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21 July 2011

देह व्यापार को कानूनी मान्यता पर राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता




आज समाचार सुना कि अदालत ने देह व्यापार को कानूनी जामा पहनाने के लिए राय माँगी है। सुनकर समझ नहीं आया कि किस प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त की जाये। आधुनिकता के चलते और भूमण्डलीकरण के इस दौर में कई सारे विषय और मुद्दे इस तरह से हमारे समाज में उभर कर सामने आये हैं कि उनके सही-गलत होने का अंदाजा ही नहीं होता है।



चित्र गूगल छवियों से साभार

समूची इक्कीसवीं सदी में उठे विषयों पर निगाह डालें अथवा हाल के वर्षों में देश में उठे विषयों को देखें तो आसानी से पता चलता है कि बहुत से मुद्दे ऐतिहासिक रहे हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम रहा हो अथवा जनलोकपाल बिल पर अनशन का मसला; देश की पहली महिला राष्ट्रपति का आना रहा हो अथवा महिला लोकसभाध्यक्ष का चयन; उत्तर प्रदेश में महिला मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड रहा हो अथवा पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का आना; टू जी घोटालों की राशि रही हो अथवा राष्ट्रमण्डल खेलों के घोटाले; लोकतान्त्रिक देश में अनशनकारियों पर लाठीचार्ज का मसला रहा हो अथवा आतंकवादियों की खातिरदारी का सभी में हम ऐतिहासिक रहे हैं।

इतनी ऐतिहासिकता के बीच हमारे देश को, हमारे समाज को समलैंगिकता का कानूनी स्वरूप देखने को भी मिला, लिव इन रिलेशनशिप को भी सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान की गई। ऐसे में आज की खबर ने चैंकाया तो नहीं हाँ, थोड़ा सा परेशान जरूर किया कि हम किस तरफ समाज को ले जा रहे हैं? हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं?

देह व्यापार को समाप्त करने के उपाय खोजना सम्भवतः ज्यादा कठिन कार्य था तो इससे बचने के लिए इसे कानूनी जामा पहनाने की तैयारी कर ली गई है। यह तो ठीक उसी तरह हुआ जैसे कि गरीबी न मिट पाये तो गरीबों को ही मिटा दो। यह सोचा जाना चाहिए कि देह व्यापार को कानूनी मान्यता मिलने के बाद हमारे बड़े शहरों के होटलों में देह व्यापार की स्थिति क्या होगी। आज जबकि इस तरह का कार्य प्रतिबन्धित है तब तो लगभग खुलेआम हर छोटे-बड़े होटल में लड़कियों की सप्लाई देखने को मिलती है, ऐसे में कानूनी रूप का हाल सोचा जा सकता है।

बहरहाल इस विषय पर राष्ट्रव्यापी बहस की आवश्यकता है और कम से कम इस विषय पर अदालत को भी जनता की राय को ध्यान में रखना होगा।

5 comments:

रचना said...

देह व्यापार करने वाली महिला खुद कहती हैं { एक सर्वे में पढ़ा था } की उनके इस कृत्य को व्यापार का दर्जा दिया जाए ताकि वो दोहरे शोषण से बचे . अभी क्युकी ये गैर क़ानूनी हैं इस लिये जब भी वो रेड होती हैं पकड़ी वो जाती हैं , जुरमाना भी उनपर ही होता हैं वो जो उनके साथ मिलता हैं उस को इस व्यापार में पार्टनर इन क्राइम नहीं माना जाता है
जो दलाल होते हैं { स्त्री और पुरुष दोनों } वो सारी कमाई खुद रख कर एक हिस्सा ही सेक्स वर्कर { अब वेश्या और तवायफ नहीं कहलाती हैं सेक्स वर्कर कहलाती हैं } को बहुत कम देते हैं .

आप कहते हैं इसको बंद क्यूँ नहीं किया जाता
ज़रा तरीका बता दे ??
आप कहते हैं लडकिया पैसे के लिये ये सब करती हैं
ज़रा बता दे लड़कियों को ये समझ किसने दी की वो अपने शरीर को बेच कर पैसा कमा सकती हैं
आप कहते २१ वी सदी की समस्या हैं
समस्या तो सदियों पुरानी हैं पहले भी ये थी कभी देव दासी कहलाती थी , कभी कीप इमानदारी से कहे थी या नहीं तब भी किसी की सरपरस्ती में ये रह कर अपना काम करती थी
अब वो सरपरस्ती वो सरकार से चाहती हैं ताकि उनके शरीर की कमाई से दूसरा ना खा सके

राष्ट्र व्यापी बहस इस पर होने से बेहतर हैं की आप लडकिया और लडके समान हैं इस पर करे और जो जो प्रतिबन्ध आप लड़कियों पर लगते हैं लडको पर लगा दे अगर पुरुष रेड लाईट एरिया में जाना ही छोड़ दे तो ग्राहक नहीं होगे , ग्राहक नहीं होगे तो धंधा ही नहीं होगा
आप लोग समानता की बात पर बिदक जाते हैं और लड़कियों पर टोका टोकी करते जाते हैं उनके कपडे और उनके रहन सहन पर ऊँगली उठती हैं पर लडको को खुले सांडो की तरह घुमते देख कर आप सब मर्दानगी का नाम देते हैं

योगेन्द्र पाल said...

इस मामले में बहस की कोई बात ही नहीं है, देह व्यापार को यदि ख़त्म नहीं कर सकते तो उसको कानूनी मान्यता दे दो, कम से कम महिलाओं का शोषण तो रुकेगा

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

रचना जी,
आपका कहना कितना सही है, कितना गलत ये हम निर्धारण नहीं कर सकते हैं बस इतनी बात कहेंगे कि आपने जो कहा है उसी को सख्ती से लागू किया जाए (खुद उन महिलाओं द्वारा भी सहयोग किया जाए जो कहतीं है कि इसे व्यापार बना दें) कि इस तरह के पुरुषों को जो ऐसी महिलाओं के पास जाते हैं, पकड़ कर जेल में डाल दिया जाए, जुरमाना लगाया जाये, सजा दी जाए....
बाकी इस पर सभी पुरुषों को एक तराजू में तुलना सही नहीं है.
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

रचना said...

कुमारेद्र जी
मुद्दे को घुमाना कोई आप लोगो से सीखे
मैने कब पुरुषो की बात की ??
मैने मात्र इतना कहा की समाज पुरुष के कृत्य को मर्दानगी का नाम देता हैं और स्त्री को घर में बंद रखना चाहता हैं जो अब संभव नहीं हैं
गंभीरता से बहस करिये की कैसे स्त्री पुरुष समानता लाई जाए और जो स्त्री के गलत हैं उसको पुरुष के लिये भी गलत माना जाये
इस बहस से इतना उरेज क्यूँ होता हैं


मैने तो इस ब्लॉग समाज में आज तक एक भी सलाह पुरुषो को अपना व्यवहार उचित और सही रखने के लिये नहीं पढी
एक तरफ़ा रव्या हैं की महिला की गलती खोजो , उसको सलाह दो , उसको सुधारो , उसका ही शोषण करो और जो महिला इस के खिलाफ लिखे उसके प्रति अपशब्द लिखो

आप की नज़र में एक भी ऐसी पोस्ट आयी हो जहा पुरुष को सही व्यवहार करने की तालीम दी गयी हो मुझे उपलब्ध करा दे

बी एस पाबला said...

जब ईश्वर ने ही समान ना बनाया दो कृतियों को, तो केवल मानने भर से क्या हो जाएगा?

जिस दिन देह व्यापार कानूनी हुआ फिर कुछ स्वर उभरेंगे कि यह पुरूष प्रधान व्यवस्था की चाल है नारी को … खिलौना बनाने की, स्वय को तुष्ट करने की

शोषण के खिलाफ़ आवाज़ उठाते तो ना जाने कितनी (मज़दूर) क्रांतियाँ हो गई सब वैसे ही बदस्तूर जारी है