24 May 2008

स्त्री विमर्श के पीछे

भूमन्दलीकरण के इस दौर में जब समाज में स्त्री विमर्श की चर्चा की जाती है तो स्त्री विमर्श की वास्तविकता और कल्पना के मध्य बारीक सी रेखा विश्व स्तर पर दिखाई देती है. इसी बारीक अन्तर के मध्य चार घटनाओं को स्त्री विमर्श के साथ रेखांकित किया जाना भी अनिवार्य प्रतीत होता है. सन् १७८९ की फ्रांसीसी क्रांति जिसने समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व के नैसर्गिक अधिकारों को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के रूप मे प्रतिष्ठित किया. सन् १८२९ का राजा राममोहन राय का सती प्रथा विरोधी कानून जिसने स्त्री को मानव के रूप में स्वीकारा. तीसरी यह कि सन् १८४८ में ग्रिम्के बहिनों ने तीन सौ स्त्री पुरुषों की सभा के द्वारा नारी दासता को चुनौती देकर स्त्री विमर्श की आधारशिला रखी और चौथी घटना सन् १८६७ में स्टुअर्ट मिल द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट में स्त्री के वयस्क मताधिकार का प्रस्ताव रखा जिसने स्त्री को भी मिलने वाले कानूनी और संवैधानिक अधिकारों को बल दिया. इन घटनाओं में ध्यान देने योग्य यह है की पूर्व हो या पश्चिम, स्त्री विमर्श की सैधांतिक आधारशिला पुरुषों द्वारा ही तैयार की गई जिस पर आधुनिक स्त्रियों द्वारा स्त्री विमर्श को आन्दोलन बना कर नारी स्वरूप को विकृत करने का प्रयास किया जा रहा है.
स्त्रियों ने अपनी स्थिति को सुद्रण किया, स्वयं को शिक्षा, राजनैतिक अधिकारों, संवैधानिक अधिकारों से परिचित करवाया तो इसी शक्ति का प्रयोग उसने स्वयं को संस्कारों, परिवारों से मुक्त कर देने में किया. यह विडम्बना है कि आज की नारी स्त्री विमर्श की, स्त्री शक्ति की सफलता इस बात पर मानती है की वह एक साथ कितने पुरुषों की शारीरिक शक्ति का परीक्षण कर सकती है. वह सोचती है की पुरूष वेश्यालय कब बनेंगे. आज स्वतंत्र घोषित कर चुकी नारी की चाह अपने परिवार की लडकी का भविष्य बनाने में नहीं वरन यह ध्यान देने में है कि कहीं असुरक्षित यौन संबंधों से वह एड्स का शिकार न हो जाए. वह परिवार में रह कर पिता, पति, पुत्र के रूप में अपना शासक पाकर स्वयं को शोषित समझती है किंतु वह इस बात में संतुष्टि पाती है की वह अविवाहित रह कर प्रत्येक रात कितने अलग अलग पुरुषों का भोग कर सकती है, अपने मांसल शरीर के पीछे नचा सकती है.
शारीरिक – मानसिक और भावनात्मक रूप से स्त्री शक्ति की पहरुआ नारियों ने स्त्री विमर्श को स्त्री स्वतंत्रता को नारी देह के आसपास केंद्रित कर दिया है. पुरूष वर्ग के विरोध में खड़ी नारी शक्ति स्वयं को नारी हांथों में खेलता देख रही है. यदि कुछ वास्तविकताओं को ध्यान में रखा जाए तो महिलाओं को मिलते अधिकार, शिशु प्रजनन अधिनियम, अपनी मर्जी से परिवार को सीमित रखने का अधिकार, तलाकशुदा नारी को बच्चा पाने का कानूनी अधिकार आदि महिलाओं के यौन प्रस्तुतीकरण से सम्भव नहीं हुआ है. गे-कल्चर, स्पर्म बैंक, सरोगेत मदर्स, ह्यूमन क्लोनिंग की संभावनाओं ने स्त्रियों की आजादी को नया आयाम दिया है तो उसे भयाक्रांत भी किया है. टी वी की सेत्युलैद चमक और परदे की रंगीनियाँ स्त्री को आजादी की राह का सपना तो दिखा सकती हैं पर आजादी नहीं दिला सकती है. तभी तो अपने उत्पाद को बेचने के लिए निर्माता वर्ग किसी नग्न महिला को ही चुनता है.कम से कमतर होते जा रहे वस्त्रों ने नारी वर्ग को उत्पाद सिद्ध किया है. स्त्री विमर्श के नाम पर देह को परोसा जा रहा है. पुरूष निर्मित आधार तल पर खड़े होकर, स्वयं को उत्पाद बना कर, देह को आधार बना कर स्त्री विमर्श, नारी मुक्ति की चर्चा करमा भी बेमानी सा लगता है. स्त्री विमर्श की आड़ में नारी को सपना दिखा रही नारी जात को विचार करना होगा की स्त्री अपनी मुक्ति चाहती है तो क्या पुरूष वर्ग के विरोधी के रूप में? यहाँ विचार करना होगा की बाजारवाद के इस दौर में स्वयं को वस्तु सिद्ध करती नारी किस स्वतंत्रता की बात करना चाह रही है?
( साहित्यिक पत्रिका ‘कथा क्रम’ अप्रैल-जून २००८ में प्रकाशित लेख “स्त्री विमर्श के पीछे क्या छिपा है?” का अंश। पूरे लेख के लिए देखें http://www.kathakram.in/)

6 comments:

महिला सशक्तिकरण के नाम लेते ही पुरूष समाज मे एक लहर दौड़ जाती हैं । said...

महिला सशक्तिकरण के नाम लेते ही पुरूष समाज मे एक लहर दौड़ जाती हैं । ऐसा लगता हैं मानो एक संग्राम हैं महिला सशक्तिकरण पुरूष समाज के विरुद्ध । पर ऐसा क्यों लगता है पुरूष समाज को ? क्यों ?
महिला सशक्तिकरण समाज की रुदिवादी सोच से महिला कि मुक्ति का रास्ता हैं । और समाज मे सिर्फ़ पुरूष नहीं होते , समाज केवल व्यक्ति से नहीं संस्कार और सोच से बनता हैं । समाज एक मानसिकता हैं जिस को हम सदियों से झेलते , ढ़ोते , काटते , जीते आ रहे हैं । वह परम्पराये जो न केवल पुरानी हैं अपितु बेकार थोपी हुई हैं उनसे मुक्ति हैं महिला सशक्तिकरण । महिला सशक्तिकरण का सीधा लेना देना पुरूष से नहीं हैं और ये भ्रम पलना किसी पुरूष के लिये भी सही नहीं हैं । इस भ्रम से पुरूष समाज जितनी जल्दी निकलेगा उसके लिये उतना ही अच्छा होगा क्योकि इसी भ्रम के चलते पुरूष को "अपने मालिक " होने का एहसास होता हैं जो गलत हैं । और बार बार महिला सशक्तिकरण को अपने विरुद्ध एक लड़ाई समझना ये दिखता हैं की " मालिक से बगावत , मसल दो " ।भारतीये समाज मे एक बहुत बड़ी विशेषता हैं , यहाँ सब कुछ छुप के करने वालो को सही माना जाता हैं । सालो से पुरूष गन्धर्व विवाह करते रहे और पत्निया न चाहते हुए भी इसको स्वीकारती रही । किसी किसी घर मे तो बच्चे को बड़ी माँ और छोटी माँ का संबोधन करना भी सिखाया जाता रहा । पूजा पाठ घर के लिये पत्नी और घुमाने आने जाने के लिये प्रेमिका कब ऐसा नहीं हुआ ?? अगर किसी पत्नी ने कुछ कहा तो कहा गया हम पैसा कमाते हैं तुम को रहना हैं तो रहो जाना हैं तो जाओ , माँ \बाप ने समझाया तेरे लिये तो कमी नहीं करता फिर तुम मत बोलो ।क्या मोरल कि जिम्मेदारी सिर्फ महिला कि हैं ??स्त्रियों की केरियर सम्बन्धी महत्वकंक्षा को प्रतिस्पर्धा मानना है सब प्रोब्लेम्स कि जड़ हैं । स्त्री करे तो प्रतिस्पर्धा पुरूष करे तो केरियर का दबाव । जब तक ये सोच रहेगी , लड़किया उन सब बेडियों को तोड़ना चाहेगी जो समाज नए उन पर लगाई हैं ?? अगर सिगरेट बुरी हैं तो सामाजिक बुराई हैं बंद करवा दीजिये , दण्डित करिये लड़को को जब वो सिगरेट पी कर घर आए , तब ये मत कहे "बेटा बड़ा हो रहा हैं " । समाज पुरुषो कि व्यसन कि आदत को दंड दे कोई लड़की फिर उस व्यसन को नहीं अपनायेगी । बुराई सिगरेट , शराब मे हैं फिर चाहे महिला ले या पुरूष ।
महिला को सदियों से शोषित किया गया हैं , कभी परमपरा के नाम पर तो कभी समाज के नाम पर , तो कभी व्यवस्था के नाम पर । उनको बार बार चुप कराया जाता हैं । आज कि नारी जब हर जगह अपने काम से नाम कमा रही हैं तो पुरूष समाज मै हलचल हैं । अब उसकी काबलियत पर उंगली नहीं उठा सकते तो चरित्र हनन करना बंद कर दे क्यों कि आज कि माँ अपनी बेटी को जिन्दगी जीने कि शिक्षा दे रही हैं घुटने की नहीं

जरा यूं भी सोचिये ... said...

सवाल कई है और जवाब भी कई ...? पर क्या यह सचमुच इतना आसान है ...परिवार टूटने लगे हैं बिखरने लगे हैं ..? और एक महिला घर पर रहे .क्या आपको लगता है की इस से समस्या सुलझ जायेगी ..."?महिला कभी कोई भी काम करे अपने परिवार को भूल नही पाती है ...पर जो हालत आज कल पैदा हो रहे हैं उस में उसका नौकरी करना भी उतना ही जरुरी है जितना परिवार को वक्त देना .और ना सिर्फ़ वक्त बेवक्त की मुसीबत के लिए उसके अपने लिए भी अपने पेरों पर खड़ा होना सवालंबी होना जरुरी है यही वक्त की मांग है ....पर इस में सबका सहयोग चाहिए ...बढ़ती महंगाई , बदलता समाज हमारे रहने सहने का ढंग सब इतने ऊँचे होते जा रहे हैं कि एक की कमाई से घर नहीं चलता है .. और यह सब सुख सुविधाये अपने साथ साथ बच्चो के लिए भी है ..बात महिला के घर पर रहने की या न रहने की नही है असल में बात है माता पिता दोनों को वक्त देने की अपने बच्चो को अपने बच्चो से निरन्तर बात करने की ..और उन को यह बताने की हम हर पल आपके साथ है ..आप क्या समझते हैं जिन घरों में महिलाए रहती है वहाँ बच्चे नही बिगड़ते हैं ..??आज का माहोल जिम्मेवार है इस के लिए ..अपने आस पास नज़र डालें जरा ..दिन भर चलता टीवी उस पर चलते बेसिरपैर के सीरियल अधनंगे कपड़ो के नाच ,माल संस्कृति ,और लगातार बढ़ती हिंसा .. जिन्हें आज कल बच्चे दिन रात देखते हैं इंटरनेट का बढता दुरूपयोग ...मोबाइल का बच्चे बच्चे के हाथ में होना ..क्या आप रोक पायेंगे या एक माँ घर पर रहेगी तो क्या यह सब रुक जायेगा ..नही ..यह आज के वक्त की मांग है और माता पिता यह सुविधा ख़ुद ही बच्चो को जुटा के देते हैं .ताकि उनका बच्चा किसी से ख़ुद को कम महसूस न करे और यही सब उनके दिमाग में बचपन से बैठता जाता है और तो और उनके कार्टून चेनल तक इस से इस से बच नही पाये हैं ..अब घर पर माँ है तब भी बच्चे टीवी देखेंगे और नही है तब भी देखेंगे ..इन में बढती हिंसा और हमारा इस पर लगातार पड़ता असर इन सब बातो को बढावा दे रहा है ..नेतिकता का पतन उतनी ही तेजी से हो रहा है जितनी तेजी से हम तरक्की की सीढियाँ चढ़ रहे हैं ..हर कोई अब सिर्फ़ अपने बारे में सोचता है...और जब उस राह पर मिलने वाली खुशी में कोई भी रोड अटकाता है तो बस उसको मिटाना है हटाना है अपने रास्ते से यही दिमाग में रहता है ....संस्कार माँ बाप दोनों मिल कर बच्चे को देते हैं ..शिक्षा का मध्याम ज्ञान को बढाता है और यही नए रास्ते भी सुझाता है .. पर जीवन के इस अंधाधुंध बढ़ते कदमों में जरुरत है सही दिशा की सही संस्कारों की ...और सही नेतिक मूल्यों को बताने की ...सिर्फ़ माँ की जिम्मेवारी कह कर पुरूष अपनी जिम्मेवारी से मुक्त नही हो सकता वह भी घर की हर बात के लिए हर माहोल के उतना ही जिम्मेवार है जितना घर की स्त्री ..यदि वह अपना आचरण सही नही रख पाता है तो एक औरत माँ कितना संभाल लेगी बच्चे को आखिर वह सब देखता है अपने जीवन का पहला पाठ वह घर से ही सिखाता है हर अच्छे बुरे की पहचान पहले उसको अपने माँ बाप दोनों के आचरण से होती है वही उसके जीवन के पहले मॉडल रोल होते हैं ...मैं तो यही कहूँगी कि आज के बदलते हालात का मुकाबला माता पिता दोनों को करना है और अपने बच्चो को देने हैं उचित सही संस्कार ..बबूल का पेड़ बो कर आम की आशा करना व्यर्थ है ..और नारी को सिर्फ़ घर पर बिठा कर आप इन बिगड़ते हालात को नही सुधार सकते ..यह हालात हम लोगो के ख़ुद के ही बनाए हुए हैं तो अब इनका मुकाबला भी मिल के ही करना होगा ..नही तो यूं ही अरुशी केस होते रहेंगे और इंसानियत शर्मसार होती रहेगी ...आप इसको जरा यूं भी सोचिये ..

शोभा said...

मुझे हँसी आरही है आपकी सोच पर। वैसे मुझे लगता है कि ऐसा लिखने का उद्देश्य केवल ब्लोग पर हलचल पैदा करना है। तो भाई आप सफल हुए हैं। रही आपकी चर्चा - तो आज़ाद देश में हर इन्सान को अपने विचार रखने का अधिकार है। मैं तो बस इतना ही कहूँगी कि -
जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तन तैसी
आप जैसा चश्मा पहनेंगें आपको वैसा ही दिखेगा। igmwg

anitakumar said...

चाहे ये लेख आप का लिखा न हो पर आप ने अपने ब्लोग पर डाला है तो जाहिर है कि आप इस में व्यक्त विचारों से सहमत है। हैरानी होती है कि आज कल के जमाने में भी कोई ऐसी पिछ्ड़ी हुई सामंतवादी सोच रख सकता है, और आप तो लेक्चरर है, इस देश का, भावी समाज का भविष्य गढ़ते हैं अगर यही सब सिखा रहे हैं तो भगवान भला करे उस नयी जेनेरशेन का जो आप से पढ़ने को शापित है।

purwar99@gmail.com said...

thats quite a positive approach,to b appreciated fully.

purwar99@gmail.com said...

actually,previously i commented ovr d 1st comment dat u had.4 u i mst say dat u need to see d things quite in wider contexts,urs is a vry narrow approach,2 b condemnd thoroly.dr.kumarendra,its a very imp issue 2 b discussd seriously: "ek sagar bhar paseena aasmaan bhar dard hai, es visangati par bahas gambheer honi chahiye".