21 January 2012

सोच का दायरा व्यापक करना होगा


इक्कीसवीं सदी, पॉप कल्चर, आधुनिकता, औद्योगीकरण, भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण आदि-आदि नये-नये शब्दों के बीच न जाने कितनी तरह के सम्बन्धों ने भी अपना सिर उठाया है। कबीलाई संस्कृति से अपने विकास का सफर तय करते हुए हम इंसानों ने परिवार की व्यापक और सुदृढ़ व्यवस्था और संकल्पना को साकार किया। पारिवारिक व्यवस्था की सुदृढ़ता के बीच ही हमने इंसानियत का, मावनता का, संवेदनशीलता का, सहायता का, दया का, परोपकार आदि का पाठ सीखा था। यह सब संयुक्त परिवार के कारण आसानी से बच्चों को उपलब्ध भी होता था और उनको आसानी से अपनी चारित्रिक विशेषता के रूप में ढालना आसान भी होता था।

इंसान ने अपने आपको विकसित करने का कार्य किया वहीं उसने अपनी इस चारित्रिक विशेषता को बदलने का कार्य किया। इंसानियत, परोपकार, मानवता, दया, स्नेह, सहायता आदि को उसने विस्मृत करना शुरू कर दिया। उसके सामने सिर्फ और सिर्फ धन कमाना एकमात्र लक्ष्य हो गया। इस लक्ष्य-बेधन के लिए इंसान ने परिवार को विखंडित कर दिया, सम्बन्धों को तार-तार कर दिया। संयुक्त परिवार से एकल परिवार और फिर उससे भी आगे जाकर उसने नाभिक परिवार का गठन कर डाला। इसी बीच आये क्रान्तिकारी से दिखने वाले परिवर्तनों ने समलैंगिकता, सहजीवन-लिव इन रिलेशनशिप- आदि को भी स्वीकृति प्रदान करवा दी।

परिवार में आये परिवर्तन का असर समाज पर तो पड़ा ही सबसे ज्यादा उसने इंसान को ही प्रभावित किया। अपने आपमें सिमटे रहने की प्रवृत्ति देखने को मिलने लगी। व्यक्ति एकाकी होकर जीवन-निर्वाह करने को महत्व देने लगा। उसके लिए स्वयं की अहमियत ही बढ़ी और शेष को उसने नगण्य रूप में स्वीकार करना शुरू कर दिया। इस तरह की सोच के चलते इंसान भीड़ के बीच भी खुद को तन्हा समझने लगा, परिणामतः हताशा-निराशा जैसी विकृतियों के साथ अवसाद जैसी बीमारियों ने भी इंसानी शरीर में अपना निवास कर लिया। इस तरह की समस्याओं के चलते न सिर्फ व्यक्ति, न सिर्फ परिवार बल्कि समाज को भी दुष्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं।

हम आये दिन देखते हैं कि राह चलते महिलाओं को, छोटी बच्चियों को, युवा लड़कियों को छेड़ने वाले अपना कार्य करते रहते हैं और राह चलते लोग उसे सिर्फ एक तमाशा समझकर देखकर भी अनदेखा कर जाते हैं। सड़क के किनारे पड़े घायल व्यक्ति को उठाकर चिकित्सालय पहुंचाने में भी हम संकोच करते दिखते हैं। राह चलते मदद करने की बात तो आज के समय में सम्भवतः बड़ी होगी, हम अपने पड़ोसी की मदद करने से भी हिचकते हैं। हमें इससे क्या लेना’, ‘हमारा इससे क्या लाभजैसी मानसिकता को पालकर भी हम समाज में खुद को सामाजिक प्राणी सिद्ध करने के प्रयास करते रहते हैं।

यह तो हम सभी को सोचना होगा कि सिर्फ और सिर्फ स्व-विकास के लिए, स्व-लाभ को ध्यान में रखकर किये गये कार्यों से हो सकता है कि हमें तात्कालिक लाभ तो प्राप्त हो जायें किन्तु उससे दीर्घगामी सुखद परिणाम किसी भी रूप में हासिल होने वाले नहीं। आज समाज के विकास हेतु, परिवार के विकास हेतु, व्यक्ति के विकास हेतु हमें स्व की सोच से बाहर निकलना पड़ेगा।



1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी लगाई है!
सूचनार्थ!