04 July 2010

मसला स्वतंत्रता का, कोशिश अंग दिखाने की और विवाद समानता का




पिछले दिनों अपनी पोस्ट ब्रा बर्निंग, टॉपलेस इन स्वीमिंग पूल, ब्रा की माँग...... पर सीधे-सीधे टिप्पणी के द्वारा तो लोगों के विचार मिले, एक महानुभाव के विचार ई-मेल के द्वारा भी प्राप्त हुए। उनके नाम और ब्लॉग संसार में उनकी उपस्थिति को देखते हुए न तो हम नाम बता रहे हैं और न ही उनका लिंग। (अब यहाँ विवाद हो जाये कि महिलाओं के संदर्भ में भी इस पुरुषवादी शब्द की क्या जरूरत)

अपनी पोस्ट की मेल द्वारा टिप्पणी पर चर्चा बाद में पहले एक अनुरोध हिन्दी भाषा के शब्दों का निर्माण करने में लगे विद्वानों से कि अब कुछ शब्द इस तरह के बनाये जायें जो महिलाओं की पहचान का निर्धारण स्वतन्त्र रूप में करते हों। अब लिंग शब्द को भी महिलाओं की पहचान के लिए कैसे जोड़ा जाये और क्यों?

मेल पर जो टिप्पणी आई उसके अनुसार ब्रा, शरीर के उस भाग को ढकने का वस्त्र है जो महिलाओं का अपना अंग है। स्वयं महिलाओं को अधिकार है कि वे किस अंग को दिखाना चाहतीं हैं और किस अंग को नहीं। ब्रा को अश्लील माना जाये और यदि टॉपलेस की आजादी एक देश में मिल सकती है तो हमारे देश में क्यों नहीं? क्यों हमारे देश में महिलाओं को कपड़ों की कैद में रहना होता है? साड़ी की घेराबंदी में रहना पड़ता है? कपड़ों की, ब्रा की, साड़ी की कैद पुरुषों की देन है, इससे छुटकारा पाना महिलाओं का अगला मुक्ति संघर्ष होना चाहिए।


(चित्र गूगल छवियों से साभार)


इसके अलावा भी और कुछ भी था जिसका सीधा सा सार यही निकलता था कि महिलाओं के अंग विशेष को लेकर हमेशा पुरुषवादी प्रतिक्रिया क्यों होती है?

पोस्ट को ज्यादा बड़ा नहीं करना है, बस एक सवाल मन में उठा वही आज की पोस्ट का सार है। किसी भी इंसान के शरीर में चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष अंगों के मामले में समान है। कुछ अंगों की बनावट में कुछ अंतर है, बस यदि इसे छोड़ दिया जाये तो। दोनों के बाल, दोनों के आँखें, नाक, गाल, माथा, कान, पेट, पीठ, हाथ, पैर, बाकी के अंगों में भी समानता है बस अंतर को नजरअंदाज कर दिया जाये।

अंगों के मामले में एकसमानता तो उसके उपयोग में अंतर क्यों? महिलाओं का यह तर्क और हमारा सवाल कि महिलाएँ आवश्यकता होने पर, थकान के समय में अपने हाथ, पैर, माथा, पीठ आदि किसी से भी दबाने के लिए कह लेतीं हैं, चाहे दबाने वाला स्त्री हो अथवा पुरुष; छोटा हो अथवा बड़ा। क्या अंगों के निर्धारण में शेष अंगों (जिन्हें गोपनीय श्रेणी में रखा जाता है) के मामले में भी ऐसा करवाया जा सकता है?

इस सवाल को अन्यथा की श्रेणी में न रखा जाये क्योंकि महिलावादी समर्थकों की ओर से सकारात्मकता को दरकिनार करके केवल कुतर्कों के सहारे महिला मुक्ति और तरक्की का सपना दिखाया जा रहा है। नकारात्मक संघर्ष अपासी विवाद को ही पैदा करता है न कि समाज में समरसता पैदा करता है। आज आवश्यकता समाज में समरसता पैदा करना होना चाहिए; आपसी समन्वय बढ़ाने की ओर बल देना चाहिए न कि किसी कुतर्क के सहारे विवाद को, वैमनष्यता को बढ़ाना।

एक सफाई साड़ी पहनने को लेकर, जिसको लेकर महिलाएँ (कु)तर्क देतीं हैं कि यह पुरुषों की साजिश है जिससे महिलाओं के अधिक से अधिक शरीर को पुरुष देख सकें, क्या देश की महामहिम राष्ट्रपति जी, देश की सत्ता पक्ष की पार्टी की अध्यक्ष, लोकसभा अध्यक्ष के ऊपर भी पुरुषों का दवाब है जो वे हमेशा साड़ी में ही दिखाई देतीं हैं?


10 comments:

AlbelaKhatri.com said...

uttam aalekh

अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

लगता है ये मेल भेजने वाले महानुभाव कोई महिला ही है. तुम तो सही लिख रहे हो पर लगता है कि हमेशा की तरह महिलाओं के विवाद का शिकार हो गए हो. अंगों का खेल और नंगों का खेल (नंगों और अंगों में अंतर देखो) यही खेल सब खेल करा रहा है.
लिखे रहो, जमे रहो, आशीष है अच्छा लिखो, स्वस्थ लिखो.

अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

लगता है ये मेल भेजने वाले महानुभाव कोई महिला ही है. तुम तो सही लिख रहे हो पर लगता है कि हमेशा की तरह महिलाओं के विवाद का शिकार हो गए हो. अंगों का खेल और नंगों का खेल (नंगों और अंगों में अंतर देखो) यही खेल सब खेल करा रहा है.
लिखे रहो, जमे रहो, आशीष है अच्छा लिखो, स्वस्थ लिखो.

Anonymous said...

kya kya dikhana hai, kya kya chhipana hai.
sab dikhana hai, sab hi dikhana hai.

Anonymous said...

kya kya dikhana hai, kya kya chhipana hai.
sab dikhana hai, sab hi dikhana hai.

Anonymous said...

Kumarendra, ekdam sahi likha hai, par kya kiya jaaye sabka apna apna najariya hai.

sudheer kumar.
(abhi blog nahin banay hai is kaaran pataa nahi ki kaise tippani karte hain.)

Anonymous said...

Kumarendra, ekdam sahi likha hai, par kya kiya jaaye sabka apna apna najariya hai.

sudheer kumar.
(abhi blog nahin banay hai is kaaran pataa nahi ki kaise tippani karte hain.)

timeforchange said...

are bhartiya puruson kab se fark padne laga mahilaon ke pahnave par bhai sahab , vo to sadi pahni lachar nariyon ka sabse jayada rape karte hain , maine to nahi dekha ki koi ladki kam kapde pahne tabhi ladke uspe comment karte hain , salwar kameej ko pahnane vali ladkiyon se poochiye . hum mard to mard hi rahenge , kyon bhai sahab .

शिवम् मिश्रा said...

आपसे सहमत हूँ !

Dr.Aditya Kumar said...

Good post.A mature debate is must on this topic.