30 August 2011

लोकतंत्र में जैसा चाहे खेल खेल डालो



आज दो समाचारों ने जैसे हिला दिया। एक ओर राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी की सजा पर रोक सम्बन्धी और दूसरी ओर अफजल गुरु द्वारा हुर्रियत के नेता गिलानी को लिखी गई चिट्ठी का समाचार। अभी-अभी देश का लोकतन्त्र अन्ना के अनशन की खुमारी से बाहर निकला भी नहीं था कि उसके सिर पर ये दोनों घटनायें जूते सी पड़ीं। ऐसा हमारा मानना है और विशेषज्ञों से इस सम्बन्ध में राय यह लेनी है कि कहीं ऐसा कहने पर विशेषाधिकार हनन का मामला तो नहीं बनता है।


चित्र गूगल छवियों से साभार


वर्ष 1991 से आज तक पता नहीं राजीव गांधी के पुत्र-पुत्री-पत्नी को उनके हत्यारों को फांसी दिलवाने की मंशा दिखी या नहीं क्योंकि एक को माफी देने जैसा काम उनके वारिसों द्वारा पूर्व में किया जा चुका है। राजीव के असल वारिसों के इस कदम के बाद भी देश की बहुतायत जनता उनके हत्यारों को फांसी पर लटका देखना चाहती है। भले ही देश की बहुतायत जनता न चाहे पर हम तो चाहते हैं कि राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी की सजा मिले और जल्द से जल्द मिले।

अब इस रोक का क्या दूरगामी परिणाम होगा यह तो अभी कहना जल्दबाजी ही होगी किन्तु यह तो कहा ही जा सकता है कि भारतीय तन्त्र चाहे वह जनता के रूप में हो, सरकार के रूप में अथवा प्रशासन के रूप में हो, भयंकर तरीके से जातिगत/धर्मगत बेडि़यों में जकड़ा है यदि ऐसा न होता तो राजीव के हत्यारों की सजा पर रोक कदापि नहीं लगती।

इसी तरह से मिलता-जुलता समाचार रहा अफजल की वह चिट्ठी का सामने आना जिसमें उसने हुर्रियत के नेता गिलानी से कहा है कि उसने दया याचिका महामहिम को भेज कर गलती की है। उसका शहीद होना ज्यादा अच्छा है। हमारा मानना है कि अब भारतीय सरकार को बिना किसी भी देर के, बिना किसी भी तरह के कानूनी रास्तों को अपनाकर सीधे-सीधे अफजल को दिल्ली में इंडिया गेट के सामने खड़ा करके जूतों की मार जनता के द्वारा तब तक करवानी चाहिए जब तक कि अफजल की शहीद होने की इच्छा पूरी नहीं हो जाये।

यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हमारे देश के अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर के भारतपरस्त मुख्यमंत्री कहते फिरते हैं कि अफजल की फांसी से घाटी के हालात बिगड़ने का डर है। हमारा सौ प्रतिशत विश्वास है कि जूतों की मार फांसी नहीं है सो इस कारण से घाटी का माहौल भी नहीं बिगड़ेगा और अफजल का शहीद होने का अरमान भी पूरा हो जायेगा। आखिर एक आदमी को सैकड़ों-हजारों व्यक्ति जूतों की मार से मौत की नींद सुलायेंगे, ये भी किसी शहादत से कम तो नहीं ही होगी।

बहुत कुछ नहीं कहना है, बस यही कि अन्ना के अनशन से कुछ-कुछ सांस सा लेता लोकतन्त्र लग रहा है जैसे कि चन्द लोगों की हाथों में खिलौना सा बना है। जिसे देखो वो अपने-अपने तरीके से खेलने की कोशिश कर रहा है।



1 comment:

Ratan Singh Shekhawat said...

जिस देश के राजनेता राष्ट्रहित को भी वोटों के तराजू में तोलते है वहां ऐसे मामले आते ही रहेंगे|