02 May 2010

एक शेर शायद कुछ लोगों को अकल दे दे... आमीन !!!



मेंहदी हसन की गई एक बड़ी प्रसिद्द ग़ज़ल
"अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्यालों में मिलें,
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले।"
का एक शेर...

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तू खुदा है मेरा इश्क फरिश्तों जैसा,
दोनों इंसान हैं तो क्यूँ इतने हिज़ाबों में मिलें
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इस शेर को ब्लॉग के सभी साथी याद रखे रहें तो वे आपस में एक दूजे को गाली-गलौज करना बंद कर देंगे, शायद क्या हमारा सोचना सही है???


(चित्र गूगल छवियों से साभार)

6 comments:

मनोज कुमार said...

बिल्कुल सही है जी!

Shekhar Kumawat said...

WAQY ME BAHUT KHUB

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

लेकिन सामने वाला पत्थर लेकर मारने दौड़े तब? लेकिन सद्कामना का स्वागत तो होना ही चाहिये..

शैफालिका - ओस की बूँद said...

are sir ji sabhi to ek doosare se apne ko badaa samajh rahe hain to aise men aun aapke sher par dhyan dega......sabhi khuda hain....

वन्दना said...

बात तो सही है अगर कोई समझे और माने तो…………अच्छा प्रयास्।

रेखा श्रीवास्तव said...

कुमारेन्द्र भाई,

अगर मैं गलत नहीं हूँ, तो शायद ये शेर मीनाकुमारी जी का लिखा हुआ है और ये बयां कर रहा है उसके दर्द को. जो अब हमारे समाज में एक सार्थक मिशाल पेश कर सकता है किन्तुकाश ! ऐसा हो सकता?