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14 November 2015

आतंकवाद और हम

बम धमाके में मारे गए नागरिकों को श्रद्धांजलि देते हुए मन सवाल करने में लगा है कि आखिर फ़्रांस के लोगों ने किस बाबरी ढाँचे (इसे मस्जिद पढ़ने वाले मस्जिद भी पढ़ सकते हैं) को गिराया है? फ़्रांस में किस तरह का भगवा आतंकवाद फैलने में लगा है? फ़्रांस में कौन से निक्करधारी असहिष्णुता को बढ़ावा देने में लगे हैं? आखिर वहाँ कौन है जो लोकतान्त्रिक मूल्यों का, मानवीय मूल्यों का हत्यारा है? आखिर वहाँ न तो भाजपा की सरकार है, न तो वहाँ किसी हिंदूवादी संगठन ने किसी विवादित ढाँचे को गिराया है, न ही वहाँ किसी दल विशेष द्वारा भगवा आतंकवाद अथवा असहिष्णुता को बढ़ावा दिया जा रहा है, न ही वहाँ के राष्ट्राध्यक्ष को कथित रूप से किसी दंगे का जिम्मेवार बताया जा रहा है फिर क्या कारण हैं इन बम धमाकों के? यदि इस्लामिक आतंकवादी संगठन द्वारा वहाँ बम धमाकों के पीछे के उक्त कारण नहीं हैं तो फिर भारत में चली आ रही आतंकवादी घटनाओं के लिए इस तरह की घटनाएँ किस तरह जिम्मेवार हैं?
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देश में इस्लामिक आतंकवादी घटनाओं को इन पश्चिमी देशों ने कभी गंभीरता से लिए ही नहीं. उनके लिए देश में घटित होती ऐसी घटनाएँ कभी आतंकी घटनाएँ ही नहीं रहीं. अशोभनीय लगता है किसी मौत पर इस तरह का बयान देना किन्तु लगता है कि पश्चिम के देशों में इस्लामिक आतंकवादी घटनाओं का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है. जब तक इनके पिछवाड़े आग नहीं सुलगेगी तब तक इनको भारत के दर्द का, हम सब नागरिकों के दर्द का एहसास नहीं होगा. ये हर आतंकी घटना को हमारी आपसी लड़ाई नाम देकर मुँह मोड़ लेते रहे हैं. कुछ कट्टरपंथियों की आतंकी घटनाओं को देश के हिन्दू-मुसलमान की लड़ाई बताते रहे हैं. पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को दो देशों का आपसी मामला बताते रहे हैं. अमेरिका से लेकर फ़्रांस तक की ऐसी घटनाओं से कम से कम इन्हें समझ तो आया ही होगा कि ये महज दो देशों, दो धर्मों, दो विचारों का मसला नहीं है कुछ और है जो धीरे-धीरे समूचे विश्व को अपने आतंक की चपेट में ले रहा है.
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बहरहाल, वहाँ हमले के क्या कारण हैं, हमारे देश में हमले के क्या कारण रहते हैं या फिर अन्य पश्चिमी देशों में आतंकी हमलों के क्या कारण रहते रहे हैं ये एक अलग विषय, मुद्दा हो सकता है किन्तु आज इसे समझने की आवश्यकता है कि आखिर इस्लामिक आतंकवाद आज सम्पूर्ण विश्व के लिए संकट क्यों उत्पन्न कर रहा है? कहीं इनका मकसद हथियारों के बल पर, हिंसा-आतंक के बल पर अपनी प्रभुता को स्थापित करना तो नहीं है? कहीं इनका मकसद सम्पूर्ण विश्व को इस्लामिक ग्राम में परिवर्तित करने का तो नहीं है? ये और बात है कि ऐसा होना संभव है अथवा नहीं किन्तु ये सत्य है कि ऐसी सोच के चलते भी सम्पूर्ण विश्व दहशत में जीने को विवश होता लग रहा है. यहाँ इनका कारण न तो बाबरी ढाँचा है और न वहाँ इन घटनाओं का कारण मुसलमानों का मारा जाना है. ऐसे आतंकी संगठनों का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ सम्पूर्ण विश्व से शांति-स्नेह-सदभाव को समाप्त करके हिंसा-उपद्रव-अत्याचार का साम्राज्य स्थापित करना है और इसके लिए वे देश-देश के हिसाब से कारणों को जन्म देते रहते हैं.

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ऐसे में समझना इस बात को है कि सम्पूर्ण विश्व से इस्लामिक आतंकवादी संगठन के विरोध में उठते स्वरों का असल औचित्य क्या है? कहीं इसके पीछे ऐसे लोग खुद को इस्लाम के साथ खड़ा हुआ तो नहीं बता रहे हैं? आखिर हमारे देश में लगभग रोज ही होती ऐसी घटनाओं पर तो कोई सार्थक बयानबाज़ी नहीं की जाती है? आखिर हमारे देश में लव जिहाद के नाम से होने वाले आतंकी स्वरूप को भी प्यार पर पहरा देकर बरगलाने का काम क्यों होने लगता है? ऐसी घटनाओं पर सोचने-समझने की जरूरत है न कि अत्यधिक संवेदित होकर सिर्फ बयानबाज़ी करने की, अतिशय भावुकता दिखाकर इस्लामिक आतंकवाद को नकार देने की. हाँ, एक बात विशेष रूप से विचारणीय है और सीखने योग्य भी कि इतने बड़े बम धमाकों के बाद भी वहाँ की मीडिया से एक भी वीभत्स फोटो नहीं, इधर-उधर बिखरे पड़े क्षत-विक्षत शवों की तस्वीर नहीं. वहाँ के राजनैतिक दलों अथवा किसी राजनैतिक व्यक्ति द्वारा सरकार के विरोध में बयान नहीं. मीडिया ने अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए ऐसे हमलों के खिलाफ देश को एकजुट बताया है. सोचिये, यदि  ये घटना हमारे देश में होती तो तमाम कथित धर्मनिरपेक्ष सरकार को हत्यारा बताने लगते, शवों की प्रदर्शनी मीडिया ने शुरू कर दी होती. हम ऐसी दर्दनाक घटनाओं पर भी एक नहीं हो पाते हैं और यही कारण है कि हमारे यहाँ आतंकवाद कभी बाबरी ढाँचे के नाम पर, कभी गुजरात के नाम पर, कभी दादरी के नाम पर अपनी हरकतें दिखाने से नहीं चूकता है. 
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