17 April 2010

हम नित बढ़ रहे हैं असामाजिकता की तरफ




काम की अधिकता और समय की कमी का रोना आज लगभग सभी के साथ होता जा रहा है। कई बार विचार आता है कि जब हम बहुत कुछ नहीं करते तब हमारी व्यस्तता की ये हालत है और यदि कहीं कुछ अधिक सा करने लगे होते तो????

अकसर लोगों को कहते सुना है कि फलां काम के लिए समय नहीं मिला, फलां के घर कार्यक्रम में जाने की फुर्सत नहीं, फलां से मिले महीनों बीत गये वगैरह-वगैरह। वाकई हम लोग इतने व्यस्त हैं अथवा व्यस्तता का ढोंग करने लगे हैं? सामाजिकता को कहीं बहुत पीछे छोड़ कर असामाजिक हो गये हैं।


(चित्र गूगल छवियों से साभार)

शब्द खटका होगा ‘असामाजिक’ क्योंकि अभी तक इस शब्द की परिभाषा में वे लोग आते थे जो चोरी-चकारी कर रहे हों, गुंडागर्दी करने वाले हों, हाथों में हथियार लिये खूनी मंजर पैदा कर रहे हों आदि-आदि। ये लोग तो असामाजिक हैं हीं, कहीं न कहीं हम भी इसी श्रेणी में आते जा रहे हैं। हाँ, ये बात और है कि हमने किसी तरह का उत्पात नहीं किया, किसी को मौत के मुँह में नहीं धकेला, अपने हाथों में हथियार नहीं थामे। इसके बाद भी हम अपने आपको चूँकि जब सामाजिक नहीं बना सके तो फिर असामाजिक तो बना ही बैठे।

वैसे इस शब्द के चक्कर में न फँस कर अपने क्रियाकलापों पर नजर दौड़ायें तो पता चलता है कि हमने किसी न किसी का दिल तो दुखाया ही है, किसी न किसी को मौत की ओर धकेला ही है, किसी न किसी तरह के हथियारों को लेकर चलना शुरू किया भी है।

अपने आपमें सिमट कर हमने स्वार्थसिद्धि को बढ़ावा दिया है इससे किसी न किसी को तो चोट पहुँचाई ही है। इसी तरह हमने किसी न किसी को संकट में घिरा देखकर भी उसकी ओर मदद को हाथ नहीं बढ़ाया है तो उसे मौत की ओर तो धकेला ही है। रोज की तरह अपने मन में स्वार्थ की कामना करते हुए जिन्दगी का सफर तय करना चाहा है जो किसी हथियार से कम घातक नहीं।

सच यही है कि हमने बहुत कुछ किया है पर हमें इसकी भनक नहीं कि कैसे हमने स्वयं को असामाजिक बना लिया है। जरूरी नहीं कि जब हम समाज की अवधारणा में चल रहे असामाजिक कार्यों में स्वयं को लिप्त करें तभी असामाजिक कहलायेंगे, बल्कि यदि हम समाज में किसी के साथ सामंजस्य भी नहीं बिठा पा रहे हैं तो यह भी किसी असामाजिकता से कम नहीं।

स्वार्थ से ऊपर उठकर हमें अपने आपको समाज के दायरे में लाकर लोगों के साथ मेलजोल और आपसी सामंजस्य की ओर भी कदम बढ़ाने होंगे अन्यथा की स्थिति में हम नितान्त अकेलेपन की ओर बढ़ते जा रहे हैं। इसी अकेलेपन की शिकायत आज बुजुर्ग ही नहीं वरन हमारे समाज का युवा वर्ग भी कर रहा है। समाज में बढ़ रही इस नई समस्या की ओर भी ध्यान देना होगा।





(एक पारिवारिक कार्यक्रम में व्यस्त होने के कारण 10 तारीख के बाद आज आना हुआइसी कारण से आप सभी कि पोस्ट पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दे सके.)

3 comments:

honesty project democracy said...

SAMAY KA ABHAW TO BAHANA HAI ,DARASAL HUM ME DESH AUR SAMAJ KE PRTI APNI JIMMEWARI KO NIBHANE KI BHAWNA KHTM HO CHUKI HAI AUR NAKLI MILAWTI KHADY PADARTHON NE HAMARE SHRIR AUR DIMAG KO BHI SAHI SOCHNE LAYAK NAHI CHHORA HAI.AIESI STHITI KO BALDNE KE LIYE POORE DESH KO EKJUT KARIYE .LOGIN KAREN-http://www.hprdindia.org

भूतनाथ said...

अभी-अभी कनिष्क कश्यप जी के ब्लॉग से आपका साक्षात्कार पढ़ कर लौटा हूँ.......ब्लॉग पर यदा-कदा ही आता हूँ....और सच ही मुझे बेहतरीन ब्लॉग बहुत कम की संख्या में दिखाई देते हैं....आपका इस विषय पर दिया गया एक-एक जवाब सारगर्भित है....उसमें कही गयी एक-एक बात सर-माथे पर....और मज़ा यह कि इस मुआमले में हम कुछ कर भी नहीं सकते,सिवाय अपनी तरफ से अच्छा और बस अच्छा लिखने के अलावा.....!!
दरअसल बहुत सी बातों के बारे में हम कुछ कर ही तो नहीं पाते....मगर वे बातें चलती ही रहती हैं...चलती ही रहेंगी...गोया कि उन्हें बदलना ही नहीं होता....!!
चाहे हम या हम जैसा कोई कितना ही विलाप क्यूँ ना करता रहे...है ना......शायद दुनिया ऐसी ही है...ऐसी ही हो.....ऐसी ही बनी रहने के लिए हो....!!.....ऐसा बहुत कुछ चलता रहता है...हम मसोस लेते हैं....बेचैन हो जाते हैं.....(करवटें बदलते रहे......!!).....और सब कुछ वैसा-का-वैसा चलता ही रह जाता है...है ना....!!
भाई कुमारेन्द्र......यूँ कहूँ कि फिर भी इस सागर में उतरना होता है...अथाह जीव-जंतुओं और ना जाने किन-किन भयानक स्थितियों का सामना करते हुए उस अनमोल चीज़ को चुन कर लाना होता है...जिसे दुनिया "मोती"कहती है....लाना होता है ना......!

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।