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23 May 2014

संकट का समय है क्षेत्रीय दलों के लिए




भारतीय राजनीति में पिछले कुछ दशकों से क्षेत्रीय दलों ने अपनी पूर्ण हनक बना रखी है. किसी एक प्रदेश विशेष में नहीं वरन सम्पूर्ण देश में क्षेत्रीय दलों की भूमिका को देखा जा सकता है. वर्तमान लोकसभा चुनाव परिणामों के आने तक तमाम राजनैतिक विश्लेषक, चिन्तक और राजनीतिज्ञ इस बात को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में स्वीकार चुके थे कि भारतीय राजनीति क्षेत्रीय दलों के सहयोग से ही आगे बढ़ेगी. इसमें किसी को कोई शक भी नहीं था क्योंकि मुलायम सिंह, मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता आदि सहित अनेक क्षत्रप अपने-अपने दलों (क्षेत्रीय) के द्वारा केन्द्रीय नेतृत्व के लिए संकट पैदा करके अपनी-अपनी सत्ता का सञ्चालन करने में लगे थे. (यहाँ इस बात को समझना पड़ेगा कि महज वोटों और कुछ सीटों के लिहाज से राष्ट्रीय दल कहलाना एक विधिक प्रक्रिया है) अब जबकि सोलहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम सामने आये तो सदन में एक अलग तरह की तस्वीर बनी दिख रही है. देश भर से कुल देश भर से कुल पैंतीस दलों को सदन के भीतर पहुँचने का अवसर मिला है और इनमें भी मात्र भाजपा तथा कांग्रेस राष्ट्रीय दल के रूप में हैं, जो दल पूर्व में राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त थे, उनकी मान्यता भी इस चुनाव परिणाम में समाप्त हो गई है.
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संसद में पहुँचे मात्र ३५ दलों में से २७ दल ऐसे हैं जिनकी सीटों की संख्या इकाई में ही सिमटी हुई है, इनमें भी १० दलों के पास मात्र एक सांसद है. इसी तरह से सात दलों के पास दहाई की संख्या में सांसद हैं. इनमें भले ही कुछ दल ऐसे हैं जिनकी राष्ट्रीय दल की मान्यता अभी-अभी समाप्त हुई है किन्तु बहुतायत में दल ऐसे हैं जिनका महत्त्व क्षेत्रीय दलों से ऊपर नहीं है. वर्तमान चुनाव परिणामों के परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रीय दलों की भूमिका पर सवाल उठाना अभी जल्दबाजी होगी क्योंकि सम्पूर्ण देश में मोदी-लहर के बाद भी बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके के बेहतर प्रदर्शन के साथ-साथ शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल, तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रदर्शन को विस्मृत नहीं किया जा सकता है. ये बात सत्य है कि क्षेत्रीय दलों के स्वार्थ के चलते, स्थानीय हनक के चलते कई बार राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में दिक्कतें आती हैं किन्तु इसके बाद भी स्थानीय जनता में उनका विश्वास कायम रहता है, भले ही ये विश्वास जातिगत आधार पर, धार्मिक आधार पर, वोट-बैंक के आधार पर बना रहता हो. यदि मतदाताओं में इन क्षेत्रीय दलों के प्रति आक्रोश की स्थिति रहती है तो बहुसंख्यक मतदाता इनका घनघोर समर्थक भी होता है. ये और बात है कि वर्तमान चुनावों में कांग्रेस-विरोध के साथ-साथ मोदी-लहर ने बहुत से क्षेत्रीय दलों के सामने सीटों का संकट पैदा कर दिया है.
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ऐसा भी नहीं है कि समस्त मतदाताओं ने सिर्फ राष्ट्रीय दलों को ही स्वीकारा है, यदि ऐसा होता तो कांग्रेस दहाई में और मार्क्सवादी पार्टी इकाई में नहीं सिमटती. राष्ट्रीय दल की मान्यता लिए बसपा भी शून्य पर नहीं आती. इसके बाद भी मतदाताओं के मूड को अब क्षेत्रीय दलों को भाँपना होगा. विगत कुछ वर्षों की राजनीति में जिस तरह से खरीदफरोख्त वाली मानसिकता, ब्लैकमेल करने की नीति दिखने लगी थी उसे देखकर क्षेत्रीय दलों ने अपनी प्रासंगिकता को कम तो किया ही है. इस संकट के मध्य यदि केंद्र में नवगठित भाजपानीत सरकार ने अगले पाँच वर्ष में कुछ सकारात्मक कार्य करके दिखाए तो आने वाला समय क्षेत्रीय दलों के लिए संकट अवश्य ही पैदा करेगा. भले ही ये पूरी तरह समाप्त न हों पर इनका वजूद स्वीकारने योग्य भी नहीं रह जाएगा.

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