15 August 2012

सूचना अधिकार अधिनियम का उपयोग हो सकारात्मक रूप में



उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बैठी एक अतिउत्साही बच्ची ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का उपयोग करते हुए एक बार फिर से जनभावनाओं को हिलाने जैसा कार्य किया है। केन्द्र सरकार के मंत्रालयों से मांगी गई सूचना के आधार पर ज्ञात हुआ कि 15 अगस्त, 26 जनवरी, 2 अक्टूबर को राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाये जाने का कोई भी लिखित आदेश नहीं है। सम्भव है कि प्रथम दृष्टया तकनीकी रूप से इन दिवसों को पर्व के रूप में मनाये जाने से सम्बन्धित प्रपत्र का न होना गलत माना जाये पर यदि जनभावनाओं की दृष्टि से देखा जाये तो इस तरह की बातों और सूचनाओं के द्वारा सिर्फ और सिर्फ भ्रम की स्थिति ही पैदा की जा सकती है। इससे पूर्व भी उस बच्ची के सूचना अधिकार सम्बन्धी आवेदन-पत्र के माध्यम से ज्ञात हुआ था कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहे जाने सम्बन्धी कोई आदेश सरकार के पास नहीं है; हॉकी अथवा किसी भी खेल को राष्ट्रीय खेल का स्थान प्राप्त नहीं है।

सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 का इस तरह की सूचनाओं की प्राप्ति के लिए प्रयोग किया जाना किसी न किसी रूप में आम आदमी के लिए बने एक सशक्त अधिनियम को भविष्य में कमजोर करने का कार्य करेगा। सूचना का अधिकार अधिनियम को लागू करवाये जाने के पीछे जिन लोगों की मेहनत और आन्दोलन ने अपना असर दिखाया है उन्हें तनिक भी भान नहीं होगा कि ऐसे सशक्त कानून का प्रयोग इस तरह की सूचनाओं की प्राप्ति के लिए किया जायेगा।

राजधानी की बच्ची के द्वारा मांगी जाने वाली सूचनाओं पर पर्याप्त जानकारी, प्रपत्र के न मिलने से आम जनमानस में सरकार के विरुद्ध एक प्रकार का वातावरण तो बन ही रहा है साथ ही जनभावनाओं पर ठेस भी लग रही है। इस देश की आजादी और यहां के संविधान की स्वीकार्यता वाले दिन को सम्पूर्ण राष्ट्र द्वारा उत्साहपूर्वक मनाये जाने के लिए एक अदना से कागज की आवश्यकता है? सम्पूर्ण देश यदि पूर्ण श्रद्धाभावना से यदि इन दिनों पर आयोजन करता है तो उसे सम्पन्न करवाने के लिए क्या किसी मंत्रालय के आदेश की आवश्यकता है? यदि ऐसा है तो शायद कल को होली, दीपावली, ईद, क्रिसमस, गुरुनानक जयंती आदि को मनाने के लिए भी सरकारी आदेश की आवश्यकता पड़ेगी। यदि यही हाल हमारी कथित जागरूकता का रहा तो सम्भव है कि आने वाले दिनों में परिवार कल्याण मंत्रालय से अथवा किसी और विभाग से हमें इस बात का प्रपत्र मांगना पड़े कि माता को माता और पिता को पिता कहने का आदेश कब हुआ था, किसके द्वारा हुआ था?

जागरूकता, उत्साह, सक्रियता आदि आवश्यक है और ये इस तरह की स्थितियों से सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं पर कभी-कभी इनके प्रति अतिशयता की स्थिति से भ्रम ही उत्पन्न होता है। इस बच्ची की देखादेखी अथवा इसी के द्वारा कल को सम्भव है कि इस तरह की जानकारी भी ली जा सकती है कि किस आदेश के अन्तर्गत सड़क पर बांयी ओर चलने का नियम बनाया गया? किस आदेश से स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियों की व्यवस्था की गई? किसने आदेश दिया था कि यातायात के संचालन में लाल रंग से रुकना होगा और हरे रंग से चलना होगा? किस आदेश के द्वारा देश के सभी कार्यालयों को दिन में खोला और रात को बन्द रखा जाता है? किस सरकारी आदेश के द्वारा व्यक्तियों को अपने नाम के साथ विभिन्न उपनाम लगाने की अनुमति दी गई है? फिजिक्स का हिन्दी में भौतिकी कहना सही है अथवा भौतिकशास्त्र और इसे किस आदेश के द्वारा ऐसा कहा जाता है? और भी बहुत से सवाल बन सकते हैं जो सिर्फ और सिर्फ मीडिया में स्थान दिला सकते हैं, क्षणिक प्रसिद्धि दिला सकते हैं।

हमें इस बात को समझना होगा कि कई बार अतिशय उत्साह में हम जनभावनाओं का असम्मान करते हैं। महात्मागांधी के राष्ट्रपिता घोषित करने सम्बन्धी प्रपत्र/आदेश के न होने से गांधी को राष्ट्रपिता मानने अथवा न मानने वालों की संख्या में कमी-वृद्धि नहीं हो जायेगी पर इससे एक अनावश्यक बहस को बल मिलेगा। ऐसे अधिनियमों/कानूनों, जिनके द्वारा एक आम आदमी को वे सारे तथ्य जानने का अधिकार मिला है जिन्हें संसद के द्वारा जाना जा सकता है, का प्रयोग सोच-समझ कर सकारात्मक रूप में किया जाना चाहिए। उस बच्ची के भीतर अपार उत्साही ऊर्जा का भंडार है, उसके अंदर सूचना का अधिकार अधिनियम के उपयोग का इतना ही जज्बा है तो वह इसका प्रयोग कमजोर को, वंचितों को, गरीबों को, पिछड़ों को, जरूरतमंदों को लाभ दिलवाने में करे। यदि उसके माता-पिता के द्वारा उसको पर्याप्त सकारात्मक सहयोग प्राप्त है तो वे उसे उन मुद्दों पर सूचना प्राप्ति के लिए प्रेरित करें जिनसे समाज का भला हो, समाज के विभिन्न वर्गों का भला हो न कि अनावश्यक रूप से विवाद की स्थिति पैदा हो, जनभावनाओं को ठेस लगने जैसी स्थिति का जन्म हो।

सूचना का अधिकार अधिनियम का प्रयोग इस तरह की सूचनाओं के लिए कर रहे ऐसे सभी लोगों को ध्यान में रखना होगा कि ऐसे सशक्त कानून का इस तरह से दुरुपयोग होने से आने वाले दिनों में इस कानून में पता नहीं किस तरह के और क्या-क्या संशोधन करके इसे पंगु कानून बना दिया जाये। भविष्य में जनता के अधिकारपूर्ण कदम के सुरक्षित उठाये जाने हेतु वर्तमान की इस तरह की बेतुकी सूचना-प्राप्ति से बचना होगा, सशक्त जनसूचना अधिकार अधिनियम को कमजोर होने से बचाना होगा।

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चित्र गूगल छवियों से साभार


1 comment:

रेखा श्रीवास्तव said...

कल इस विषय में फेसबुक पर पोस्ट थी , यह दुरूपयोग है इस अधिनियम को; इसके लिए सूचना के अधिकार के तहत पूछी गयी जानकारी कितनी जनहित में है और उसकी कितनी उपयोगिता है, के आधार पर स्वीकृत करनी चाहिए . देश या जनमानस के भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली जानकारी माँगने पर उसको निरस्त कर दिया जाना चाहिए. सबसे शर्म की बात तो ये है कि भारत को भारत कहलाने के बारे में कोई ठोस सबूत चाहिए और इस आशय में राज्यसभा में बिल प्रस्तुत किया जा रहा है. हम अपनी ऐतिहासिक विश्वास के लिए भी प्रमाण माँगना शुरू कर देंगे .