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13 June 2013

सपनों की दुनिया के पीछे भागते सपनों का अंत



हाल ही में फिल्म इंडस्ट्री की एक युवा अभिनेत्री की आत्महत्या से न केवल बॉलीवुड आहत हुआ बल्कि मीडिया, सोशल मीडिया में अभी तक हताशा-निराशा के बादल घिरे हैं. ऐसा लग रहा है जैसे देश में पहली बार किसी युवा ने आत्महत्या की हो. दरअसल उस अभिनेत्री की आत्महत्या का मसला उसके बॉलीवुड कनेक्शन के साथ-साथ प्रेम-सेक्स से भी जुड़ गया है. इस कारण मीडिया को कई-कई एंगल से मसाला पेश करने का लाभकारी मौका भी मिल गया है. देखा जाये तो सब कुछ इसी लाभकारी मौके का खेल है, इसी लाभकारी मौके को भुना लेने की देन है. मीडिया और सोशल मीडिया की आवाज़ से आवाज़ मिलाते हुए यदि उस अभिनेत्री को युवा-प्रतिनिधि मान भी लिया जाए तो जिस तरह की आरंभिक सफलता उसने प्राप्त की थी, उसे पाने के लिए बॉलीवुड की बड़ी-बड़ी नामचीन अभिनेत्रियाँ तरसती हैं. अपने कैरियर की शुरुआत में अमिताभ बच्चन, आमिर खान जैसे दिग्गज नेताओं के साथ करना और फिर काम का टोटा पड़ जाना उस अभिनेत्री को हताशा की तरफ ले गया. हताशा, निराशा के बीच प्रेम, लिव-इन-रिलेशन, सेक्स, धोखा आदि का बॉलीवुड तड़का भी उसकी जिंदगी में लग गया, जिसने उसे आत्महत्या जैसे जघन्य कदम उठाने को मजबूर कर दिया. 
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कुछ इसी तरह की स्थितियों से देश का अधिसंख्यक युवा जूझ रहा है, वो चाहे लड़का हो अथवा लड़की. अपने आसपास के माहौल पर दृष्टिपात करिए, सब तरफ युवाओं का कैरियर, प्रेम, सफलता, धन, नशे आदि के लिए पगलाए सा दौड़ना-भागना दिखता है. इस पागलपन में कई बार सफलता मनमाफिक मिलती है और अधिकांशतः इसमें असफलता ही मिलती है. इस पागलपन को बढ़ाने में हमारा सेल्युलाइड पर्दा भी अपनी महती भूमिका निभाता है. चाहे सीरियल हों अथवा फ़िल्में, अब सभी में धन का लेन-देन कई-कई करोड़ रुपये में होता है; कॉलेज से शुरू हुई कहानी में पढ़ाई गौड़ हो जाती है और प्रेम प्रमुख हो जाता है; शराब, सिगरेट, डिस्को, पब, नाच-गाना, सैर-सपाटा, मंहगी-मंहगी गाड़ियों की रेस, सेक्स, कई-कई लड़कियों-लड़कों से प्रेम-सम्बन्ध, लड़ाई-झगड़ा आदि ही युवा-जीवन की पहचान बनने लगते हैं; कैरियर-सफलता ऐसे मिलती है जैसे दरवाजे पर बंधी रहती हो; भौतिकतावादी संस्कृति इस तरह से हावी रहती है मानो बिना इसके पूरा जीवन ही व्यर्थ है; स्वतंत्रता स्वच्छंदता से होते हुए उच्छृंखलता में कब  बदल जाती है पता ही नहीं चलता है. रील लाइफ को रियल लाइफ में उतारने की कोशिश, अपने साधारण से जीवन को असाधारण बनाने का प्रयास, आगे बढ़ने के लिए शॉर्टकट मारने का फार्मूला अपनाया जाने लगता है. इन सबसे क्षणिक सफलता, धन, यश, प्रसिद्धि तो मिलना संभव होता है पर उसका स्थायीकरण हो पाना मुश्किल ही होता है.
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अपने इसी अस्थायी को स्थायी बनाने के लिए वर्तमान में युवा कुछ भी, कुछ भी करगुजरने को तैयार होता है. सफलता-असफलता के उठते-गिरते रास्ते युवाओं में घनघोर निराशा भर देते हैं. यही निराशा उनमें जीवन के प्रति नकारात्मक रवैया पैदा करता है. अपराधीकरण, नशे की प्रवृत्ति, गलत रास्तों की तरफ मुड़ना आदि इसी प्रवृत्ति का परिणाम होता है जो अंत में आत्महत्या पर जाकर ही ख़तम होता है. आज के युवाओं के समक्ष वास्तविक आदर्शों की कमी होने और सेल्युलाइड परदे के आदर्शों की भरमार होने से भी ऐसी स्थितियां निर्मित हुई हैं. समय रहते युवाओं को जीवन की वास्तविकता को समझाने का काम करना होगा, जीवन को शॉर्टकट से चलाये जाने के फार्मूला से बचाना होगा, रील लाइफ और रियल लाइफ का अंतर स्पष्ट करना होगा, स्वतंत्रता, स्वच्छंदता, उच्छृंखलता के मायने बताने होंगे. यदि ऐसा करने में हम अक्षम रहते हैं, असफल रहते हैं तो हम अपने युवाओं की बहुत बड़ी संख्या को अँधेरे में जाने से नहीं रोक पाएंगे. उनके सपनों की सपनीली दुनिया को उनकी आँखों में ही मरते देखते रह जायेंगे. 
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1 comment:

vandana gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(15-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!