google ad

23 May 2015

देह की भूख कहाँ ले जाएगी समाज को


भूख, ये शब्द अपने आपमें एक तरह की कमी दर्शाता है तो साथ में अन्य दूसरे तरह की विकृति भी दिखाता है. प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी तरह की भूख सताती रहती है और इसकी पूर्ति के लिए वो कोई न कोई प्रयत्न करता है. नाम की भूख, धन की भूख, पेट की भूख, देह की भूख, सत्ता की भूख की तरह से और भी न जाने कितनी भूख लेकर मनुष्य समाज में विचरण करता घूम रहा है. भूख मिटाने के अनेक प्रयत्नों में सार्थक, निरर्थक प्रयास लगातार दिखाई देते हैं. इधर देखने में आ रहा है कि इन्सान ने अपनी भूख मिटाने के लिए समाज के बने-बनाये नियम-कानूनों-कायदों का ध्वंस करना आरम्भ कर दिया है. ऐसा नहीं है कि पूर्व में समाज के नियमों, रीतियों आदि का ध्वंस न किया जाता रहा हो किन्तु वर्तमान में स्थिति अत्यंत भयावह हो चुकी है. भूख की पूर्ति के लिए व्यक्ति का रहन-सहन, जीवन-शैली, व्यवहार इस तरह के हो गए हैं कि कई बार उसको इन्सान कहते हुए भी संदेह होता है. एक-एक कृत्य के द्वारा मनुष्य स्वयं को ही पूरी तरह से नकारते हुए किसी न किसी रूप में खुद में जंगलीपन के दर्शन करवाता है.
.
इस तरह के वातावरण में समझना होगा कि आखिर हम इन्सान अब किस तरह के समाज का निर्माण करना चाहते हैं. क्या कहा जायेगा उस समाज को जहाँ महज छह माह की बच्ची के साथ बलात्कार किया जाता है? क्या कहेंगे ऐसे समाज को जहाँ एक पंचायत फरमान सुनाकर आरोपी पिता से ही उसकी बेटी की शादी करने को कहती है? किस दिशा में जा रहा है समाज जहाँ पारिवारिक मर्यादाएं पूरी तरह से ताक पर रख दी गई हों? क्या एक ऐसे समाज का जहाँ स्वतंत्रता के नाम पर यौन स्वच्छंदता का नंग-नाच देखने को मिल रहा हो? क्या एक ऐसे समाज का जहाँ भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी-ऊपरी कमाई को सामाजिक रूप से स्वीकार्यता प्राप्त होती हो? क्या एक ऐसे समाज का जहाँ इन्सान किसी दूसरे इन्सान के कष्टों का, दुखों का लाभ उठाता दिखे? ऐसे समाज का जहाँ कोई किसी के काम न आये, सिर्फ और सिर्फ स्वार्थपूर्ति ही होते दिखे? किसी और को नहीं, खुद हमें समझना होगा कि हमें किस तरह के समाज-निर्माण की आवश्यकता है.
.
क्या देह की भूख इतनी प्रबल बन चुकी है कि यहाँ रिश्तों का कोई भान नहीं? क्या सेक्स किसी भी व्यक्ति के जीवन में इस तरह घर कर चुका है कि पल-पल सिर्फ बलात्कार की खबरें सुनाई देती हैं? समाज के लिए कार्य कर रहे लोगों को, समाज विज्ञान पढ़ा-सिखा रहे लोगों को, अपने नाम के साथ भारी-भरकम समाजशास्त्री शब्द जोड़कर देश-विदेश की यात्रा करने वालों को अब इस दिशा में शोध कार्य करने की आवश्यकता है. छेड़छाड़, बलात्कार आदि को महज एक घटना मानकर विस्मृत कर देना अब उचित नहीं है. इस मानसिक विकृति का इलाज करना अब अनिवार्यता में शामिल किया जाना अपेक्षित हो गया है. राष्ट्र स्तर पर अनेक अभियान, आयोजन छेड़े जाते हैं, अब एक अभियान ऐसे लोगों की मनोदशा सुधारने, उनको सही रास्ते पर लाने के लिए चलाये जाने की जरूरत है. ये आवश्यक नहीं कि महज ज्ञान देने भर से, नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ा देने भर से, संस्कारों की दुहाई दे देने भर से ऐसे लोगों में सुधार लाया जाए, जहाँ आवश्यकता समझ आये, ऐसे लोगों पर दंडात्मक कार्यवाही भी की जाये. अब जबकि समाज में रिश्तों का मोल नहीं समझा जा रहा है, इंसानियत को ताक पर रख दिया गया हो, मर्यादा तार-तार करके बिखेर दी गई हो तब किसी न किसी रूप में कठोर कार्यवाही की महती आवश्यकता प्रतीत होती है.

.

No comments: