25 April 2010

शाश्वत मौन तोड़ने की कोशिश में...एक छोटी सी कविता


समाज में ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि आप घर पर ही दुबके बैठे रहें, किसी न किसी काम से घर के बाहर आना ही पड़ता है। बाहर आने के बाद आपको दुनिया की सच्चाई दिखाई देती है। जो सच्चाई अभी तक आप समाचारों के माध्यम से, लोगों के द्वारा सुनते चले आ रहे थे उसे अपनी आँखों से देखते हैं।

यह भी नहीं होता कि आपको बस अच्छा ही अच्छा देखने को मिले। अच्छा तो बहुत कम होता है और उसके साथ बुरा बहुत देखने को मिलता है। यहाँ आप गाँधी के तीन बंदरों वाला सिद्धान्त भी लागू नहीं कर सकते हैं।

समाज का हिस्सा हैं और कई बार ऐसा होता है कि जो घटित हो रहा होता है उसमें कहीं न कहीं आपको अपना अक्स दिखाई देता है। इस कारण से उस घटित होने वाले बुरे को आप सही करना चाहते हैं किन्तु कुछ बंधन आपको ऐसा करने से रोकते हैं।

कुछ किया जाये या नहीं, बुरा घटित होते देखा जाये या मुँह मोड़ कर निकल लिया जाये जैसे अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति आपको घेरने लगती है। आपके साथ ही नहीं हम में से हर एक के साथ ऐसा होता है और हममें में से हर एक व्यक्ति करने न करने को लेकर एक प्रकार का द्वन्द्व महसूस करता है।

हमने भी बहुत बार महसूस किया और बहुत बार मन को मारा। कभी अपने हालातों को लेकर, कभी सामने वाले के हालातों को लेकर। इस द्वन्द्व को बहुत बार शब्द देने का प्रयास किया और दिया भी। वही शब्द जिन्हें हम कविता कह देते हैं, ग़ज़ल कह देते हैं आपके सामने हैं--- इस बार हमारी कविता के रूप में।

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एक मौन,
शाश्वत मौन,
तोड़ने की कोशिश में
और बिखर-बिखर जाता मौन।
कितना आसान लगता है
कभी-कभी
एक कदम उठाना
और फिर उसे बापस रखना,
और कभी-कभी
कितना ही मुश्किल सा लगता है
एक कदम उठाना भी।
डरना आपने आपसे और
चल देना डर को मिटाने,
कहीं हो जाये कुछ अलग,
कहीं हो जाये कुछ विलग।
अपने को अपने में समेटना,
अपने को अपने में सहेजना,
भागना अपने से दूर,
देखना अपने को मजबूर,
क्यों....क्यों....क्यों???
कौन देगा
इन प्रश्नों के जवाब?
फिर पसर सा जाता है
वही मौन... वही मौन...
जैसे कुछ हुआ ही हो,
जैसे कुछ घटा ही हो।

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(चित्र गूगल छवियों से साभार)

14 comments:

रज़िया "राज़" said...

हर मानव इस दौर से गुज़रता है। कुछ मौन रहते हैं कोइ कह देता है आपकी तरहाँ।

बढिया प्रस्तुति।

M VERMA said...

कौन देगा
इन प्रश्नों के जवाब?
या शायद कहीं प्रश्नो के जवाब मे प्रश्न ही न आये

परमजीत बाली said...

एक गहरा एहसास। बढिया प्रस्तुति। बधाई।

Tej Pratap Singh said...

sawwal to bahut hain par jawaab dhoondna hoga...badiya.

मनोज कुमार said...

मैं तो मौन ही रहूँगा।
मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक-शक्ति होती है ।

sangeeta swarup said...

कभी कभी मौन भी मुखरित हो जाता है....सुन्दर भाव से रची सुन्दर रचना

Akshay Katoch said...

तुम इतना अच्छा भी लिख लेते हो, हम तो समझते थे की हम ही अकेले लिख पाते हैं.............
बहुत ही सुन्दर बहुत ही सुन्दर
आशीर्वाद

डॉ0 ब्रजेश कुमार said...

sundar, achchha likhte ho....
ye bhi bahut sundar hai...

अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

क्या बात है भाई, क्या देख लिया और क्या नहीं कह सके.... ये भी तो बताते जाते....

अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

क्या बात है भाई, क्या देख लिया और क्या नहीं कह सके.... ये भी तो बताते जाते....

शैफालिका - ओस की बूँद said...

आप सुन्दर लिखते हैं इसमें कोई शक नहीं...........अब कुछ दिनों आप आलेख लिखना छोड़ कर गीत, कविता ही लिखें तो मजा आएगा.

शैफालिका - ओस की बूँद said...

आप सुन्दर लिखते हैं इसमें कोई शक नहीं...........अब कुछ दिनों आप आलेख लिखना छोड़ कर गीत, कविता ही लिखें तो मजा आएगा.

दीपक 'मशाल' said...

Par kabhi na kabhi to is maun ko tootna hi hota hai.. jitna jaldi toote achchha hai, der hui to jwalamukhi ban kar footega aur us laave me ghulee hogi khud ke liye nafrat, baad me bachegi sirf pasgchataap ki raakh.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत सुन्दर रचना है, इंसान कितना मजबूर है .. कितना बेबस है ... न चाहते हुए भी कितनी बार सच का गला घोंटना पढता है ...