google ad

05 November 2016

चैनल प्रतिबन्ध और राजनीति

पठानकोट पर हुए आतंकी हमले के समय देश की आंतरिक सुरक्षा को ध्यान में न रखते हुए किये गए प्रसारण के लिए एनडीटीवी पर एक दिनी प्रतिबन्ध लगाया गया है. केबल टीवी नेटवर्क कानून के तहत प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने प्रतिबन्ध लगाये जाने का आदेश दिया है. इस खबर के आते ही तमाम विपक्षी दल केंद्र सरकार पर हमलावर की भूमिका में आ गए हैं. उनके द्वारा इस प्रतिबन्ध को आपातकाल जैसी स्थिति बताया जाने लगा है. राजनैतिक दलों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर इस प्रतिबन्ध के पक्ष, विपक्ष में बहस छिड़ गई है. कदाचित प्रथम दृष्टया देखने पर ऐसा ही महसूस होता है कि सरकार द्वारा तानाशाही रवैया अपनाते हुए चैनल पर एक दिन का प्रतिबन्ध लगा दिया है. इसके साथ-साथ यदि चैनलों की, मीडिया की, सोशल मीडिया की वर्तमान स्थिति का आकलन किया जाये तो इस प्रतिबन्ध के पीछे बहुत से बिंदु ऐसे निकल कर सामने आयेंगे जो ऐसे क़दमों के उठाये जाने की अनुशंसा करेंगे. 


चैनल पर प्रतिबन्ध लगाये जाने के पीछे का कारण पठानकोट हमले के समय के प्रसारण को आधार बनाया गया है. ये कोई पहली बार नहीं हुआ है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ से कि देश की आंतरिक सुरक्षा को उन्होंने ताक पर रख दिया हो. अभी विगत दिनों सेना द्वारा किये गए सर्जिकल स्ट्राइक की सूचना के बाद जिस तरह से मीडिया द्वारा सीमा पर जाकर वहाँ सेना की स्थित, जवानों की लोकेशन, वहाँ के सुरक्षा इंतजाम, बंकरों की स्थिति, सीमा से लगे हुए गाँवों के नागरिकों द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए उठाये गए क़दमों का प्रसारण किया गया वो प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता है. मीडिया की, इलेक्ट्रॉनिक चैनल की कुछ इसी तरह की अतिशय उत्साहित स्थिति का खामियाजा देश के जवानों को उस समय भुगतना पड़ा था जबकि वे मुंबई हमले के समय आतंकियों को काबू में करने के लिए जूझ रहे थे. उस समय भी अनेकानेक चैनलों द्वारा समूचे ऑपरेशन का सीधा प्रसारण करके खुद को सबसे तेज, सबसे आगे रखने की तृष्णा में समूची रणनीति को दुश्मनों तक पहुंचा दिया था.

देश की सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करने का कार्य अकेले इलेक्ट्रॉनिक चैनल ही नहीं कर रहे हैं, कई बार ऐसा काम प्रिंट मीडिया द्वारा भी कर दिया जाता है. आये दिन मीडिया द्वारा सेना की, पुलिस की जानकारी रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित कर दी जाती है. कहाँ-कहाँ हमारे जवान तैनात हैं, कहाँ-कहाँ कितना असलहा है, कितना गोला-बारूद है, कहाँ-कहाँ किस तरह की कमियां हैं, कहाँ-कहाँ खामियां हैं आदि-आदि को दिखाकर, प्रकाशित करके मीडिया चैनल अथवा पत्र-पत्रिकाएं जागरूक किस्म की पत्रकारिता न करके देश की सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ ही कर रही हैं. आज भी देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका की एक रिपोर्ट दिमाग से हटती नहीं जबकि विमान अपहरण के बाद एक आतंकी को छोड़ने की शर्त आतंकियों द्वारा केंद्र सरकार के सामने रखी गई थी. उस समय उस पत्रिका ने उस आतंकी के रिहा किये जाने के पहले ही सम्बंधित जेल के नक़्शे सहित एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसमें जेल की दीवारों की ऊँचाई, बैरकों की स्थिति, उस आतंकी के कैद किये जाने की स्थिति, वहाँ की सुरक्षा व्यवस्था आदि को लेकर ग्राफिक्स सहित जानकारी प्रकाशित की गई थी. सोचने वाली बात है कि उस रिपोर्ट का फायदा उठाकर आतंकी यदि अपने साथ को छुड़ा ले जाते और फिर किसी दूसरे आतंकी को छोड़े जाने की माँग करने लगते तो इसका जिम्मेवार कौन होता? दरअसल मीडिया हो अथवा सोशल मीडिया, सभी ने स्वतंत्रता का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया है. उनके लिए अपने-अपने खेमे बना लिए गए हैं. इस कारण उनका उद्देश्य अपने खेमे को सबसे आगे रखना, उसको तमाम खूबियों से परिपूर्ण दिखाना और विपक्षी खेमे को नीचा दिखाना, उसकी कमियों को बढ़ा-चढ़ा कर सामने लाना बन गया है. ऐसे में अक्सर देश की आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ भी हो जाता है. कई-कई गोपनीय जानकारियाँ सार्वजनिक हो जाती हैं.


ऐसी स्थिति में अब जबकि केंद्र सरकार द्वारा चैनल पर एक दिन के प्रसारण रोक का प्रतिबन्ध लगाया गया है तो इसे सम्पूर्ण मीडिया पर प्रतिबन्ध न समझा जाये. इस प्रतिबन्ध को आपातकाल जैसा घोषित करके विपक्षियों द्वारा देशवासियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की जा रही है, जो खतरनाक है. वैसे भी ये कोई पहला अवसर नहीं है जबकि केंद्र सरकार ने किसी चैनल पर प्रतिबन्ध लगाया है. इससे पहले खुद कांग्रेसनीत पिछली सरकार में बीस से अधिक बार प्रतिबन्ध की कार्यवाही की जा चुकी है. तब ये कार्यवाही अश्लील सामग्री, एडल्ट सामग्री दिखाए जाने को लेकर की गई थी, जो कई-कई सप्ताह, महीनों की थी. ऐसे में ये भी सोचना लाजिमी है कि अश्लील, पोर्न सामग्री को दिखाए जाने पर महीनों के हिसाब से लगाया गया प्रतिबन्ध आपातकाल की आहट नहीं था, मगर देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को सार्वजनिक करने पर मात्र एक दिन का प्रतिबन्ध आपातकाल की आहट हो गई. ये भी विचार करना होगा कि असीम त्रिवेदी के द्वारा बनाये गए कार्टून पर उसे हिरासत में लेना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन नहीं था मगर सेना की ख़ुफ़िया जानकारियों को सार्वजनिक करने पर लगी रोक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन है. सोचना होगा कि अनशन करने के दौरान रात को सोते हुए अनशनकारियों पर लाठीचार्ज करवा देना आपातकाल की आहट नहीं था मगर देश की सुरक्षा से लगातार खिलवाड़ पर सख्त कदम का उठाया जाना आपातकाल जैसा हो गया. विडम्बना ये है कि आज देशहित से आगे स्वार्थ हो गया है. जिसके चलते विरोध के लिए विरोध करना अनिवार्य सा हो गया है और यही कारण है कि चैनल पर एक दिनी प्रतिबन्ध पर सार्थक बहस के स्थान पर जबरिया विरोध की राजनीति की जाने लगी है. ये स्थिति किसी भी रूप में देश के सुखद भविष्य की राह निर्मित नहीं करती है.

3 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "मीठा मीठा गप्प गप्प और खारा खारा थू थू“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

HindIndia said...

बहुत ही उम्दा .... बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति .... Thanks for sharing this!! :) :)

Kavita Rawat said...

सामयिक प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!