03 February 2011

अपूरणीय क्षति -- डॉ0 ब्रजेश कुमार (प्रधान सम्पादक--स्पंदन) का निधन


उत्तर प्रदेश के उरई शहर के दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व प्राध्यापक एवं साहित्यिक पत्रिका स्पंदन के प्रधान सम्पादक डॉ0 ब्रजेश कुमार का कल प्रातः निधन हो गया। डॉ0 ब्रजेश कुमार की शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद में हुई और अध्ययन पूर्ण करने के बाद उन्होंने उरई को अपनी कर्मस्थली के रूप में चयनित किया।

साहित्यिक प्रतिभा के धनी डॉ0 ब्रजेश का रंगमंच के प्रति भी जबरदस्त लगाव था। उन्होंने उरई जैसे छोटे से शहर में आज से लगभग 25 वर्ष पूर्व जबकि शहर में रंगमंचीय कार्यक्रमों के प्रति लोगों की विशेष रुचि नहीं थी, तब उन्होंने थैंक्यू मिस्टर ग्लॉड, लहरों के राजहंस, घासीराम कोतवाल जैसे विश्वप्रसिद्ध नाटकों का मंचन करवाया। रंगमंच और सांस्कृतिक कार्यों के प्रति विशेष रुचि रखने के कारण ही उन्होंने 25 वर्ष पूर्व सांस्कृतिक एवं रंगमंचीय संस्था वातायन की स्थापना कर शहर में सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण किया।

रंगमंच के प्रति स्नेह और साहित्य- लेखन के प्रति अनुराग रखने के कारण उन्होंने कई नाटकों तथा कविताओं की सर्जना की। ओरछा की नगरबधू, लाला हरदौल आदि जैसे स्थानीय विषयों के द्वारा उन्होंने बुन्देली संस्कृति को भी जनता के सामने रखा। साहित्य अनुराग के कारण ही वे सेवानिवृत्ति के बाद भी साहित्य से जुड़े रहे।

उरई को अपनी कर्मस्थली बनाने वाले डॉ0 ब्रजेश कुमार ने यहीं से चौमासिक साहित्यिक पत्रिकास्पंदन का प्रकाशन भी शुरू किया। उनके प्रधान सम्पादकत्व में निकलने वाली स्पंदन ने अपने अल्प समय में ही काफी प्रसिद्धि प्राप्त की और देश-विदेश में नाम कमाया।

अपनी सेवानिवृत्ति के बाद वे काफी समय तक उरई शहर में ही रहे और फिर अपनी आयु और शारीरिक अस्वस्थता के कारण वे अपने इकलौते पुत्र अभिनव उन्मेश कुमार के साथ रहने लगे। अन्तिम समय तक वे किसी न किसी रूप से स्वयं को सक्रिय बनाये रखे रहे। वे अपने पीछे अपनी पत्नी, पुत्री-दामाद, पुत्र-पुत्रबधू, नाती-नातिनों को छोड़ गये।

यह और बात है कि अपनी शारीरिक अस्वस्थता के कारण डॉ0 ब्रजेश कुमार अन्तिम समय में रंगमंच और साहित्य से पूर्ण रूप से नहीं जुड़े रह सके किन्तु यह सत्य है कि उनका जाना रंगमंच के क्षेत्र में, साहित्य के क्षेत्र में अपूरणीय क्षति है। इस क्षति को लम्बे समय तक भरा जा पाना सम्भव नहीं है। उन्होंने उरई जैसे छोटे नगर को रंगमंच के प्रति, साहित्य के प्रति जागरूक किया और यहां के लोगों में इनके प्रति लगाव भी पैदा किया।

विशेष- डॉ0 ब्रजेश कुमार द्वारा रचित कविताओं को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

स्पंदन पत्रिका का इंटरनेट संस्करण यहाँ से देखा जा सकता है


6 comments:

vedvyathit said...

sahity jgt kee vastv me apoorniy kshti hai
hardik smvednayen vykt krta hoon eeshewr se un ke liye prarthna krta hoon kee un ke privar ko smbl den v divngt aatma ko sayujjy prdan kern

नुक्‍कड़ said...

विनम्र श्रद्धांजलि

अरुण चन्द्र रॉय said...

विनम्र श्रद्धांजलि
हिंदी साहित्य को अपूरणीय क्षति...

Swarajya karun said...

इस ब्लॉग में दिए गए लिंक में जाने पर मालूम हुआ कि उन्होंने भी अपना एक ब्लॉग शुरू किया था. उनकी कुछ कवितायेँ उसमे पढ़ने को मिली,जिनमे मानव-मन की कोमल भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति है. साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय ऐसे प्रतिभावान लोगों का अचानक हमेशा के लिए दुनिया छोड़ देना बहुत दुखद होता है. डॉ. ब्रजेश कुमार को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.उनके परिवार के प्रति गहरी संवेदनाएं .

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

नमन एवम हार्दिक श्रद्धांजलि

सोमेश सक्सेना said...

विनम्र श्रद्धांजलि