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03 July 2015

दोष किसका, दोषी कौन


क्या हम अपने बच्चों का लालन-पालन सही से नहीं कर पा रहे हैं? क्या हमारे बच्चे उद्दण्ड, अनुशासनहीन होते जा रहे हैं? क्या हमारे बच्चे माता-पिता के प्यार का नाजायज फायदा उठा रहे हैं? क्या माता-पिता बच्चों के बिगाड़ने में खुद प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं? क्या समाज का, तकनीक का, आधुनिकता का नकारात्मक प्रभाव बच्चों की परवरिश पर पड़ रहा है? ऐसे और भी सवाल हैं जो आये दिन, पल प्रति पल हमारे दिमाग में कौंधते रहते हैं और इनका जवाब पाने के लिए हम बहुत ज्यादा प्रयत्नशील नहीं दिखते हैं. इन सवालों का कौंधना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं, कुछ न कुछ गड़बड़ अवश्य हो रहा है और उस गड़बड़ को कोई समझने की कोशिश भी नहीं कर रहा है. आये दिन हम युवा, किशोरवय के लड़के-लड़कियों की असमय मृत्यु की खबरों से दो-चार हो रहे हैं. कहीं उनके द्वारा आत्महत्या किये जाने की खबर है तो कहीं उनके द्वारा अपने साथी की हत्या किये जाने के बाद जान देने का मामला है. कहीं वे हताशा में आत्महत्या की तरफ मुड़ रहे हैं तो कहीं उनकी लापरवाही उनको मृत्यु की तरफ ले जा रही है. कभी नशे की हालत में इस आयुवर्ग के बच्चे मृत्यु की तरफ जा रहे हैं तो कहीं ऐसा उनके द्वारा किसी अन्य तरह के अपराधबोध के कारण ऐसा किया जा रहा है. इसके अलावा यदि गौर किया जाये तो बहुतायत में ऐसे मामलों के पीछे प्यार में असफलता की, एकतरफा प्यार की कहानी छिपी मिलती है. ये अपने आपमें अचंभित करने वाला विषय है कि जिस उम्र में लड़के-लड़कियों को अपने कैरियर पर ध्यान देना चाहिए, अपनी नौकरी के लिए, रोजगार के लिए, भविष्य बनाने के लिए सचेत रहने की, जागरूक रहने की जरूरत है, उस समय वे युवा नशे का, अपराध का, हत्या का, आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं.
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समस्या के आलोक में समझना होगा कि आखिर गलती किस पक्ष से है? आखिर गलती क्यों हो रही है? क्या अभिभावक गलत हैं अथवा बच्चे गलत हैं? समाज उनको गलत दिशा दिखा रहा है अथवा परिवार उनका सही दिशा-निर्देशन नहीं कर पा रहा है? वर्तमान समय की आपाधापी में देखा जाये तो बहुतायत में माता-पिता दोनों ही अपनी गृहस्थी की गाड़ी को सुचारू रूप से चलाने के लिए जद्दोजहद करने में लगे हैं. इसके अलावा बहुत से अभिभावक ऐसे हैं जिनका मकसद सिर्फ और सिर्फ धन कमाना रह गया है और इसके पीछे उनका कुतर्क अपने बच्चों की परवरिश की खातिर ऐसा करने का दिया जाता है. ये सच हो सकता है कि आज के दौर में बच्चों का लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा, रहन-सहन आदि अत्यंत मंहगा होता जा रहा है. साथ ही साथ भौतिकतावादी दुनिया में दिखावे के लिए भी अभिभावकों द्वारा रहन-सहन को दिखावटी बनाए जाने की कवायद की जा रही है, जिसके चलते भी उनका एकमात्र मकसद धनोपार्जन रह जाता है. ऐसे में उनके द्वारा अपने बच्चों के लिए समय, स्नेह, प्यार आदि दे पाना सहज रूप से संभव नहीं हो पता है. मासिक रूप से भारी-भरकम जेबखर्च देने को, महंगी-महंगी बाइक, कार आदि उपलब्ध करवा देने को, एशो-आराम की सभी वस्तुओं की उपलब्धता को माता-पिता की प्यार भरी छाँव के रूप में नहीं देखा-समझा जा सकता है. और ऐसी स्थितियों में बच्चों में अपने माता-पिता के प्रति एक तरह का नकारात्मक भाव पनपने लगता है और यही स्थिति शनैः-शनैः विकराल रूप धारण करने लगती है.
