20 September 2017

बिना सहायता सीखा कार चलाना

दीपावली की बात है, शायद 95-96 की बात होगी, हमारे दूसरे नंबर के चाचाजी उस समय ग्वालियर में थे और अपनी कार से आये थे। उन्होंने कार नई-नई खरीदी थी। वह घर की पहली कार थी। तब तक हमें कार चलाना नहीं आता था। दिमाग में बनाये थे कि जब अपने घर में कार आयेगी तभी चलाना सीखेंगे। हमने चाचा से सिखाने को कहा तो उन्होंने कहा कि ये लो चाभी, खुद सीख लो। समझ नहीं आया कि क्या किया जाये? फिर हिम्मत करके हमने और हमारे छोटे भाई ने कार की चाबी उठाई और घुस लिए कार में। घर लम्बी गली के अंत में होने के कारण कार को मोड़ा नहीं जा पाता। यदि सीधी आये तो सड़क तक लाने के लिए उसे रिवर्स गियर में ले जाना पड़ता है।


कार सीधे अन्दर लाई गई थी, सो उसे रिवर्स गियर में सड़क तक ले जाना था। लगा अभी सीधे-सीधे तो चलानी आती नहीं है बैक कैसे करेंगे? विडम्बना ये कि छोटे भाई को भी कार चलानी नहीं आती थी। इसके बाद भी बैठे ड्राइविंग सीट पर और छोटा भाई बगल में। चाबी लगाई और कार स्टार्ट। लगाया बैक गियर, दबाया एक्सीलेटर पर गाड़ी रफ्तार ही न पकड़े। कार बंद हो गई। लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये, नीचे उतर आये। अबकी छोटा भाई ड्राइविंग सीट पर बैठा। कार स्टार्ट कर गियर लगाया मगर स्थिति ज्यों की त्यों। कार बस थोड़ी सी हिल भर जाए और बंद हो जाये। रफ़्तार ले ही नहीं रही थी, जबकि एक्सीलेटर भी दबाया जा रहा था। तभी मोहल्ले के एक भाईसाहब निकले, हमने आवाज देकर उन्हें बुलाया और अपनी समस्या बताई। भाईसाहब ने एक पल की देरी किये बिना कहा कि देखो हैंडब्रेक तो नहीं लगा हैअब पता तो था नहीं कि ये क्या बला होती है। भाईसाहब ने उस समस्या को दूर किया। अब कार अपनी असल रफ्तार पर आ गई। कार रिवर्स गियर में सौ मीटर से अधिक चलने के बाद सड़क पर आ गई। इस बीच कार बंद जरूर हुई मगर दोनों तरफ बने मकानों से टकराई नहीं। अब कार चलने लगी तो एक और समस्या समझ आई, गियर लगायें तो उसको ही देखने लगें। स्टेयरिंग से, सड़क से ध्यान हटते ही कार अनियंत्रित हो जाती। कार को नियंत्रित करके जब अगला गियर लगायें तो फिर वही स्थिति हो जाये। लगभग दो घंटे तक हम दोनों भाई क्रमिक रूप से कार दौड़ाते रहे। इस कार सीखने में अच्छाई यह रही कि हमने किसी को चोटिल नहीं किया।

अगले दिन हमने सबसे कहा कि चलो, घुमा लाते हैं। किसी को विश्वास नहीं था कि हम लोग कार चलाना सीख गए हैं, सो कोई साथ में चलने को तैयार नहीं। हमारी अईया ने कहा कि कोई चले न चले, हम चलते हैं, चलो। अईया के विश्वास ने धीरे-धीरे सबमें हिम्मत जगाई बस एक-एक करके कई लोग तैयार हो गए नौसिखिये की कार में चलने को। अईया, अम्मा, चाची को कार में बिठा कर पास के राधा-कृष्ण मंदिर ले गये। भीड़ में कार सीखने और फिर परिवार के सदस्यों को घुमाने ने ड्राइविंग को लेकर गजब का आत्मविश्वास पैदा किया जो आज तक बना हुआ है।


इसके साथ ही चाचा जी की एक बात आज भी याद है जो उन्होंने हम लोगों के लौटने के बाद कही थी कि यदि तुममे कार चलाना सीखने की हिम्मत होगी तो बिना किसी सहारे के सीख लोगे, और यदि हिम्मत नहीं होगी तो हम क्या कोई भी तुमको सिखा नहीं सकेगा। आज लगता है कि यह बात हर एक काम में लागू होती है। 

2 comments:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व अल्जाइमर दिवस : एल्जाइमर्स डिमेंशिया और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

RAKESH KUMAR SRIVASTAVA 'RAHI' said...

अच्छी बात है कि हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा, फिर भी आलेख पढ़ने वालों के लिए एक सलाह है कि कार चलाने की बेसिक जानकारी के बगैर कार ना चलाए और पूरी तरह कार चलाने पर नियंत्रण आ जाए तभी सड़कों पर चलाए। परिवहन नियमों का उलंघन ना करें। कैसे भी सीखे परन्तु परिवहन नियमों का पालन अवश्य करें।