11 April 2009

यहाँ सवाल मानसिकता का है....

क्या नारी के साथ बलात्कार का कारण उसके कपड़े हैं? इस सवाल को अभी नारी ब्लाग पर उठाया गया, साथ ही जब भी स्त्री-विमर्श की बात होती है तब भी इस प्रकार के प्रश्न को जरूर उठाया जाता है। यह उस प्रकार का सवाल है जो किसी हताशा या कोई अन्य रास्ता न दिखाई देने के बाद उत्पन्न होता है। महिलाओं की वेशभूषा क्या और कैसी हो इस पर हमेशा से सवाल-जवाब होते रहे हैं, शायद होते भी रहेंगे।
यह तो निश्चय ही सत्य है कि किसी भी व्यक्ति की वेशभूषा पर उसी ही व्यक्ति क अधिकार होना चाहिए अन्य को कदापि यह हक नहीं होना चाहिए कि वो इस पर अपनी टिप्पणी दे। इसके बाद भी एक सत्य यह भी सामने आता है कि किसी न किसी रूप में विवाद वस्त्रों को लेकर भी होता रहता है।
यहाँ एक दो साधारण सी बातों की ओर ध्यान दिलाने का प्रयास है जो अमूमन हर एक के साथ पेश आती होंगीं और इनको लेकर हमेशा विभ्रम की स्थिति बनी रहती है।
यदि लड़की के कम कपड़ों को निशाना बनाया जाये तो यह कहा जाता है कि छोटे कपड़े पहनने से रोकने वाला समाज कौन होता है? चलिए मान लिया.........इसी के साथ ही जुड़ी एक और स्थिति देखिए। यदि लड़की मिनी स्कर्ट पहन कर टहलती है और उसके घर में उसका भाई अपने दोस्तों के सामने या मोहल्ले में उसके मिनी स्कर्ट पहनने को रोकता है तो उसका विरोध किया जाता है। इसी के उलट यदि उस लड़की की सहेलियाँ आ जातीं हैं और घर का वह लड़का नेकर पहन कर उसी तरह घूमता है तो कहा जाता है कि लड़का बेशर्मी कर रहा है।
एक अन्य स्थिति को सोचिए कि महिलायें नाभि-दर्शना वस्त्रों में, स्लीवलैस कपड़ों में, देह-दर्शना कपड़ों में बाजार, समारोहों आदि में जातीं हैं यदि उनके घर के पुरुष - पति या भाई- हाफ पैण्ट में या पेट दिखाने वाली शर्ट पहन कर उनके साथ जाना चाहें तो क्या जा सकते हैं?
कपड़ों वाली स्थिति पर एक बात यदि आपने गौर की हो कि किसी गाने में, किसी फिल्मी सीन में हीरोइन तो कम से कम कपड़ों में नाच रही होती है, भले ही सीन में भयंकर सर्दी दिखाई जा रही हो और हीरो पूरे कपड़े पहने दिखाई देता है। अब यहाँ जवाब आता है कि दर्शक सौन्दर्य और देह ही देखना चाहते हैं इस कारण स्त्री की नग्न देह दिखाई जाती है। चलिए यह भी मान लिया तो क्या दर्शको के नाम पर क्या पुरुष ही हैं? महिलायें नहीं हैं जो अपनी मानसिक तृप्ति के लिए पुरुष की नग्न देह को देखना चाहें?
इन्हीं बातों पर याद आया कि पिछले दिनों अक्षय कुमार द्वारा अपनी ही पत्नी से अपनी जींस की बटन खुलेआम खुलवाने को लेकर बवाल पैदा कर दिया गया, उस पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाकर शिकायत भी दर्ज करवा दी गई। क्या वाकई उसकी अश्लीलता उन स्त्रियों द्वारा फैलाई जा रही अश्लीलता से अधिक है जो कपड़ों के नाम पर बस कुछ थोड़ा सा कुछ लपेट ले रहीं हैं? सीने के उभार, शरीर के कटाव, आगे पीछे के सारे हिस्से छिपते हुए भी सबकुछ दिखाने को आतुर रहते हैं?
कपड़ों की परिभाषा क्या हो, पहनावे की शालीनता क्या हो, वेशभूषा की मर्यादा क्या हो ये तब तक तय नहीं हो सकता है जब तक स्त्री-पुरुष की आपसी सोच निर्धारित नहीं होती। बलात्कार किसी घटना या किसी स्थिति के कारण नहीं कुछ छुद्र मानसिकता वाले लोगों की उपज हैं। जब तक समाज से ऐसे लोगों को चिन्हित करके अलग नहीं किया जा सकता ये अपराध रुकने वाले नहीं। इसके साथ ही एक सवाल खड़ा होता है कि घर में छिपे ऐसे छुद्र मानसिकता वाले भाई-बाप से बच्चियों को कौन बचायेगा?