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इस स्थिति के दूसरे पहलू के रूप में विचार किया जाये तो बच्चे भी कम दोषी नहीं लगते हैं. बहुतायत अभिभावकों द्वारा अपनी सुविधानुसार सुख-सुविधा के सभी संसाधनों को उपलब्ध करवाए जाने के प्रयास किये जाते हैं. उनके द्वारा अपने बच्चों को अत्यधिक लाड़-प्यार से पाला जाता है, उस लाड़-प्यार का घड़ी-घड़ी अनावश्यक प्रदर्शन भी किया जाता है. इसके अलावा बच्चों की जायज, नाजायज मांगों को तुरंत स्वीकार कर लेना भी बच्चों में गलत सन्देश का बीजारोपण करता है. किशोरावस्था में बच्चों को सही-गलत को परिभाषित करना सहज नहीं होता है और वे अपने माता-पिता, परिवार से मिल रही आज़ादी को नकारात्मक रूप में देखने लगते हैं. जेबखर्च के रूप में मिलती भारी-भरकम रकम, तकनीकी के साथ चलने देने की अहंकारी दशा के चलते महंगी कार, बाइक, मोबाइल आदि के शौक बच्चों में सहजता से विकसित होते देखे जा सकते हैं. सहज उपलब्ध स्थिति के चलते ही ऐसे बच्चों में कुछ भी सहजता से पा लेने की भावना घर करने लगती है और वे ऐसा वस्तुओं के साथ-साथ इंसानों के लिए भी विचार करने लगते हैं. दुष्परिणाम ये होता है कि ऐसे बच्चे ही एकतरफा प्यार में असफल रहने पर अपनी जान गँवा बैठते हैं अथवा सामने वाले की जान ले बैठते हैं.
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ऐसे मोड़ पर जबकि समाज घनघोर संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, जहाँ माता-पिता इस खौफ के साथ जीते हैं कि उनकी औलाद कहीं कुछ गलत न कर बैठे; बच्चे इस ठसक के साथ अपनी जिंदगी को गुजारते हैं कि ऐसा करना तो उनके माता-पिता का फ़र्ज़ है, ऐसा करके वे कोई एहसान नहीं कर रहे हैं. जब इस तरह की मानसिकता समाज में परिवारों में, अभिभावकों में, बच्चों में विकसित हो जाएगी तो संबंधों का सहज निर्वहन संभव नहीं दिखता है. ऐसे में माता-पिता को अपने बच्चों के लालन-पालन में आरम्भ से ही इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि वे उनकी किसी भी तरह की नाजायज मांगों को न मानें. खुद किशोरावस्था के बच्चों को भी चाहिए कि वे समाज में सही-गलत को समझकर अपने माता-पिता की भावनाओं को सम्मान दें. बच्चों को समझना ही होगा कि दुनिया में कोई भी माता-पिता अपने स्तर पर अपने बच्चों का बुरा नहीं चाहते हैं और उसको अपनी सामर्थ्य भर प्रत्येक सुख-सुविधा उपलब्ध करवाने की कोशिश करते हैं. फिर भी यदि ऐसे हालातों पर विचार करें तो प्रथम दृष्टया ज्ञात होता है कि ऐसे में माता-पिता ही सर्वाधिक दोषी हैं, उनको अपने बच्चों को पर्याप्त समय देने की जरूरत है, उनकी जरूरतों को समझने की आवश्यकता है, उनकी आवश्यकताओं को सहज रूप में लेने की जरूरत है. माता-पिता का एक-एक पल, एक-एक कदम ही बच्चों को सही-गलत दिशा की तरफ ले जाता है.

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1 comment:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, नौशेरा का शेर और खालूबार का परमवीर - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !