सरकार द्वारा उच्च
शिक्षण संस्थानों को विभिन्न कार्यक्रम संपन्न करवाए जाने सम्बन्धी प्रस्ताव भेजा जाना
समझ आता है. इन कार्यक्रमों की रिपोर्ट बनाना, उसको जियो-टैगिंग फोटो-वीडियो के साथ सम्बंधित कार्यालय
को भेजना भी समझ आता है. इस समझ आने वाली स्थिति के बीच समझ ना आने वाली स्थिति ये
है कि इन कार्यक्रमों की फोटो, वीडियो को सोशल साइट्स (फेसबुक,
इन्स्टाग्राम, यूट्यूब आदि) पर अपलोड करके उसकी लिंक भी उपलब्ध
करवाना होता है. आखिर ऐसा क्यों? ये सोशल साइट्स न तो आधिकारिक रूप से सरकार के अंग हैं, न ही इनको किसी भी प्राध्यापक, संस्थान द्वारा उपयोग में लाना जाना अनिवार्य
बनाया गया है.
सरकार की इस तरह की
अनावश्यक गतिविधि ही किसी भी संस्थान के तानाशाह प्रवृत्ति की मानसिकता के लिए उत्प्रेरक
का कार्य करती है. यही कारण है कि विश्वविद्यालय स्तर पर, महाविद्यालय स्तर पर, विभागीय स्तर पर व्हाट्सएप ग्रुप की भरमार है. इस तरह
के जी के जंजाल से कभी मुक्ति मिलेगी या फिर ये जंजाल किसी दिन सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था
की जान लेकर ही मानेगा?
देखो मुझे भी ये अजीब लगता है। सरकार अगर रिपोर्ट और जियो-टैग मांगती है तो ठीक है, पर सोशल मीडिया लिंक की जबरदस्ती समझ नहीं आती। हर संस्थान की अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं, और हर शिक्षक को ऑनलाइन एक्टिव रहना पसंद नहीं होता। इससे काम से ज्यादा दिखावा बढ़ता है और अनावश्यक दबाव भी। मुझे लगता है सरकार को क्वालिटी पर फोकस करना चाहिए, ना कि सिर्फ ऑनलाइन प्रेजेंस पर। वरना लोग काम से ज्यादा पोस्टिंग में समय खर्च करेंगे।
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