27 July 2012

आवश्यकता व्यावहारिकता की है, अनशन की नहीं


अन्ना हजारे के स्थान पर इस बार अन्ना टीम ने अनशन करने का फैसला किया। मुद्दा वही एक जनलोकपाल बिल को पारित करवाने की मांग। संसद की विगत एक वर्ष की गतिविधि देखने के बाद अन्ना टीम स्वयं ही इस बात को स्वीकार करती और अपने विभिन्न कार्यक्रमों में कहती घूम रही है कि वर्तमान संसद जनलोकपाल बिल को पारित नहीं करने वाली। अब जब इस सत्य को जनता ने, अन्ना टीम ने, अन्ना हजारे ने स्वीकार लिया है तो फिर इस अनशन की आवश्यकता क्या है?

यह हमारी व्यक्तिगत धारणा है और आवश्यक नहीं कि आप भी इससे सरोकार रखते हों। वैसे भी तमाम सारे लोग अन्ना हजारे और अन्ना टीम के आभामंडल से इतनी बुरी तरह से ग्रसित हैं कि वे उनके विरुद्ध कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं होते। हमें याद रखना होगा कि शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन घुसा लेने से दुश्मन का भय कम नहीं हो जाता है। इस पर बहुत विस्तार से न जाकर कुछ बिन्दुओं के द्वारा अपनी बात को स्पष्ट करने का प्रयास है जिसके आधार पर आसानी से कहा जा सकता है कि वर्तमान अनशन औचित्यविहीन और अप्रासंगिक है।

1- वर्तमान में न तो संसद चल रही है और न ही केन्द्र सरकार की ओर से जनलोकपाल के पारित करने सम्बन्धी कोई भी कार्यवाही प्रारम्भ की गई है। ऐसे में अनशन की प्रासंगिकता को समझ पाना मुश्किल ही है।

2- अन्ना टीम के स्वीकारे जाने के बाद कि वर्तमान संसद जनलोकपाल बिल को बनाने की मंशा नहीं रखती, उसने किस आधार पर अनशन को शुरू किया?

3- जनता के मध्य अपनी पैठ को बनाने का एकमात्र तरीका अनशन ही नहीं है। अन्ना टीम को बैठकों, रैलियों, संदेश यात्राओं आदि के स्थान पर जनजागरूकता कार्यक्रमों का संचालन करना चाहिए था।

4- अन्ना टीम की सबसे बड़ी कमजोरी उनका संगठनात्मक स्वरूप न होना है। बार-बार बताये जाने, समझाये जाने के बाद भी उनकी ओर से किसी प्रकार के संगठन निर्माण के प्रयास नहीं किये गये।

5- कहीं न कहीं अन्ना टीम के कार्यों, बयानों को देखकर लगता है कि वे सभी अतिवादिता के, अहं के शिकार हो गये हैं। ऐसा नहीं है कि देश में सिर्फ और सिर्फ वहीं चन्द लोग दिमाग वाले हैं। कम से कम उनका साथ दे रहे लोगों की राय को सुनने, समझने का प्रयास भी उनके द्वारा होना चाहिए।

6- अन्ना टीम के द्वारा उत्तराखण्ड जनलोकपाल बिल को सबसे सशक्त बिल घोषित किया गया था। क्या अन्ना टीम ने व्यावहारिक रूप से उस बिल का अमल में लाने का कोई भी प्रयास किया? उसके द्वारा किसी भी मंत्री, विधायक के विरुद्ध भ्रष्टाचार में मामले को उठाने का प्रयास किया?

