवारों में होती रहती हैं। ऐसे में हो सकता है कि उक्त घटना मन को विचलित न करे किन्तु एक मां द्वारा अपनी कोख से पैदा किये बच्चों के साथ इस तरह का अमानवीय व्यवहार करने के कारण उक्त घटना विचारणीय है। विचार करना होगा कि समाज के पारम्परिक स्वरूप नष्ट होने से, उसकी सामाजिकता के नित विध्वंस होने से ऐसे गरिमामयी रिश्तों में भी टूटन, विचलन आयेंगे?
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3 comments:

संजय कुमार चौरसिया said...

aisi sthiti main samsya ka nidaan hastakshep se kiya ja sakta hai, yadi sthiti jyada khrab hai to talak bhi uchit hai, kyonki bachchon ka jeevan anmol hai

दिनेश पारीक said...

सचाई से रूबरू कराती प्रस्तुती
सार्थक प्रस्तुती करती रचना
मेरी नई रचना
ये कैसी मोहब्बत है

खुशबू

दिनेश पारीक said...

सचाई से रूबरू कराती प्रस्तुती
सार्थक प्रस्तुती करती रचना
मेरी नई रचना
ये कैसी मोहब्बत है

खुशबू