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19 June 2011

तोड़ कर फेंक दो वो कलम, जो सरकार को डरा सकती नहीं




इतने सारे मुद्दों के बाद भी कुछ न लिखा जाना दर्शाता है कि मन में कुछ खिन्नता है। यह बात अपने एक मित्र से आज कही जिसने कई दिनों से कुछ भी न लिखने पर सवाल किया था। कई बार होता है ऐसा कि बहुत कुछ दिखाई देने के बाद भी कुछ भी लिखने का मन नहीं होता है। अपने साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ।



चित्र गूगल छवियों से साभार

वैसे देखा जाये तो कितना कुछ था लिखने को किन्तु सभी घटनाओं के आपसी तारतम्य के बीच खुद को निपट खिन्नता की स्थिति में पाया। वैसे एक आकलन किया जाये तो शायद वर्तमान समय में लेखन की जितनी खाद्य सामग्री समाज में व्याप्त है उतनी किसी भी समय में नहीं रही होगी।

एक निगाह अपने देश की कुछ प्रमुख घटनाओं पर डाली जाये तो दिखाई देता है घटनाओं का अम्बार जिनके बीच से एक नौसिखिया भी अपनी लेखनी को माँज सकता था या कहें कि माँज सकता है।

  • अन्नाकाअनशनऔरदेशकीजनताकाउनकेसाथजुड़ना।
  • अन्नाकेअनशनकीसफलतासेसरकारकासिविलसोसायटीकेगठनकारास्ताबनाना।
  • बाबाकाअनशनपरबैठनाऔरसरकारकादण्डवतहोना।
  • दण्डवतसरकारकादण्डात्मककार्यवाहीकरनाऔरसीनाजोरीकरना।
  • सोई, खामोशभीड़परलाठीचार्जकेद्वारालोकतन्त्रमेंभीराजतन्त्रकीस्थापनाकाप्रयासदिखाईदेना।
  • बाबा, अन्नाकेसार्थकमुद्दोंकोभीराजनीतिकारंगचढ़ाकरदेशकीजनताकोबरगलानेकाप्रयासहोना।
  • केन्द्रसरकारमेंविराजमानराजनीतिज्ञोंकाबेलौसमुँहफटअंदाजऔरसारीशर्मोहयाकोछोड़देना।
  • अनशनकीमीडियागीरीकेबीचसच्चेअनशनकर्तास्वामीनिगमानन्दकीमौतहोनाऔरसभीकाचुपसाधलेना।
  • घोटालोंकेतमामसारेराजा, बादशाहों, महारानियोंकाजेलकेअन्दरदिखाईदेना।
  • सरकारकाभ्रष्टाचार, कालेधनकेमामलेपरराजनीतिकरनाऔरलगातारप्रयासकरनाकिकैसेभीइसतरहकेमुद्दोंसेजनताकाध्यानभटके।
  • मीडियाकीलफ्फाजीभरीहरकतोंकेबीचस्वयंकोलोकतन्त्रकासशक्तमाध्यमबतानेकाढोंगस्थापितकरना।
  • राजनीतिज्ञलफ्फाजोंकाअपनीजुबानपरकाबूरखपाना।
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और भी बहुत सारे ऐसे विषय हैं जिन पर कलम आसानी से चलाई जा सकती है पर इन सभी में सरकार की, जनता की, तन्त्र की, प्रशासन की स्थिति देखकर मन में लगातार खिन्नता का भाव बना रहा। स्वयं पर तथा अपने आपको साहित्य से सम्बद्ध मानने वालों पर, कलम का सिपाही कहलाने वालों पर इस बात का मलाल होता रहा कि देश में लोकतन्त्र के बीच स्थापित होते जा रहे राजतन्त्र को रोक पाने का कोई प्रयास, सार्थक प्रयास इस बिरादरी की तरफ से नहीं हो सका।

हमें इस बात पर शर्म करनी चाहिए कि चन्द पंक्तियों को तोड़ मरोड़ कर कविता कह देने का दम्भ भरने वाले, कुछ इधर-उधर का जोड़-तगोड़ करके कुछ भी लिख देने को साहित्य कहने वालों की कलम में अब वह ताकत नहीं रह गई जो सरकार के, प्रशासन के गलत कदमों को उठने से रोक सके अथवा उनमें डर पैदा कर सके। हम लोगों को तो ऐसे समय में अपने कलम तोड़ कर फेंक देनी चाहिए जो ऐसे संकट के दौर में भी कविताओं की चाशनी में देश की एक बहुत बड़ी पीढ़ी को डुबाने में लगे हैं, उन्हें देश की असली समस्या से दूर करने में लगे हैं।


6 comments:

Udan Tashtari said...

लोग क्या कर रहे हैं, उसे छोड़ हम क्या कर रहे हैं-वो देखना ही आज के इस दौर में महत्वपूर्ण है...मगर होता कहाँ है ऐसा....


सरकार को तो खैर कोई नहीं डरा पा रहा है अभी...किस किस को तोड़ कर फेंक दें???

फेंक देंगे तो एक बची उम्मीद भी जाती रहेगी राजा साहेब...इतना नाराज न हों..कलम उठायें, कुछ करके दिखायें..उदाहरण पेश करें..अनुकरण करने के लिए भक्त तैयार बैठे हैं.

शुभकामनायें..

बी एस पाबला said...

चन्द पंक्तियों को तोड़ मरोड़ कर कविता कह देने का दम्भ भरने वाले, कुछ इधर-उधर का जोड़-तगोड़ करके कुछ भी लिख देने को साहित्य कहने वालों की कलम में अब वह ताकत नहीं रह गई जो सरकार के, प्रशासन के गलत कदमों को उठने से रोक सके अथवा उनमें डर पैदा कर सके

निश्चित तौर पर यह बात 'कुछ भी' लिख देने वालों को चुभेगी

akhtar khan akela said...

jnaaab bloging me to qlam kaa kyaa kaam lekin jhaan qalam chalti hai vhaan aajkal qlam tvqqyf ke kothe ki trah prbhavshali logon ke ishare par rqs kar rahi hai or isiliyen aapne jis andaz me is drd ko byaan kiya hai voh qaabile tarif hai ..akhtr khan akela kota rajsthan

ajit gupta said...

लेखक डराता नहीं है, अपितु सन्‍मार्ग पर लाता है। लेखक तो अपना कार्य कर रहा है, पूरा ब्‍लाग जगत इन घटनाओं से भरा है। बस हम स्‍वयं का आकलन करें कि हम क्‍या कर रहे हैं?

Ratan Singh Shekhawat said...

१- अपने आपको पैदायसी सदस्य मानने वाले तो वैसे ही वोट दे मरेंगे |
२- अल्पसंख्यकों के थोक वोट संघ रूपी ब्रह्मास्त्र का डर दिखाकर थोक में ही ले लिए जायेंगे |
३- गरीबों को मनरेगा के तहत हरामखोर बना दिया जायेगा | सो अभी तो मनरेगा के नाम से गरीबों के वोट झटके जायेंगे और जब वे हरामखोर हो जायेंगे तो मनरेगा बंद न करने के नाम पर वोट झटक लिए जायेंगे |
४- आरक्षण का झुनझुना वोट बैंक के लिए पहले ही पकड़ा रखा है |
५- थोड़ी बहुत कमी पड़ गयी तो ई वी एम् मशीन में गड़बड़ी कर लेंगे |
लो बन गयी आपकी छाती पर मुंग दलने के लिए एक शानदार सेकुलर,लुटू ,भ्रष्ट सरकार ,करते रहिये कंप्यूटर के की बोर्ड पर बोद्धिक जुगाली |

Dr Varsha Singh said...

विचारोत्तेजक लेख....बहुत ही सार्थक और सारगर्भित पोस्ट.