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28 May 2016

रोते, सिसकते तन्हा गाँव

शाम का धुंधलका होते ही घर के पास बने कुंए से पानी खींचना और घर के सामने की जगह पर छिड़क कर जमीन की गर्मी, धूल को दबाने का काम शुरू हो जाता. कई-कई बाल्टी पानी खींचना, कई-कई बार का चक्कर लगाना, जमीन की दिन भर की गर्मी को शांत करने की सफल कोशिश के बाद मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक से मन झूम जाता. चारपाई बिछाने का काम भी होने लगता. कोई अपनी चटाई बिछाकर पहले से अपनी जगह को घेरने लगता. फैलते अंधियारे में कभी चाँद की चाँदनी तो कभी लालटेन की रौशनी फैलाती दिखती. इसी रौशनी के सहारे आसपास के बुजुर्ग, युवा, बच्चे, पुरुष, महिलाएँ अपने-अपने झुण्ड बनाकर विस्तार में फैली जगह में चहचाहट भर रहे होते. घर के सामने बने विशाल चबूतरे पर रामचरित मानस का नियमित पाठ होता, उसे नियमित सुनने वाले भी अपनी-अपनी जगह पर बैठे होते. बच्चों की शरारतों, युवाओं के ठहाकों, महिलाओं की रुनझुन करती हँसी के साथ-साथ मानस की चौपाइयों की स्वर-लहरी भक्तिमय रूप में घुलती रहती. शाम का धुंधलका घहराते-घहराते रात में बदलता जाता. गली भर में, चबूतरों पर, नीम के पेड़ों के नीचे पाए जाते झुण्ड भी परिवर्तित होते रहते. लोगों की जगह बदलती रहती, बैठने का स्थान बदलता रहता, आपसी वार्तालाप का विषय बदलता रहता. कभी एकदम से चिल्ला-चोट, कभी संशय भरी खुसफुसाहट, कभी ठहाके तो कभी नितांत ख़ामोशी सी.

रात में अँधेरे में सिमटती जाती अपनी-अपनी दुनिया में निमग्न ये छोटे-छोटे समूह चलायमान भी बने रहते. कुछ के घर से भोजन कर लेने की पुकार उठती. कुछ भोजन करके ऐसी गतिविधियों का हिस्सा बनते, कुछ समूह का हिस्सा बने लोगों को अपने साथ ले जाकर भोजन का आनंद उठाते. कुछ ज्यादा ही मनमौजी टाइप के लोग अपनी थाली सहित सबके बीच ही प्रकट हो जाते. एक थाली, कई-कई हाथ, न जाति का पूछा जाना, न बड़े-छोटे का भान. छोटे-छोटे कौर परमानन्द की प्राप्ति कराते हुए थाली के भोजन को समाप्त करते जाते. थाली खाली होने के पहले ही भर जाती. कभी इस घर से सूखी सब्जी आ जाती तो कभी उस घर की रसीली सब्जी का स्वाद मिलता. कहीं से दाल आकर लोगों को ललचाती तो कहीं से तीखा अचार आकर चटखारे बढ़ा देता. अनौपचारिक रूप से सब एक-दूसरे से हिले-मिले कहानी, किस्सों, लोकगीतों के हिंडोले पर कब नींद के आगोश में खो जाते, पता ही नहीं चलता. ऐसा नहीं कि रातें ही ऐसे खुशगवार गुजरती वरन सुबह से लेकर शाम आने तक जिंदगी ऐसे ही खुशगवार तरीके से गुजरती. दिन भर धूप की, गर्मी की चिंता से मुक्त कभी खलिहान, कभी बगिया की सैर. कभी नीम के झोंके पकड़ने की होड़ में झूलों की पेंग कभी तालाब की गहराई नापने की होड़ तो कभी बम्बा की धार को पीछे छोड़ने की सनक. आम, अमिया पर निशाना साधने को फेंके जाते पत्थर; तरबूज-खरबूज को एक मुक्के से तोड़ने की प्रतियोगिता दिन-दिन भर बच्चों के बीच चलती रहती.


गर्मी हो या सर्दी, सभी मौसम में बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक की एकसमान गतिविधियाँ. सभी की सहयोगात्मक स्थिति. सभी के बीच प्रेम, स्नेह, सौहार्द्र का गुलशन लगातार महकता रहता. बच्चों से लेकर बड़ों तक अपनापन दिखाई देता. किसी के बीच किसी तरह भेदभाव समझ नहीं आता. घर की चौखटों पर कोई प्रतिबन्ध न दिखाई देता. गलियाँ चहकती-महकती रहती. समय ने बहुत कुछ बदल दिया. इंसानों को भी बदला. गाँवों की संस्कृति को भी बदला. खेतों, खलिहानों, बगीचों, गलियों की मिट्टी की सुगंध को बदला. नीम के पेड़ों पर पड़े झूलों को बदला, तालाबों, नदियों, बम्बों के पानी को बदला. गुलजार रहने वाले खेत, खलिहान, बगीचे, गलियाँ अब सुनसान से दिखाई देते हैं. चबूतरे वीरान हैं, नीम तन्हा खड़े हैं, झूले खामोश लटके हैं, गलियों में सुगन्धित मिट्टी की जगह सीमेंट की गर्मी उड़ रही है. एक थाली में भोजन की परम्परा की जगह घर के आँगन में दीवार खिंची है. अपनेपन की जगह स्वार्थ दिखाई देने लगा है. प्रेम-स्नेह की जगह वैमनष्यता ने ले ली है. अब न दिन चहकते दिखते हैं और न ही रातें गुलज़ार दिखती हैं. कुँओं की जगत पर खिलखिलाहट नहीं सुनाई देती. गली के मकानों से भोजन कर जाने की आवाजें भी नहीं उठती. सब अपने-अपने में मगन हैं. सब अपने-अपने घरौंदों में सिमटे हैं. कभी चहकता-महकता दिखता गाँव तन्हा है, खामोश है. अपने में सिसकता है, अपने में रोता है किन्तु अब उसके आँसू देखने वाला कोई नहीं, उसके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं, उसके हालचाल जानने वाला कोई नहीं. 

2 comments:

Kavita Rawat said...

सच एक दायरे में सिमट गया है गांव आज। . पहले जैसी बात देखने को तरस जाती हैं ऑंखें और मन। ... ...
गांव की बहुत सारी यादें मन में उभरने लगी हैं, कचोटता है मन आज के हालातों में ...... फिर भी मुझे आज भी गांव शहर के अपेक्षा बहुत अच्छे लगते है। ...

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Saif Mohammad Syad said...

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