7- क्या इस देश में भ्रष्टाचार के लिए सिर्फ और सिर्फ केन्द्र सरकार, केन्द्रीय मंत्री, सांसद, विधायक ही दोषी हैं? अन्ना टीम इनके खिलाफ जांच की मांग करती है, जनलोकपाल बिल लाने की बात करती है पर आम जनता से जुड़ी समस्याओं के लिए किसी भी तरह का प्रयास करती नहीं दिखती है।

8- विद्युत विभाग, पुलिस विभाग, मनरेगा, शिक्षा विभाग, चिकित्सा, परिवहन आदि-आदि ऐसे विभाग हैं जिनमें घनघोर भ्रष्टाचार व्याप्त है। इसके बाद भी अन्ना टीम का ध्यान इस ओर नहीं जाता है, उनका सुर केवल और केवल जनलोकपाल बिल के लिए ही सुनाई देता है।

9- यदि सिर्फ जनलोकपाल बिल के आने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता तो उत्तराखण्ड में अंकुश लग गया होता। वहां बिल को पारित हुए लगभग 5 महीने तो बीत ही गये हैं। कोई बतायेगा कि कितने मंत्रियों को जेल हुई, कितनों के खिलाफ जांच बैठी?

10- अन्ना टीम स्वयं को जनता के बीच सिद्ध करना चाह रही है। उसे भली-भांति ज्ञात है कि अभी तक जितनी भी भीड़ उसके साथ आई है वह अन्ना हजारे का जादू हो सकता है। अन्ना टीम सम्भवतः इस अनशन को प्रयोग के रूप में भी आजमाना चाह रही होगी। प्रारम्भ से ही उसने अन्ना हजारे की अनुपस्थिति के बिना इसे करने की घोषणा कर रखी थी किन कारणों से अन्ना हजारे स्वयं अंतिम समय पर उनके साथ मंचासीन हुए, कहा नहीं जा सकता है।

बातें और भी हैं जो हमने स्वयं व्यक्तिगत अनुभवों के बाद महसूस की हैं। किरण बेदी जी, संजय सिंह का उरई रैली में आना और उस समय की अन्ना टीम की रणनीति, उस रैली के पूर्व, रैली के दौरान, रैली के बाद की गतिविधियां, इसी के साथ झांसी कार्यकर्ता बैठक में स्वयं अरविन्द केजरीवाल, संजय सिंह से सीधे-सीधे संवाद के अलावा लिखित में सुझावों को देना, उनके अघोषित, अनियोजित कार्यकर्ताओं का अकस्मात आ धमकना आदि-आदि ऐसी घटनायें हैं जिन्होंने अन्ना टीम की रणनीति को स्पष्ट किया है। किसी भी आन्दोलन से जुटी भीड़ की सहायता से आन्दोलन को बहुत लम्बे समय तक, अन्तिम लक्ष्य तक ले जा सकना असम्भव होता है। अन्ना टीम कुछ ऐसा ही कर रही है। बिना किसी ठोस चेहरे के, गिने-चुने लोगों को ही संगठन मान लेने से अनशन की शुरूआत तो की जा सकती है पर विजय को प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

इसमें शक नहीं कि अन्ना हजारे और उनकी टीम अच्छा काम कर रही है, संघर्ष कर रही है। इसमें भी शक नहीं कि जनता ने भी उनको भरपूर समर्थन दिया है। इसके बाद भी एक नियमित अन्तराल के बाद अकारण अनशन का राग छेड़ देना प्रासंगिक नहीं है। यह आन्दोलन के मूल उद्देश्य को भटका देगा। अन्ना टीम पता नहीं सत्य को कब स्वीकारेगी? आन्दोलन की सफलता के लिए भीड़ नहीं संगठनात्मक स्वरूप चाहिए।






4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (28-07-2012) के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
शिष्ट आचरण से सदा, अंकित करना भाव।।

सुशील said...

विचारणीय प्रश्न हैं उठाये
पर मेरी समझ में भी
अन्ना अभी तक नहीं आये
अन्ना अपने जगह पर ठीक हैं
उनके खड़े होते ही
क्यों हो जाते हैं
जगह जगह के सांप
बगल में उनकी फोटो के
अपना फन उठाये
सफेद टोपी अपने सर पर
एक लगाये ?

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आप बहुत मेहनत करते हैं..ये हम जैसों का सौभाग्य है जो आपके चर्चा मंच में स्थान पा जाते हैं...आभार आपका..
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपने सही कहा...आभार
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड