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07 July 2012

इस मानवीयता ने दिल को छू लिया

आज की आधुनिकता से परिपूर्ण जीवनशैली में यदि कोई छोटी से छोटी घटना इस तरह की दिख जाती है जिसमें संवेदना, मानवीयता का एहसास होता है तो मन प्रसन्न हो जाता है। इस तरह की घटनाओं को देखकर लगता है कि अभी भी संसार से पूरी तरह से भलाई का अंत नहीं हुआ है। इस तरह की दिल को छू लेने वाली घटना से हमें रू-ब-रू होने का अवसर उस समय मिला जबकि हम अपनी एक पारिवारिक यात्रा के दौरान अपनी भांजी के घर से वापस लौटते हुए बरेली रेलवे स्टेशन पहुँचे। बरेली रेलवे स्टेशन के बाहर आम रेलवे स्टेशनों जैसा ही माहौल दिखाई दे रहा था। कुछ टैम्पो वाले, कुछ बेचने वाले, कुछ गाड़ियों वाले, कुछ अपने रिश्तेदारों को छोड़ने वाले, कुछ अपने अपनों को ले जाने वाले। इन्हीं सबके बीच कुछ लोग ऐसे भी थे जो भीख माँगने का काम भी कर रहे थे।

अपनी आदत के अनुसार नई जगह को देखना-परखना शुरू किया और रेलवे स्टेशन के लिए भी चलते जा रहे थे। चूँकि ट्रेन के आने में अभी पर्याप्त समय था इस कारण से आसपास के वातावरण को, लोगों को पढ़ने का प्रयास भी करने लगे। इस दौरान एक बुढ़िया को भी वहाँ लोगों से कुछ न कुछ माँगते देखा। किसी के उसको कुछ दिया तो किसी ने उसे वापस लौटा दिया। किसी के सामने वाह कुछ पल को रुकती तो किसी के सामने पहुँचने का साहस भी नहीं जुटा पाती। उसको इस देने और न देने के बीच एक व्यक्ति ने आकर उसे एक आम दिया, जिसे उस बुढ़िया ने अपने हाथों में लटके एक स्टील के बर्तन में डाल दिया। इस घटना को देखते-देखते हम प्लेटफॉर्म की ओर भी बढ़ गये।

प्लेटफॉर्म पर पहुँचकर बाहर की घटनाओं से इतर अंदर की घटनाओं का आकलन करने में जुट गये। किसी का आना, किसी का जाना, किसी का चिल्लाना, किसी का खामोशी से टहलना, ट्रेनों का आना-जाना...कुल मिलाकर प्लेटफॉर्म का माहौल पूरी तरह से चलायमान और जीवंत सा दिखा। चूँकि हमारा बरेली पहली बार जाना हुआ था इस कारण से रेलवे स्टेशन की व्यवस्था और वहाँ आने-जाने वाली टेªनों के बारे में भी जानकारी ले रहे थे। इस बीच वहाँ भी एक-दो महिलाओं को, बच्चों को भीख माँगते देखा। उनमें से एक महिला के दोनों पैर पूरी तरह से खराब थे और वो हाथों के सहारे अपने पूरे शरीर का जमीन पर घिसटाती हुई आगे बढ़ रही थी। उसकी हालत देखकर बरबस उस पर ध्यान लग गया और इस बात पर भी ध्यान जाने लगा कि लोग उसे कुछ दे रहे हैं अथवा नहीं।

उस लाचार महिला को लगभग पाँच-सात मिनट हो गये होंगे घिसट-घिसट कर लोगों से कुछ न कुछ माँगते। कईयों ने उसे कुछ न कुछ दिया और कईयों ने तो उसकी हालत पर ध्यान ही नहीं दिया। हम अपने दामाद (भाँजी के पति) से उसकी हालत और सरकार के प्रयासों के बारे में चर्चा करने लगे। इस बीच कुछ पलों के अंतराल के बाद उसकी तरफ देखा तो उससे कुछ दूरी पर वही बुढ़िया खड़ी थी जो बाहर भीख माँग रही थी। जमीन पर घिसटती महिला ने उसकी ओर कोई ध्यान न देकर अपना काम जारी रखा और वह बुढ़िया भी आराम से दीवार की टेक लगाकर खड़ी हो गई। इसके बाद उस बुढ़िया ने अपने स्टील के बर्तन से आम निकाला और अपनी धोती से पोंछने लगी।

उस बुढ़िया का आम पोछना जमीन पर घिसटती हुई औरत अपना भीख माँगना रोककर देखने लगी। लगभग आधा-एक मिनट तक वह महिला टुकुर-टुकुर उस बुढ़िया को देखती रही। इस बीच उस बुढ़िया ने उस महिला की ओर देखा और अपना आम पोछना रोककर उसे देखने लगी। हमें लगा कि अब कुछ चिल्लम-चिल्ला मचने वाली है इन दोनों औरतों के बीच किन्तु हमारे सोचने जैसा कुछ भी नहीं हुआ। जो हुआ उसने मन को वाकई छू लिया। उस बुढ़िया ने एक-दो कदम बढ़ाये और जमीन पर पड़ी उस महिला को आम दिखा करके कुछ कहा। उन दोनों से पर्याप्त दूरी और शोर होने के कारण सुनाई तो नहीं दिया कि क्या कहा गया। उस महिला ने भी कुछ कहा और इसके बाद उस बुढ़िया ने अपना वह आम उस महिला को देकर उसके सिर पर हाथ फिराया।

जमीन पर पड़ी उस महिला ने आम लेकर तुरन्त ही इस तरह से खाना शुरू कर दिया जैसे बहुत दिनों की भूखी हो और वह बुढ़िया बगल में बने मुख्य द्वार से बाहर को निकल गई। उस बुढ़िया की सहृदयता और संवेदनशीलता को देखकर एकबारगी हम हतप्रभ रह गये। सोचा कि उस बुढ़िया को जोर की आवाज लगाकर उसे खाने को कुछ दे दें किन्तु वह हमारी आवाज से भी तेज कदमों से चलकर बाहर को निकल गई।


चित्र साभार गूगल छवियों से

5 comments:

Arvind Mishra said...

यही है मानवता की मूल भावना

smt. Ajit Gupta said...

वे एक-दूसरे का दर्द समझते हैं।

संजय कुमार चौरसिया said...

बहुत सुन्दर.यही है मानवता

अजय कुमार झा said...

रविवारीय महाबुलेटिन में 101 पोस्ट लिंक्स को सहेज़ कर यात्रा पर निकल चुकी है , एक ये पोस्ट आपकी भी है , मकसद सिर्फ़ इतना है कि पाठकों तक आपकी पोस्टों का सूत्र पहुंचाया जाए ,आप देख सकते हैं कि हमारा प्रयास कैसा रहा , और हां अन्य मित्रों की पोस्टों का लिंक्स भी प्रतीक्षा में है आपकी , टिप्पणी को क्लिक करके आप बुलेटिन पर पहुंच सकते हैं । शुक्रिया और शुभकामनाएं

रेखा श्रीवास्तव said...

मानवता की ये मिशाल मैंने भी देखी है? मानवता की भावना रुपये और पैसे की मुहताज नहीं होती. देने के लिए किसी के सर पर हाथ फिरा देने से भी बहुत कुछ झलकता है फिर अपने हिस्से का कुछ दे देना. वाकई तारीफ की बात है.