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15 July 2014

युवा, नशा, आत्महत्या, मनोवैज्ञानिक मदद



युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से कहीं अधिक सक्रिय, कहीं अधिक जागरूक, कहीं अधिक सजग, कहीं अधिक भविष्य के प्रति सचेत है, ऐसा माना जाता है. ऐसा मानने के पीछे आज के तकनीकी संसाधनों के बीच युवा पीढ़ी का जबरदस्त उड़ान भरना भी हो सकता है. हवा से बातें करती ये पीढ़ी, बिजली की रफ़्तार से भागती ये पीढ़ी अपने कैरियर, अपनी जॉब, अपने पैकेज को लेकर जितनी सजग-सचेत दिख रही है उतना किसी भी पीढ़ी के साथ देखने को नहीं मिला और इसी के चलते भी माना जाने लगा है कि युवा पीढ़ी अपने आपको लेकर बहुत जागरूक है. इसी सोच के चलते आज की युवा पीढ़ी को एक तरह की अतिरिक्त छूट सी घर-परिवार से मिलने लगी है और इस छूट, स्वतंत्रता का दुष्परिणाम भी दिखने लगा है. आज की युवा पीढ़ी के पास अपने बारे में, अपने दोस्तों के बारे में, अपने कैरियर के बारे में, अपने सोशल मीडिया के बारे में, अपनी मौज-मस्ती के बारे में जानने-समझने का समय है किन्तु अपनी जीवन-शैली के लिए, अपने जीवन के लिए, अपने परिवार के लिए, अपने माता-पिता के लिए, अपने अधिकारों के लिए, अपने कर्तव्यों के लिए जानने-समझने का समय नहीं है.
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कैरियर के प्रति सजग ये पीढ़ी भले ही शारीरिक सौष्ठव के प्रति भी जागरूक दिखती हो किन्तु मानसिक स्तर पर बहुत ही कमजोर है. जरा-जरा सी बात पर इनका दिल टूट जाता है, इनमें हताशा भर जाती है, जिंदगी से मन भर जाता है. कभी ये पीढ़ी अपने विपरीत-लिंगी मित्र की तरफ से मिलती उपेक्षा से हताशा में आ जाती है, कभी इस पीढ़ी को मनमाफिक नौकरी न मिल पाने से निराशा होती है, कभी ये पीढ़ी तेज रफ़्तार बाइक/कार न मिलने से उदास होती है, कभी अकारण ही परेशान घूमती है. श्रम, कठोर परिश्रम, सार्थकता, सकारात्मकता से परे इस पीढ़ी के युवा-युवतियाँ अपनी हताशा-निराशा से निकलने के लिए नशे की ओर मुड़ जाते हैं. जो पीढ़ी सजग-सचेत-जागरूक-सक्रिय मानी जाती है उसी के साथ इस तरह के कुछ काले धब्बे भी लगे हुए हैं. इस बात को जानते-समझते हुए कि नशा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, ये युवा पीढ़ी कभी मौज-मस्ती में तो कभी हताशा-निराशा में नशे का शिकार हो जाते हैं. इन दोनों ही स्थितियों में उन्हें अपने माता-पिता की बातें, अपने परिवार का साथ अपनी स्वतंत्रता में बाधक महसूस होता है. दिल में मौज-मस्ती का भाव लिए हो या फिर हताशा-निराशा का, ये पीढ़ी खुद को सबसे अलग, सबसे विलक्षण मानकर अतिरंजित व्यवहार करने लग जाती है. यही स्थिति युवा पीढ़ी के लिए घातक सिद्ध होती है और जो बहुसंख्यक युवाओं को जाने-अनजाने मौत की तरफ ले जाती है.
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कभी तेज़ रफ़्तार बाइक/कार के कारण असमय मौत का शिकार बनती युवा पीढ़ी, कभी न जाने किस बात से हताश-निराश होकर, माता-पिता, परिवार आदि की बात से नाराज होकर आत्महत्या जैसा कदम उठती युवा पीढ़ी न अपना मोल समझ रही है और न ही अपने साथ वालों का. जिंदगी को खिलंदड़पन से जीना एक कला है किन्तु आज की युवा पीढ़ी जिंदगी को रोमांच की तरह से जीना चाहती है जहाँ किसी का भी, किसी प्रकार का भी बंधन उसे स्वीकार नहीं है. इसी सोच के चलते कभी रफ़्तार के कारण, कभी स्वतंत्रता में बाधक समझ आने वाले अभिभावकों के कारण ये पीढ़ी मौत की राह चल देती है. युवाओं की इस मानसिकता का मनोवैज्ञानिक रूप से इलाज किये जाने की आवश्यकता है. आज देश में एक तरफ यौन-शिक्षा दिए जाने पर बहस चल रही है किन्तु शिक्षा अवधि के दौरान किसी भी रूप में मनोवैज्ञानिक सहायता दिए जाने की चर्चा कहीं से भी नहीं उठती है. ऐसा भले ही प्राथमिक स्तर की, माध्यमिक स्तर की शिक्षा के दौरान भले ही इसकी इतनी आवश्यकता महसूस न हो किन्तु इसके बाद की शिक्षा में अनिवार्य रूप से सभी युवाओं को-किशोरों को मनोवैज्ञानिक मदद दी जानी चाहिए. उनकी समस्याओं को, उनकी मनोदशा को सुना-समझा जाना चाहिए और उसका समाधान किया जाना चाहिए. इस पर विचार किये जाने की जरूरत है क्योंकि वर्तमान में जिस तेजी से युवाओं में आत्महत्या की, नशे की प्रवृत्ति पनप रही है उसके भविष्य में और भयावह होने की आशंका है. 
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1 comment:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, हिन्दी पत्रकारिता के आधार - प्रभास जोशी - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !