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27 December 2010

सुविधा शुल्क की विशेषता हमारे द्वारा पैदा की गई सर्वोत्तम व्यवस्था है


वर्ष 2010 भी बहुत तेजी के साथ प्रस्थान करने के मूड में दिख रहा है। इधर हम तैयारी कर रहे हैं वर्ष 2011 की। समय किस तेजी से निकल जा रहा है कि पता ही नहीं चल रहा है। लगता है कि जैसे अभी कल ही नई सदी का स्वागत किया था और आज पता चला कि नई सदी को भी एक दशक पुराना बना दिया।

नववर्ष के स्वागत की जैसे ही तैयारी होने लगती है वैसे ही हम पूरे साल के किये कराये पर नजर दौड़ाने लगते हैं। हम देखने लगते हैं कि हमने क्या खोया और क्या पाया? इस हिसाब किताब में हम दूसरों की गलतियों को देखने लगते हैं, दूसरे के दोषों का बखान कर उसके व्यक्तित्व को छोटा बना डालने को प्रयास करते हैं किन्तु स्वयं अपने आपको भुला देते हैं।

इस बार भी यही सब होगा, हम लोग ब्लॉग के माध्यम से करेंगे, लेखों के माध्यम से करेंगे, मीडिया अपनी रिपोर्टों के माध्यम से करेगा, राजनेता दल अपनी जुबान के द्वारा करेंगे, उच्च वर्ग अपनी पार्टियों के द्वारा ऐसा करेगा.....कुल मिलाकर सभी लोग इसी गुणा-भाग में लगे रहेंगे।


चित्र गूगल छवियों से साभार

हाँ, ये बात और है कि इस गुणा-भाग के बीच हम अपनी कारस्तानियाँ भूल जायेंगे। हम दोषारोपण करेंगे राजा के लाखों करोड़ घोटाले पर, हम खिंचाई करेंगे कॉमनवेल्थ गेम्स की, हम पोस्टमार्टम करेंगे कलमाड़ी का, ललित मोदी का, हमें आदर्श सोसायटी घोटाले में सरकार का, सेना का दोष दिखेगा, हमें कांग्रेस भ्रष्ट दिखेगी तो कहीं भाजपा का दामन काला दिखेगा, हमें कहीं बसपा के हाथी से नफरत होगी तो कहीं हम सपा की साइकिल को पंचर करने की फिराक में रहेंगे, कहीं लालू की बुझी लालटेन को ध्वस्त करने का विचार बनायेंगे तो कहीं ममता के तृणमूल को ही उखाड़ने की जुगाड़ में रहेंगे।

इन नामी-गिरामी और अरबों-खरबों के घोटालों के बीच हम यह भूल जाते हैं कि कैसे हम भी राशन की लम्बी लाइन से बचने के लिए बस पचास-सौ रुपये के नोट से काम चला लेते हैं। हमें याद भी नहीं रहता कि कैसे हम रसोई गैस के सिलेण्डर के लिए ब्लैक को अपने हित में साधते हैं। हमें अनुमान भी नहीं रहता कि कब रात के अँधियारे में परिचित लाइनमैन की मदद से हम भी बिजली चोर बन जाते हैं। कार्यालय में रुके हुए काम हम भी कुछ छोटी-बड़ी पत्तियों के द्वारा, चाय-पानी के द्वारा, रात की मुर्गा-दारू की पार्टियों के द्वारा बड़ी कुशलता से पूरे करवा लेते हैं।

इन सबके बाद भी हम गालियाँ औरों को देते हैं और ठसके से जवाब देते हैं कि देश में ऐसा क्या विशेष हुआ कि हम नववर्ष का उल्लास मनायें, नववर्ष का उत्साह दिखायें। दरअसल अपने अँधियारे में हमें ही अपने देश की विशेषताएँ नहीं दिखती हैं। हम उसी देश के इंसान हैं जिसको सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता देने की वकालत लगभग सभी विकसित राष्ट्र कर रहे हैं। हम उसी देश के नागरिक हैं जिसके आयोजन के पूर्व यहीं की मीडिया ने पूरी छीछालेदर की और यहीं के कार्यकर्ताओं ने उस कॉमनवेल्थ आयोजन को विश्वस्तरीय बना दिया। हमारे देश में वे तमाम सारे खिलाड़ी हैं जो क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में देश को शीर्ष स्तर पर ले गये हैं। हम आज भी उसी देश के नागरिक हैं जो प्रक्षेपण के मामले में विश्व की मानी हुई हस्ती है। हमारा देश वो देश है कि इसी बीतते वर्ष 2010 में चार शक्तिसम्पन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने हमसे मिलने की कोशिश की।

उपलब्धियों को याद करने की हमारी आदत अब रही नहीं। हमने समाज में, संगठन में, व्यवस्था में, अपने आपमें, अपने परिवार में ही खोट निकालना शुरू कर दिया है। इसका कारण समाज में फैल रही अव्यवस्था नहीं वरन् स्वयं हमारे भीतर फैलता अंधकार है। हमें ही अपने उठाये कदम पर विश्वास नहीं कि वह सही जगह पर पड़ेगा और दोष हम धरती को देने लगते हैं।

सोचना होगा कि भ्रष्टाचार का माहौल स्वयं बना या फिर हमने उसे बनाने में मदद की? घूसखोरी की शुरुआत क्लर्क ने की या फिर काम करवाने की जल्दवाजी में हमने उसे घूसखोर बनाया? सौ-पचास से शुरू हुआ यह खेल यदि आज करोड़ों-अरबों में दिख रहा है तो हमें परेशानी क्यों? हमारी बिजली तो कटिया डाल कर जल ही रही है। हमें गैस सिलेण्डर तो ब्लैक में मिल ही जा रहा है। हमारे बच्चे को डोनेशन से एडमीशन मिल ही जायेगा। रिश्वत से नौकरी की जुगाड़ भी होने लगी है। रेलयात्रा में कुछ सौ रुपये में हम साधारण टिकट के बाद भी वातानुकूलित में सफर कर ही लेते हैं।

यदि ऐसा सब है तो भ्रष्टाचार कहाँ है? यह तो सुविधा शुल्क है जो सभी किसी न किसी रूप में अपनी सामर्थ्य भर देते ही हैं। कोई सौ-पचास में देता-लेता है तो कोई लाखों-करोड़ों-अरखों में देता-लेता है। तो आइये चिन्ता करें और विदा करें 2010 को और स्वागत करें 2011 का तथा आशा करें कि जो काम अभी सुविधा शुल्क के बाद भी नहीं हो पा रहे हैं वे भी इस वर्ष में सम्पन्न होने लगें। खुशहाल देश के लिए, खुशहाल नागरिकों के लिए यह व्यवस्था उत्तम व्यवस्था तो है ही!