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19 January 2017

राजनैतिक सुधार के लिए उतरो मैदान में

चुनाव आते ही सम्बंधित प्रदेश के लोग, लगभग सभी लोग अपनी-अपनी तरह से सक्रिय हो जाते हैं. राजनीतिज्ञ अपने स्तर पर सक्रियता दिखाने लगते हैं तो उनके समर्थक अपनी तरह की सक्रियता में संलिप्त हो जाते हैं. इसके साथ ही निर्वाचन आयोग, जिला प्रशासन भी सक्रियता से अपने दायित्वों का निर्वहन करने में जुट जाते हैं. चुनावों में इन दो पक्षों की प्रत्यक्ष भूमिका के अलावा बहुत से ऐसे पक्ष होते हैं जो कहीं न कहीं सक्रिय राजनीति में संलिप्त न होने के बाद भी पूरे चुनावी मौसम में सक्रिय दिखाई देते हैं. ऐसे लोगों में एक तो वे लोग होते हैं जो किसी न किसी रूप में चुनावी कार्यों से जुड़े होते हैं. इनमें बैनर, पोस्टर, होर्डिंग छापने वाले, राजनीतिज्ञों के पक्ष में प्रचार-प्रसार करने वाले लोग शामिल होते हैं. इसके अलावा एक दूसरा पक्ष वो होता है जिसकी चुनावों में किसी तरह की कोई भागीदारी नहीं होती है, सिवाय मतदान करने के किन्तु इसके बाद भी उसके द्वारा सर्वाधिक सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया जाता है. ये पक्ष चुनावी क्षेत्र में सभी जगह पाया जाता है. क्या गाँव, क्या शहर. क्या गली क्या चौराहा. क्या चाय की दुकान क्या पान की गुमटी. क्या दफ्तर क्या बाज़ार. सर्वत्र इस पक्ष की उपस्थिति रहती है. और सर्वाधिक गौर करने वाली स्थिति ये होती है कि इस पक्ष के द्वारा अपने-अपने तर्कों से अपने-अपने समर्थन वाले दल की सरकार तक बनवा दी जाती है. अपने मन का प्रतिनिधि चुनवा लिया जाता है. अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बना लिया जाता है. 



देश, प्रदेश को संचालित करने वाली सबसे अहम् प्रक्रिया को, सबसे महत्त्वपूर्ण कदम राजनीति को आज उससे दूर होते जा रहे प्रबुद्ध वर्ग ने नाकारा साबित करवा दिया है. राजनीति को सबसे निकृष्ट कोटि का काम सिद्ध करवा दिया है. इसी कारण गली-चौराहे-नुक्कड़ पर खड़े लोग राजनीतिक चर्चा में तो संलिप्त दिखाई पड़ जाते हैं, उसकी अच्छाइयों से ज्यादा उसमें बुराइयों को खोजने का काम करते हैं, उसमें सक्रिय ईमानदार लोगों से अधिक उसमें सक्रिय भ्रष्ट-माफिया लोगों की अधिक चर्चा करते हैं. इसका दुष्परिणाम ये होता है कि राजनीति के नकारात्मक प्रचार का एक से बढ़ते हुए अनेक तक चला जाता है और समाज की एक सोच ये बनती चली जाती है कि वर्तमान में राजनीति से अधिक घटिया, अधिक बुरी कोई चीज नहीं. आखिर, किसी ने कभी इस पर विचार किया है कि राजनीति कब, कैसे भ्रष्ट बना दी गई? कब, कैसे राजनीति को बुराई का समर्थन करने वाला सिद्ध कर दिया गया है? किसने राजनीति को गन्दा बना दिया है? शायद राजनीति पर, गठबंधन पर, चुनावों पर, जनप्रतिनिधियों पर, सरकार के कार्यों पर लम्बी-लम्बी बहस करने का समय सबके पास है. अपने-अपने बनाये निष्कर्षों को थोपने का समय सबके पास है. अपने पूर्वाग्रहों को दूसरों पर लादने के लिए अनुभव सबके पास है. यदि किसी के पास कुछ नहीं है तो वो ये कि लोगों के बीच जाकर राजनीति की असलियत को समझाने का काम किया जाये. यदि समय नहीं है तो इस बात का कि अपनी आने वाली पीढ़ी को बता सकें कि बिना राजनीति के ये देश एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता है. यदि समय नहीं है तो इसके लिए नहीं है कि लोगों को राजनीति के विरुद्ध करते नकारात्मक प्रचार से रोका जा सके.


राजनीति के प्रति राजनीति से प्रबुद्धजनों के मोह-भंग ने, राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण ने, राजनीति के प्रति होते नकारात्मक प्रचार ने, राजनीति के प्रति अपनी भावी पीढ़ी को प्रेरित न कर पाने ने राजनीति को दो कौड़ी का बना दिया है. आज प्रत्येक मतदाता राजनीति पर बड़ी लम्बी-लम्बी चर्चा करने का दम रखता है मगर अपनी संतानों को राजनीति में आने को प्रेरित नहीं करता. उसके द्वारा राजनीति में आती गिरावट पर चिंता व्यक्त की जाती है मगर उसके उसमें सुधार के लिए भावी पीढ़ी को आगे नहीं किया जाता. ऐसे लोगों की बातों में राजनीति की गिरावट दिखती है मगर इनके मन में बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के लुभावने पैकेज के सपने सजे होते हैं. प्रत्येक नागरिक को समझना होगा कि किसी भी सदन के लिए एक निश्चित समयावधि के बाद अपनी सीटों को भरा जाना अनिवार्य है. यदि अच्छे लोग राजनीति में आकर चुनावों में नहीं उतरेंगे तो सदन अपने आपको ऐसे लोगों से भर लेगा जो उस समय चुनाव-मैदान में होंगे. ये स्थिति धीरे-धीरे बढ़ती गई और आज बहुतायत में हालत ये है कि अच्छे लोग राजनीति से, चुनावी मैदान से बाहर हैं और अपराधी किस्म के लोग राजनीति में प्रवेश करते जा रहे हैं. राजनीति में आती जा रही गंदगी सिर्फ बातें करने से, अनावश्यक बहस करने से दूर नहीं होने वाली. यदि इसे साफ़ करना है, राजनीतिक गंदगी को मिटाना है तो राजनीति की बातें नहीं वरन राजनीति करनी होगी. आज के लिए न सही, कल के लिए.... अपने लिए न सही, अपनी भावी पीढ़ी के लिए लोगों को जागना होगा. 

3 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "टूटी सड़क के सबक - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

HindIndia said...

Thanks for sharing such a nice article ..... Really amazing article!! :) :)

Kavita Rawat said...

बहुत सटीक विश्लेषण .. राजनीति को आज सबसे घटिया स्तर का काम मान लिया गया है, यद्यपि बहुत हद तक यह सही है फिर भी इसमें अच्छे लोगों की जबरदस्त दरकरार है, जो अच्छी परिभाषा दे सके