12 January 2010

आर टी आई, माननीय जज और कुछ सवाल

माननीय जज महोदय भी सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे में आयेंगे। इस पर मच गया हड़कम्प। अब कुछ सवाल-


क्या माननीय जज आदमी नहीं, जो उनसे उनके कार्यों के बारे में न पूछा जाये?
क्या सूचना अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत किसी से कुछ भी जानने का तात्पर्य उसके भ्रष्ट होने से लगाया जाता है?
माननीय जज साहब से यदि कुछ भी (संवैधानिक) पूछे जाने पर क्या देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो सकते हैं?
न्यायालयीन प्रक्रिया सीधे-सीधे आम आदमी की संवेदनाओं से जुड़ी होती है, क्या ऐसे में माननीय जज साहबों का सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे में आना असंवैधानिक है?


सवाल बहुत हैं, पर सिर्फ सवाल न रह जायें, इनके जवाब भी मिलें इसका प्रयास रहेगा। आप क्या कहेंगे इन सवालों पर?

क्या सारे अधिनियम, कानून, प्रावधान सिर्फ आम आदमी के लिए ही हैं?


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चित्र साभार गूगल छवियों से

4 comments:

मनोज कुमार said...

मेरे हिसाब से तो आना चाहिए।

डॉ महेश सिन्हा said...

ये आम आदमी कौन है ?

Udan Tashtari said...

उनको भी इस दायरे में लाना तर्क संगत तो लगता है.

Suman said...

nice