चुनावी चकल्लस-

काया उनकी डोलती, फिर भी है तैयार,
पहन गले में घूम सकें जीत वाला हार,
रणनीति किसी को नाराज नहीं है करना
क्या जाने डूब जाये नाव बीच मझदार।

6 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मुझे तो लगता है जब से दुनिया में कपड़े आए हैं अश्लीलता और उत्तेजना बढ़ गई है।

प्रकाश बादल said...

मैं द्विवेदी जी के मत से सहमत नहीं हूँ कपड़ों को अश्लील तरीके से पहना जाना उत्तेजित कर सकता है। लेकिन बलात्कार की बढ़ती वारदातों के कारण और भी कई हो सकते हैं जिनमें युवतियों का अश्लील कपड़े पहनना भी के मुख्य कारण हो सकता है।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

अगर मानसिकता ही गन्दी हो तो कपड़ो का क्या दोष . सबसे ज्यादा बलात्कार ग्रामीण क्षेत्र मे होते है वहां तो छोटे कपडे कोई पहनता ही नहीं है . इन सब का कारण है विकृत मानसिकता

Rachna Singh said...

जब तक घरो मे ये सोच रहेगी की बेटा जो चाहे कर सकता हैं क्यकी वो बेटा यानी पुरुष हैं और बेटी स्त्री हैं इस लिये उसे दब कर धक् करना रहना होगा तब तक कपडे पहनो या ना पहनो उस से कोई फरक नहीं पडेगा . बलात्कार मे कपड़ो का कोई रोल ही नहीं हैं . विवाहित स्त्री का भी बलात्कार होता हैं उसके पति के हाथो . बलात्कार केवल और केवल सेक्स हैं स्त्री की इच्छा के विरुद्ध . और बलात्कार किसने किया इसको प्राथमिकता दे नाकि किसका हुआ और कैसे हुआ . यकीन मानिये सुधार आये गा .

नारी ब्लॉग पोस्ट का लिंक लगा दे लोगो को कर्म से दोनों पोस्ट पढने मे सुविधा होगी .

Rachna Singh said...

"कपड़ों को अश्लील तरीके से पहना जाना उत्तेजित कर सकता है।"


ये बात पुरुषों पर भी लागू कारे क्युकी सेक्स और उतेजना स्त्री में भी होती हैं जब पुरुष नग्न होते हैं या आप ये मानते हैं की स्त्री मे सेक्स की जरुरत को दबाया जाना ही सही हैं

और फ़िक्र ना करे यही सब लिखे तालिबान सीमा तक आ गया हैं घर मे भी हां ही जायेगा तब आप सब की मन की इन बलवती इच्छाओ की पूर्ति होगी प्रकाश बादल जी और आप की बहु बेटियाँ कोदो से पीटेगी .

-कौतुक said...

हाँ यह मानसकिता ही है. अक्षय कुमार का सरेआम जींस के बटन खुलवाना और एक महिला का स्लीवलेस और मिनी स्कर्ट पहन कर बाजार जाना दोनों एक ही तराजू में नहीं रखे जा सकते. एक महिला एक पुरुष के बटन कुछ अन्तरंग क्षणों में ही खोलती है जिसका सार्वजानिक किया जाना उचित नहीं. उस जींस कंपनी का उद्देश्य भी यही था कि यदि आप यह जींस पहनते हैं तो महिलाएं इस खोलने से अपने आपको रोक नहीं पाएंगी. जबकि किसी महिला का स्लीव्लेश और मिनी स्कर्ट पहन कर घूमना यह नहीं कहता कि आओ मेरे साथ सम्भोग करो.

आगे पढें..

http://paricharcha.wordpress.com/2009/04/12/gender-equality-2